सप्तर्षियों का त्याग/सप्तर्षि और राक्षसी

सप्तर्षियों ने जब उस विकराल राक्षसी को वहाँ खड़ी देखा, तब उन्होंने उसका नाम तथा वहाँ खड़ी रहने का प्रयोजन पूछा। राक्षसी बोली- 'तपस्वियो! मैं जो कोई भी होऊँ, तुम्हें मेरा परिचय पूछने की आवश्यकता नहीं है। तुम इतना ही जान लो कि मैं इस सरोवर की रक्षिका हूँ।' 

 जय श्री राम प्रिय पाठकों! कैसे है आप लोग

आशा करते हैं कि आप ठीक होंगे। 

सप्तर्षियों का त्याग

सप्तर्षियों का त्याग/सप्तर्षि और राक्षसी

बहुत पुराने समय की बात है। एक बार पृथ्वी पर बाहर वर्षों तक वर्षा नहीं हुई। संसार में घोर अकाल पड़ गया। सभी लोग भूखों मरने लगे। सप्तर्षि भी भूख से व्याकुल होकर इधर-उधर भटकने लगे। 

घूमते-घूमते ये लोग वृषादर्भि राजा के राज्य में गये। उनका आगमन सुनकर राजा वहाँ आया और बोला- 'मुनियो ! मैं आप लोगों को अन्न, गांव, घी-दूध आदि रस तथा तरह-तरह के रत्न दे रहा हूँ। आप लोग कृपया स्वीकार करें।'

ऋषियों ने कहा- 'राजन् ! राजा का दिया हुआ दान ऊपर से मधु के समान मीठा जान पड़ता है, किन्तु परिणाम में वह विष के समान हो जाता है।

इस बात को जानते हुए भी हम लोग आपके प्रलोभन में नही पड़ सकते हैं। ब्राह्मणों का शरीर देवताओं का निवास स्थान है। यदि ब्राह्मण तपस्या से शुद्ध एवं संतुष्ट रहता है तो वह सम्पूर्ण देवताओं को प्रसन्न रखता है। 

ब्राह्मण दिन भर में जितना तप संग्रह करता है, उसको राजा का प्रतिग्रहण क्षण भर में इस प्रकार जला डालता है जैसे सूखे जंगल को प्रचण्ड अग्नि। इसलिये आप इस दान के साथ कुशल पूर्वक रहें। जो इसे माँगे अथवा जिन्हें इसकी आवश्यकता हो, उन्हें ही यह दान दे दें।'

यों कहकर वे दूसरे रास्ते से आहार की खोज में वन में चले गये। तदनन्तर राजा ने अपने मन्त्रियों को गूलर के फलों में सोना भर-भरकर ऋषियों के मार्ग में रखवा देने का आदेश दिया। उनके सेवकों ने ऐसा ही किया। 

दीर्घायुष्य एवं मोक्ष के लिए भगवान् शंकर की आराधना

महर्षि अत्रि ने जब उनमें से एक को उठाया, तब फल बड़ा वजनदार मालूम हुआ। उन्होंने कहा-'हमारी बुद्धि इतनी मन्द नहीं हुई है, हम सो नहीं रहे हैं। हमें मालूम है, इनके भीतर सुवर्ण है। यदि आज हम इन्हें ले लेते हैं, तो परलोक में हमें इसका कटु परिणाम भोगना पड़ेगा।'

यों कहकर दृढ़तापूर्वक नियमों के पालन करने वाले वे ऋषिगण चमत्कारपुर की ओर चले गये। घूमते-घूमते वे मध्य पुष्कर में गये, जहाँ अकस्मात् आये हुए शुनःसख नामक परिव्राजक से उनकी भेंट हुई। 

वहाँ उन्हें एक बहुत बड़ा सरोवर दिखायी दिया। उसका जल कमलों से ढका हुआ था। वे सब-के-सब उस सरोवर के किनारे बैठ गये। उसी समस शुनः शख ने पूछा- 'महर्षियो! भूख की पीड़ा कैसी होती है ?'

ऋषियों ने कहा- 'शस्त्रास्त्रों से मनुष्य को जो वेदना होती है, वह भी भूख के सामने मात हो जाती है। पेट की आग से शरीर की समस्त नाड़ियाँ सूख जाती हैं, आंखों के आगे अंधेरा छा जाता है, कुछ सूझता नहीं। भूख की आग प्रज्वलित होने पर प्राणी गूँगा, बहरा, जड़, पंगु, भयंकर तथा मर्यादाहीन हो जाता है। इसलिए अन्न ही सर्वोत्तम पदार्थ है।

अतः अन्नदान करने वाले को अक्षय तृप्ति और सनातन स्थिति प्राप्त होती है। चन्दन, अगर, धूप और शीतकाल में ईंधन का दान अन्नदान के सोलहवें भाग के बराबर भी नहीं हो सकता। दम, दान और यम-ये तीन मुख्य धर्म हैं। इनमें भी दम विशेषतः ब्राह्मणों का सनातन धर्म है। दम तेज को बढ़ाता है। 

जितेन्द्रिय पुरुष जहाँ कहीं भी रहता है, उसके लिए वहीं स्थान तपोवन बन जाता है। विषयासक्त मनुष्य के मन में भी दोषों का उद्भावन होता है, पर जो सदा शुभकमों में ही प्रवृत्त है, उसके लिये तो घर भी तपोवन ही है। केवल शब्द-शास्त्र (व्याकरण) में ही लगे रहने से मोक्ष नहीं होता; मोक्ष तो एकान्तसेवी, यम-नियमरत, ध्यान परायण पुरुष को ही प्राप्त होता है। 

अंगों सहित वेद भी अजितेन्द्रिय को पवित्र नहीं कर सकते। जो आचरण खुद को बुरा लगे, वैसा आचरण दूसरों के साथ भी नही करना चाहिए। यही धर्म का सार है। जो परायी स्त्री को माता के समान, पर-धन को मिट्टी के समान तथा संसार के सभी भूतों को अपने ही समान देखता है, वही ज्ञानी है। 

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सम्पूर्ण प्राणियों के हित का ध्यान रखने वाला प्राणी मोक्ष को प्राप्त करता है। तनदन्तर ऋषियों के हृदय में विचार हुआ कि इस सरोवर में से कुछ मृणाल (कमल के फूल की जड़) निकाले जाएँ। पर उस सरोवर में प्रवेश करने के लिए एक ही दरवाजा था और इस दरवाजे पर खड़ी थी राजा वृषादर्भि की कृत्या (राक्षसी), जिसे उसने अपमानित समझकर ब्राह्मणों द्वारा अनुष्ठान कराकर सप्तर्षियों की हत्या के लिए भेजा था। 

सप्तर्षियों ने जब उस विकराल राक्षसी को वहाँ खड़ी देखा, तब उन्होंने उसका नाम तथा वहाँ खड़ी रहने का प्रयोजन पूछा। राक्षसी बोली- 'तपस्वियो! मैं जो कोई भी होऊँ, तुम्हें मेरा परिचय पूछने की आवश्यकता नहीं है। तुम इतना ही जान लो कि मैं इस सरोवर की रक्षिका हूँ।' 

ऋषियों ने कहा- 'भद्रे ! हम लोग भूख से व्याकुल हैं। अतः तुम यदि आज्ञा दो तो हम लोग इस तालाब से कुछ मृणाल उखाड़ लें। यातुधानी बोली-'एक शर्त पर तुम ऐसा कर सकते हो। एक-एक आदमी आकर अपना नाम बताए और प्रवेश करे।' 

उसकी बात सुनकर महर्षि अत्रि यह समझ गये कि यह राक्षसी कृत्या है और हम सबका वध करने की इच्छा से आयी है। तथापि भूख से व्याकुल होने के कारण उन्होंने उत्तर दिया-कल्याणि! पाप करने वाले को अरात्रि कहते हैं और उनसे बचाने वाला अत्रि कहलाता है। पापरूप मृत्यु से बचाने वाला होने के कारण ही मैं अत्रि हूँ।'

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राक्षसी बोली 'तेजस्वी महर्षे। आपने जिस प्रकार अपने नाम का तात्पर्य बतलाया है, वह मेरी समझ में आना बड़ा कठिन है। अच्छा, आप तालाब में उतरिये।'

इसी प्रकार वशिष्ठ ने कहा- 'मेरा नाम वशिष्ठ है। सबसे श्रेष्ठ होने के कारण लोग मुझे वशिष्ठ कहते हैं।' यातुधानी (राक्षसों) बोली-'मैं इस नाम को याद नहीं रख सकती। आप जाइये, तालाब में प्रवेश कीजिए।' 

कश्यप ने कहा- 'कश्य नाम है शरीर का, जो उसका पालन करता हो, वह कश्यप है। कु अर्थात पृथ्वी पर बम-वर्षा करने वाला सूर्य भी मेरा ही स्वरूप है-अतः मैं कुवम भी हूँ। काश के फूल की भाँति उज्जवल होने से 'काश्य' भी समझो।'

इसी प्रकार सभी ऋषियों ने अपने नाम बतलाये, किन्तु वह किसी को भी ठीक से याद न कर पायी न व्याख्या ही समझी, अन्त में सातवें ऋषि शुनःसख की बारी आयी। उन्होंने अपना नाम बतलाते हुए कहा- 'यातुधानी। इन ऋषियों ने जिस प्रकार अपना नाम बतलाया है, उस तरह मैं नहीं बता सकता। मेरा नाम शुनःसख (धर्म-स्वरूप मुनियों का मित्र) समझो।'

इस पर राक्षसी ने कहा- 'आप कृपया अपना नाम एक बार और बतलायें।' शुनः सुख ने कहा- 'मैंने एक बार अपना नाम बतलाया। तुम उसे याद न कर बार-बार पूछती हो, इसलिए लो, मेरे त्रिदण्ड की मार से भस्म हो जाओ।' 

यों कहकर उस संन्यासी के वेष में छिपे इन्द्र ने अपने त्रिदण्ड की आड़ में गुप्त व्रज से उसका विनाश कर डाला और सप्तर्षियों की रक्षा की तथा अन्त में कहा- 'मैं संन्यासी नहीं, इन्द्र हूँ। आप लोगों की रक्षा करने के उद्देश्य से ही मैं यहाँ आया था। 

राजा वृषादर्भि की भेजी हुई अत्यन्त क्रूर कर्म करने वाली दुष्ट राक्षसी आप लोगों का वध करने की इच्छा से यहाँ आयी हुई थी। अग्नि से इसका आविर्भाव हुआ था। इसी से मैंने यहाँ उपस्थिति होकर इस राक्षसी का वध कर डाला। 

शुकदेवजी की समता। शुकदेव जी का वैराग्य

हे मुनियों! लोभ का सर्वथा परित्याग करने के कारण अक्षय लोकों पर आपका अधिकार हो चुका है। अब आप यहाँ से उठकर वहीं चलिये। अन्त में सप्तर्षिगण इन्द्र के साथ चले गये।

तो प्रिय पाठकों, कैसी लगी आपको कहानी। आशा करते हैं अच्छी लगी होगी।अपनी राय अवश्य प्रकट करें। इसी के साथ विदा लेते हैं। ऐसी ही रोचक और सत्य कथाओं के साथ विश्वज्ञान मे फिर से मुलाकात होगी। तब तक के लिय आप अपना ख्याल रखें, हंसते रहिए, मुस्कराते रहिए और औरों को भी खुशियाँ बांटते रहिए। 

धन्यवाद 

जय श्री राधे कृष्ण 

Faqs 

सप्तर्षि मे कौन कौन से ऋषि आते हैं?

सप्तऋषियों के नाम ऋषि वशिष्ठ, ऋषि विश्वामित्र, ऋषि जमदग्नि, ऋषि गौतम, ऋषि भारद्वाज, ऋषि अत्रि, और ऋषि कश्यप हैं।

सबसे पुराना सप्तर्षि कौन है?

सप्तऋषियों में सबसे प्राचीन ऋषि वशिष्ठ को माना जाता है।

सप्तर्षियों के गुरु कौन थे?

सप्तऋषियों के गुरु भगवान शिव हैं।

सप्तर्षियों की उत्पत्ति कैसे हुई?

सप्तऋषि ब्रह्मा जी की मानसिक संतानों के रूप में उत्पन्न हुए थे। ये ब्रह्मा जी के ध्यान और तपस्या से उत्पन्न हुए थे।

सात ब्रह्मर्षि कौन है?

सात ब्रह्मर्षि वशिष्ठ, विश्वामित्र, अत्रि, जमदग्नि, गौतम, भारद्वाज, और कश्यप हैं। ये सभी सप्तऋषि भी हैं।

सबसे शक्तिशाली ऋषि कौन है?

सबसे शक्तिशाली ऋषि महर्षि विश्वामित्र को माना जाता है, जिन्होंने अपनी तपस्या से ब्रह्मर्षि का पद प्राप्त किया था।

क्या सप्तर्षि अमर है?

हाँ,मित्रों सप्तऋषि अमर हैं और इन्हें दिव्य शक्तियाँ भी प्राप्त हैं।

क्या सभी ऋषि ब्राह्मण है?

नहीं, सभी ऋषि ब्राह्मण नहीं है। उदाहरण के लिए, ऋषि विश्वामित्र एक क्षत्रिय थे जिन्होंने तपस्या से ब्राह्मर्षि का पद प्राप्त किया।

सर्वश्रेष्ठ ब्राह्मण कौन है?

सर्वश्रेष्ठ ब्राह्मण की कोई एक निश्चित परिभाषा नहीं है, लेकिन वशिष्ठ और विश्वामित्र को महान ब्राह्मण ऋषियों के रूप में माना जाता है।

शुद्ध ब्राह्मण कौन है?

शुद्ध ब्राह्मण वे होते हैं जो वेदों और शास्त्रों का पूर्ण अध्ययन करके धार्मिक और नैतिकता का पालन करते हैं।

गीता के अनुसार शूद्र कौन है?

भगवद गीता के अनुसार, शूद्र वह होता है जो सेवा और समाज के लिए कार्य करता है। इसका वर्णन कर्म पर आधारित है, न कि जन्म पर आधारित।

वेदों के अनुसार शूद्र कौन है?

वेदों में शूद्र वह व्यक्ति होता है जो समाज के सेवा कार्यों में संलग्न रहता है। इसे भी कर्म आधारित वर्ण व्यवस्था के रूप में देखा जाता है।

सबसे ज्यादा गुस्सा करने वाले ऋषि कौन थे?

ऋषि दुर्वासा सबसे ज्यादा गुस्सा करने वाले ऋषि थे।

सप्तर्षियों के अन्य नाम क्या है?

सप्तर्षियों के अन्य नाम इस प्रकार हैं-
भृगु, अंगिरस, अत्रि, विश्वामित्र, कश्यप, वशिष्ठ और शांडिल्य


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