सच्चा गुरु कौन होता है? जानिए गुरु की महिमा, अर्थ और क्या बिना गुरु मोक्ष संभव है
सच्चा गुरु वह होता है जो व्यक्ति को अज्ञान से ज्ञान की ओर ले जाकर उसे ईश्वर से जोड़ता है। “गुरु” शब्द का अर्थ है- ‘गु’ यानी अंधकार और ‘रु’ यानी अंधकार दूर करने वाला। गुरु की महिमा इसलिए अपार मानी गई है क्योंकि वह जीवन का सही मार्ग दिखाकर मनुष्य को मोक्ष की ओर ले जाता है। शास्त्रों के अनुसार बिना गुरु के सच्चे ज्ञान की प्राप्ति कठिन मानी गई है, लेकिन सच्ची श्रद्धा और ईश्वर कृपा से मार्ग अवश्य खुलता है।
हर हर महादेव!- प्रिय पाठकों ,भगवान शिव का आशीर्वाद आप सभी को प्राप्त हो।
आज के समय में “गुरु” शब्द बहुत सामान्य हो गया है, लेकिन क्या हर गुरु सच में गुरु होता है? क्या किसी को भी अपना मार्गदर्शक मान लेना सही है? या फिर बिना गुरु के ही भक्ति करना बेहतर है? ऐसे कई प्रश्न मन में उठते हैं, और इन्हीं प्रश्नों के बीच इंसान कभी सही रास्ता पकड़ लेता है, तो कभी भ्रम में पड़ जाता है।
श्री कृष्ण ने भगवद गीता में स्पष्ट संकेत दिया है कि सच्चा गुरु वह है जो सभी प्राणियों के कल्याण के लिए सोचता है, न कि उन्हें अपने प्रभाव में बाँधने के लिए।
इसीलिए यह विषय केवल ज्ञान का नहीं, बल्कि जीवन की दिशा तय करने वाला है।
अगर गुरु सही मिला, तो जीवन सफल हो सकता है… और अगर गलत मिल गया, तो भटकाव भी संभव है।
इस पोस्ट में हम बहुत सरल और स्पष्ट भाषा में समझेंगे—
- गुरु शब्द का असली अर्थ क्या है
- सच्चे गुरु की पहचान कैसे करें
- किन नकली गुरु या महात्माओं से बचना चाहिए
- गुरु की महिमा क्यों अपार कही गई है
- और गुरु में कौन-से चार गुण होने चाहिए
तो आइए, बिना किसी भ्रम के, सच्चाई को समझने का प्रयास करते हैं…
गुरु शब्द का असली अर्थ क्या है
![]() |
| सच्चा गुरु वही है जो अज्ञान से ज्ञान की ओर ले जाकर ईश्वर से जोड़ता है |
बलिहारी गुरु देव की ,गोविन्द दियो बताये।।
ये कहावत जगत भर में प्रसिद्ध है। इस कहावत का अर्थ है कि -यदि आपके सामने गुरु और गोविन्द दोनों खड़े हो तो आप पहले किनके पैरो को स्पर्श करोगे। जाहिर सी बात है --पहले गुरु के ही पैर छुये जाएंगे। क्योकि भगवान् गुरु से बढ़ कर नहीं है। ये बात तो खुद प्रभु श्री कृष्ण ने अपने मुख से कही है की जो मनुष्य गुरु का सम्मान नहीं करता वो मुझे प्रिये नहीं है ,और ना कभी मेरी भक्ति पा सकता है। क्योकि गुरु बिना शिक्षा नहीं और गुरु बिना मुक्ति नहीं। इसलिए यदि भगवान् को पाना है तो पहले गुरु पूजा और फिर हरी पूजा। गुरु कृपा से ही मुक्ति मिलेगी ,--मुक्ति से ही भगवान।
अब सवाल आता है कि गुरु किसे बनाये क्योकि वर्तमान में तो अधिकतर लोगो का विश्वास गुरुओ पर से उठा हुआ है। और उनका ऐसा मानना भी गलत नहीं है। क्योकि आजकल के जो गुरु है वो शिष्यों को छोड़ कर धन के पीछे भागने लगे है।अपने कर्तव्यों को भूल कलयुग की चकाचौंध में खोते जा रहे है। और उनकी इस करनी से जो अच्छे गुरु ,संत ,महात्मा है। उन पर से भी विश्वास उठता जा रहा है। उन्हें कोई भी नहीं पूछता।
गुरु शब्द का अर्थ
गुरु शब्द दिखने में जितना छोटा है ,इसकी महानता उससे कही ज्यादा बढ़कर है। गुरु शब्द का -
पहला अक्षर गु --इसका अर्थ है। अन्धकार
और दूसरा अक्षर रु----- इसका अर्थ है प्रकाश
अथार्त -
जो अन्धकार को मिटा के रौशनी तरफ ले के जाए वो होता है गुरु ,जो भटके को रास्ता दिखाए वो होता है गुरु ,जो मन के विकारो को दूर कर अच्छी भावनाओ को जाग्रत करा दे वो होता है गुरु ,जो धरती पर ही भगवान् से मिला दे , उनके होने का आभास करा दे वो होता है सच्चा गुरु।
सच्चे गुरु की पहचान
गुरु महिमा अपार है अधिकतर लोग गुरु को ढूँढ़ते है ,पर जो मन के साफ सच्चे गुरु होते है वो शिष्यों को ढूँढ़ते है। क्योकि उनके अंदर जो शक्तियां होती है तेज़ होता है जिसे वो दीक्षा के रूप में अपने शिष्यों को देते है ,वो ऐसे ही किसी को भी नहीं दे सकते। हजारो में कोई एक य्वक्ति ही होता है जिसपे वे अपनी कृपा करते है (दीक्षा देते है )अपितु कल्याण तो वो सभी का करते है।
सच्चे गुरु के मन में शिष्यों के प्रति अपार प्रेम और दया की भावना होती है। जिस प्रकार एक माँ चाहे उसका बच्चा कितना भी दुराचारी क्यों न हो फिर भी उसके मन में अपने बच्चे के प्रति प्यार कभी कम नहीं होता। वो चाहे खुद भूखी प्यासी क्यों न रहे ,पर अपने बच्चे को कभी भूखा नहीं रखती।
ठीक ऐसी ही कृपा ,प्यार और दुलार सच्चे गुरु अपने शिष्यों के प्रति रखते है। उनमे इतनी सामर्थ होती है की वो एकबार जिसे अपना शिष्य मान ले तो वो उसका उद्धार कर देते है। सच्चे गुरु को गुरु बनने का शौक नहीं होता, वो बिना किसी स्वार्थ के लोगों का भला करने में सक्षम रहते है। सच्चे गुरु कभी भी खुद को भगवान से बढ़ कर नहीं बताते (अपितु वास्तव में उनका दर्जा भगवान् से बढ़कर ही होता है तो भी उनके मन में इस बात का ज़रा भी घमंड नहीं होता )
ऐसे गुरु,महात्मओं से बचे।
जो गुरु, महात्मा और संत भगवान् की जगह अपनी पूजा करवाना चाहते हो। जो चकाचौंध में फसें हो और जो शिष्यों को बनाने की भावना रखते हो। संसार में प्रसिद्ध होना चाहते हो।खुद अपनी फीस (धन ) मांगते हो ,वो गुरु- गुरु नहीं बल्कि पाखंडी होते है ऐसे गुरु शिष्यों का तो दूर खुद का भी कल्याण नहीं कर सकते। इसलिए ऐसे गुरुओ से बचे।
गुरु महिमा अपार।
सच्चे गुरु की कृपा बड़ी कठिन है। गुरु अपनी कृपा सब पर बरसाते है ,पर उन्हें प्राप्त कोई कोई ही कर सकता है।भगवान् की बनाई हुई प्रकर्ति की हर वस्तु सभी के लिए सामान होती है। सर्दी,गर्मी,वर्षा,छाँव,धुप सब पर सामान रूप से पड़ती है। पर हर कोई उनको अपने तरीको से उपयोग में लेता है।
जैसे धरती पर वर्षा सामान रूप से होती है ,पर जिसने जैसा बीज बोया होता है -वैसी ही फसल पाता है। अथार्त आम का पेड़ लगाओगे तो आम का ही फल पाओगे,-सेब का नहीं। वैसी ही कृपा संत ,महात्मा और गुरु की सब पर सामान रूप से होती है। जो जैसा चाहे उनसे वैसा लाभ पा सकता है।
एक अत्यधिक महत्वपूर्ण बात -
की सिर्फ गुरु बनाने से ही कल्याण नहीं होता बल्कि उनके उपदेशो को ,बातो को मानने से होता है। गुरु कभी मरते नहीं अथार्त गुरु एक आत्मा की तरह होते है ,जो जीवित रहने पर भी और मरने के बाद भी अपने दिव्य उपदेशो द्वारा जगत में प्रसिद्ध रहते है।
बिना गुरु के यदि भगवान् को पाना हो, तो उनके नाम का जप करना ,उनमे ध्यान लगाना और उनकी सेवा आदि करना -इन बातो का विशेष ध्यान रखना पड़ता है। लेकिन गुरु सेवा इससे हट कर है। गुरुओ से लाभ पाने के लिए आपको सिर्फ उनकी आज्ञापालन ,सेवा और उनके संग का ही ध्यान रखना पड़ता है।
मनुष्य को गुरु के नाम जप और ध्यान करने की कोई आवश्यकता नहीं। यदि कुछ आवश्यक है तो वो है सिर्फ उनकी आज्ञा का पालन करना और उनके सिद्धांतो को मानना। इतना करना ही सच्ची गुरु पूजा होती है। और वो इससे खुश भी होते है।
गुरु की सबसे ख़ास पहचान
सच्चे गुरुओ को अपने से ज्यादा उनके सिद्धांत प्रिय होते है। इनके लिए वो अपने प्राणो को गंवाने तक की चिंता नहीं करते। सच्चे गुरु की सबसे ख़ास पहचान यही है - की वो खुद की आज्ञा ,पूजन और ध्यान नहीं करवाते, बल्कि उसकी जगह मनुष्य को रामायण ,गीता आदि पवित्र ग्रंथो को पढ़ने के लिए प्रेरित करते है। न की अपनी फोटो को घर और मंदिर में लगाने की सलाह देते है। जो ऐसा करते है वो धोका देने वाले गुरु ,संत होते है।
इस बात को थोड़ा और विस्तार से बताते हुए अलग से हमने ये ek पोस्ट लिखी है यदि जानना चाहे तो पढ़े- क्या सत्संग में जाना सही है, जब वहाँ भगवान की बजाय सिर्फ गुरु की महिमा की जाती है?
आखिर, हम किसी की बात पर क्यों जाए। ये तो व्यक्ति को खुद भी समझना चाहिए की भगवान् की एक अजर ,अमर, दिव्य मूर्ति की जगह यदि हम इन मानव शरीरो की फोटो को मंदिर में लगाये या गले में लटकाये ,ये कहाँ की समझदारी है। हमारी समझ से तो ये बिलकुल गलत है। बल्कि ऐसा करने से दोष जरूर लगता है।
भगवान् श्री कृष्ण जी ने गीता में कहा है की -
सच्चे गुरुओ की दृस्टि संसार में समस्त प्राणियों यानी मनुष्यो के लिए उनके हित की होती है। न की उनको अपनी तरफ खींचने की। वो न तो किसी को अपना शिष्य बनाते है ,और न किसी से कुछ लेते है। वो तो हर पल दुसरो के कल्याण के बारे में ही सोचते है। अपने कल्याण के बारे में नहीं।
जो सच्चे गुरु होते है ,उनके अंदर असंभव को संभव करने की क्षमता होती है ,उनके अंदर ये चार गुण पूर्ण रूप से होते है।शब्द ,स्मरण ,स्पर्श और दृस्टि। इन चार प्रकारो से शिष्यों पर गुरु की कृपा होती है और यही दीक्षा है।इसलिए आप इस बात को जरा ध्यान से समझे। गुरु महिमा अपार है इन चार उदाहरणों से आप समझने की कोशिश कीजिये।
क्या सच्चे सन्त का शाप भी मंगलकारी होता है- जानने के लिए पढ़े ये चार पौराणिक कथाएं
गुरु में स्थित चार गुण
शब्द -
स्मरण -
स्पर्श -
दृष्टि -
मित्रों ,
अतः भविष्य में इस बात का हमेशा ध्यान रखना चाहिए कि या तो जीवन मे कोई गुरु न बनाये ,खुद शुद्धता और सच्ची भक्ति के साथ भगवान की आराधना पूजा -पाठ करें। और अगर गुरु बनाये तो सोच समझ कर बनाये
प्रिय पाठकों!आशा करते हैं कि आपको पोस्ट पसंद आई होगी।इसी के साथ भगवान शिव से आपके जीवन की मंगल कामनायें करते हुए अपनी बात को यही समाप्त करते है। विश्वज्ञान में अगली पोस्ट के साथ फिर मुलाकात होगी।तब तक के लिए हर-हर महादेव।
धन्यवाद।

