क्या श्री कृष्ण ने उत्तङ्क मुनि को मूत्र पिलाया था?

एक दिन उत्तङ्क मुनि को बड़ी प्यास लगी। वे पानी के लिये चारों ओर घूमने लगे। इतने में ही उन्हें श्रीकृष्ण की कही बात आयी। उन्होंने श्रीकृष्ण को याद किया। तब उन्होंने देखा कि - एक नंगधग, कुत्तों से घिरा भीषण आकार का चाण्डाल चला आ रहा है। 

उस चाण्डाल के मूत्रेन्द्रिय से लगातार जल की धारा गिर रही थी। वह मुनि के निकट आकर बोला-'महर्षे! आपको प्यास से व्याकुल देखकर मुझे बड़ी दया लगती है। आप जल्दी मेरे पास आकर जल पी लीजिये........

जय श्री राम प्रिय पाठकों! कैसे है आप लोग
आशा करते हैं कि आप ठीक होंगे। 

दोस्तो! स्वागत है आपका एक बार से विश्व ज्ञान मे। दोस्तों ,आज की इस पोस्ट में हम जानेंगे कि क्या वास्तव मे श्री कृष्ण ने उत्तङ्क मुनि को मूत्र पिलाया था? क्या उत्तङ्क मुनि ने श्री कृष्ण को श्राप दिया था और किस कारण भगवान श्रीकृष्ण ने उत्तङ्क मुनि को अपना निजस्वरूप-दर्शन कराया?

क्या श्री कृष्ण ने उत्तङ्क मुनि को मूत्र पिलाया था? 

क्या श्री कृष्ण ने उत्तङ्क मुनि को मूत्र पिलाया था?
क्या श्री कृष्ण ने उत्तङ्क मुनि को मूत्र पिलाया था? 

महाभारत का युद्ध समाप्त हो चुका था। महाराज युधिष्ठिर राजा के रूप में अभिषिक्त कर दिये गये। अब भगवान् श्रीकृष्ण सुभद्रा को लेकर द्वारका लौट रहे थे। 

यात्रा करते हुए भगवान् श्री कृष्ण मारवाड़ देश में वहाँ जा पहुँचे, जहाँ अमित तेजस्वी उत्तङ्क मुनि रहते थे। भगवान् ने उनका दर्शन किया और पूजा भी की।

उसके बाद मुनि ने भी उनका स्वागत सत्कार किया। फिर कुशल- मंगल पूछने लगे। अन्त में जब श्रीकृष्ण ने कौरवों के संहार की बात सुनायी, तब उत्तङ्क मुनि क्रोध में भर गये और बोले- 'मधुसूदन ! कौरव तुम्हारे सम्बन्धी और प्रेमी थे। शक्ति रहते हुए भी तुमने उनकी रक्षा नहीं की। अतः आज मैं तुम्हें शाप दूँगा। 

कामवश बिना विचारे प्रतिज्ञा करने से विपत्ति,एकादशी की महिमा 

अभी मुनि शाप देते उससे पहले ही श्रीकृष्ण बोले'- भृगुनन्दन! पहले मेरी बात तो सुन लीजिये। आपने जो बाल्यावस्या से ब्रहाचर्य का पालन कर कठोर तपस्या की है और गृह भक्ति से अपने गुरु को सन्तुष्ट किया है, मैं वह सब जातना हूँ, पर इतना याद रख लीजिये कि कोई पुरुष थोड़ी-सी तपस्या के बल पर मेरा तिरस्कार नहीं कर सकता अथवा मुझे शाप नहीं दे सकता। 

मैं आपको कुछ अध्यात्म तत्व सुनाता हूँ, उसे सुनकर पीछे आप विचार कीजियेगा, महर्षे। आपको मालूम होना चाहिए ये रुद्र, वसु, सम्पूर्ण दैत्य, यक्ष, गन्धर्व, राक्षस, नाग और अप्सराएं सब मुझसे ही प्रकट हुए है। 

झूठ-सच तथा उससे परे जो अदृश्य जगत् है, वह भी मुझे हमेशा रहने वाले देवताओं से अलग नहीं है। मैं धर्म की रक्षा तथा स्थापना के लिये महात्माओं के साथ अनेक बार अनेक योनियों में अवतार धारण करता हूँ। मैं ही ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, इन्द्र तथा सबकी उत्पत्ति और प्रलय का कारण हूँ। 

जब-जब धर्म का नाश और अधर्म की वृद्धि होती है, तब-तब मैं विभिन्न योनियों में प्रविष्ट होकर धर्ममर्यादा की स्थापना करता हूँ। जब देवयोनि में अवतार लेता हूँ, तब मेरे सारे आचार-व्यवहार देवताओं के समान होते हैं। 

गन्धर्व योनि में अवतार लेने पर गन्धों के समान हो जाता हूँ तथा नाग, यक्ष, राक्षस योनियों में अवतार लेने पर उन-उन योनियों के सदृश आचार-व्यवहार का पालन करता हूँ। 

सुदर्शन पर जगदम्बा की कृपा

इस समय में मनुष्य रूप में प्रकट हुआ हूँ। अतएव मैंने कौरवों से दीनतापूर्वक प्रार्थना की, किन्तु मोहग्रस्त होने के कारण उन्होंने मेरी बात नहीं मानी। अतः युद्ध में प्राण देकर इस समय वे स्वर्ग में पहुँचे हैं।'

इस पर उत्तङ्क मुनि ने कहा-'जनार्दन ! मैं जानता हूँ, आप जगदीश्वर हैं। अब मैं आपको शाप नहीं दूँगा। आप कृपा कर अपना विश्वरूप मुझे दिखलायें। तत्पश्चात् भगवान् ने उन्हें सनातन विष्णु-स्वरूप का दर्शन कराया और वर माँगने के लिये प्रेरित किया। 

क्या श्री कृष्ण ने उत्तङ्क मुनि को मूत्र पिलाया था?

उत्तङ्क मुनि ने उस मरुभूमि(रेगिस्तान या रेतीले स्थान)में जल मिलने का वर माँगा। भगवान् श्री कृष्ण ने कहा- 'जब भी जल की आवश्यकता हो, तब-तब मेरा स्मरण कीजिये।' यह कहकर श्रीकृष्ण द्वारका को चल पड़े।

एक दिन उत्तङ्क मुनि को बड़ी प्यास लगी। वे पानी के लिये चारों ओर घूमने लगे। इतने में ही उन्हें श्रीकृष्ण की कही बात आयी। उन्होंने श्रीकृष्ण को याद किया। तब उन्होंने देखा कि - एक नंगधग, कुत्तों से घिरा भीषण आकार का चाण्डाल चला आ रहा है। 

उस चाण्डाल के मूत्रेन्द्रिय से लगातार जल की धारा गिर रही थी। वह मुनि के निकट आकर बोला-'महर्षे! आपको प्यास से व्याकुल देखकर मुझे बड़ी दया लगती है। आप जल्दी मेरे पास आकर जल पी लीजिये।

यह सुनकर उत्तङ्क मुनि को गुस्सा आया और वह उस चाण्डाल को डाँटने लगे तथा वर देने वाले श्रीकृष्ण को भी भला-बुरा बकने लगे। उनके इनकार करने पर कुत्तों के साथ चाण्डाल वहीं गायब हो गया। 

यह देखकर महात्मा उत्तङ्क मुनि समझ गये कि यह अवश्य श्रीकृष्ण की ही कोई माया है। तब तक भगवान् श्रीकृष्ण शंख, चक्र, धारण किये वहाँ प्रकट हो गये। उनको देखते ही उत्तङ्क बोल उठे- 'केशव ! प्यास से व्याकुल ब्राह्मण को चाण्डाल का मूत्र देना आपको उचित नहीं।'

श्रीकृष्ण ने बड़े मधुर शब्दों में कहा- 'मनुष्य को प्रत्यक्ष रूप से अमृत नहीं पिलाया जाता। इससे मैंने चाण्डाल वेषधारी इन्द्र को गुप्त रूप से अमृत पिलाने भेजा था, किन्तु आप उन्हें पहचान न सके। 

पहले तो देवराज आपको अमृत देने के लिए तैयार नहीं थे। पर मेरे बार-बार अनुरोध करने पर वे इस शर्त पर आपको अमृत पिलाने तथा अमर बनाने पर तैयार हो गये कि यदि ऋषि चाण्डाल-वेष में तथाकथित ढंग से अमृत पी लेंगे, तब तो मैं उन्हें दे दूँगा और यदि वे न लेंगे तो अमृत से वंचित रह जाएँगे। 

पर खेद है आपने अमृत नहीं ग्रहण किया। आपने उनको लौटाकर बड़ा बुरा किया। अस्तु ! अब मैं आपको पुनः वर देता हूँ कि जिस समय आप पानी पीने की इच्छा करेंगे, उसी समय बादल मरुभूमि में पानी बरसाकर आपको स्वादिष्ट जल देंगे। उन मेघों का नाम उत्तङ्क-मेघ होगा।'

क्या श्री कृष्ण ने उत्तङ्क मुनि को मूत्र पिलाया था?


भगवान् के ऐसा कहने पर उत्तङ्क मुनि तब से बड़ी प्रसन्नता से वहीं रहने लगे। और तब से लेकर अब तक उत्तङ्क -मेघ मारवाड़ की मरुभूमि में पानी बरसाते रहते हैं।

तो प्रिय पाठकों, कैसी लगी आपको कहानी। आशा करते हैं अच्छी लगी होगी। इसी के साथ विदा लेते हैं। अगली पोस्ट के साथ विश्वज्ञान मे फिर से मुलाकात होगी। तब तक के लिय आप अपना ख्याल रखें, हंसते रहिए, मुस्कराते रहिए और औरों को भी खुशियाँ बांटते रहिए। 

धन्यवाद 

जय श्री राधे कृष्ण 

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