चर्पटपञ्चरिका स्तोत्र - वैराग्य और भक्ति का अमृत संदेश
चर्पटपञ्चरिका स्तोत्र का मुख्य संदेश यह है कि संसार अनित्य है और धन, रूप, यश सब क्षणभंगुर हैं। मृत्यु के समय न विद्या साथ देती है न तर्क, केवल ईश्वर-भक्ति ही मनुष्य का वास्तविक सहारा बनती है। इसलिए मनुष्य को मोह, तृष्णा और अहंकार त्यागकर निरन्तर गोविन्द का स्मरण करना चाहिए — यही मुक्ति का मार्ग है।
आशा करते हैं कि आप स्वस्थ, प्रसन्नचित और प्रभु की कृपा में होंगे।
प्रिय पाठकों -यह चर्पटपञ्चरिकास्तोत्र बहुत ही दिव्य स्तोत्र है। यह स्तोत्र हमने हिंदी में लिखा है ,जिससे की भक्तों को स्पष्ट पता चले की इस स्तोत्र का संदेश क्या है।
चर्पटपञ्चरिका स्तोत्र आदि गुरु आदि शंकराचार्य द्वारा प्रदत्त वैराग्य और भक्ति का अत्यंत गूढ़ उपदेश है। यह स्तोत्र मनुष्य को संसार की नश्वरता, धन और मोह की अस्थिरता तथा ईश्वर-स्मरण की अनिवार्यता का बोध कराता है।
इसमें बताया गया है कि केवल शास्त्रीय ज्ञान या तर्क नहीं, बल्कि गोविन्द का भजन ही जीवन का सच्चा सहारा है। सरल हिंदी अर्थ के माध्यम से यहाँ प्रत्येक भाव को स्पष्ट किया गया है, ताकि साधक इसके आध्यात्मिक संदेश को सहज रूप से समझ सकें।
यदि आप इस स्तोत्र की संस्कृत जानना चाहते है , तो हमे बताये। आपके अनुरोध पर हम संस्कृत में भी लिखेंगे। तो चलिए सबसे पहले जाने-
डुकृञ् करणे क्या है?
डुकृञ् करणे -- यह पाणिनीय व्याकरण का एक धातु रूप है।
सरल अर्थ
डु + कृञ् (करणे)
यहाँ “कृ” धातु का अर्थ है - करना / क्रिया करना
“करणे” का भावार्थ - कर्म करना या क्रिया का होना
संदर्भ में अर्थ
स्तोत्र में इसका प्रयोग व्याकरण रटने के प्रतीक के रूप में हुआ है।
अर्थात
केवल शास्त्रीय ज्ञान या नियमों को रटना जीवन के अंतिम समय में सहारा नहीं बनता; ईश्वर-स्मरण ही सच्चा आश्रय है।
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| चर्पटपञ्चरिकास्तोत्र हिंदी में |
चर्पटपञ्चरिकास्तोत्र हिन्दी अर्थ
एक विद्वान ब्राह्मण थे। जिन्हे व्याकरण का बहुत अधिक ज्ञान था ,बहुत निपुण थे। जब वे बूढ़े हो गए उस समय भी वो व्याकर ही पढ़ा करते ,उसे ही रटते रहते। जिसे श्री शंकराचार्यजी ने देखा और उन्हें उपदेश दिया।
उन्होंने ब्राह्मण से कहा की -
तुम इस वृद्ध अवस्था में भी इस व्याकरण को ही रट रहे हो ,प्रभु का ज़रा सा भी नाम नहीं लेते, जबकि इस अवस्था में एक वो ही है जो तुम्हारी हर तरह से साथ देंगे ,पुकार सुनेंगे। उनके ध्यान से ही मुक्ति मिलेगी और उनका धाम प्राप्त होगा।
एक गोविन्द जी ही है ,जो हर प्रकार से इस संसार में रक्षा करते है। अतः हे मूढ़ !अथार्त अरे बुद्धिहीन !तू हमेशा गोविन्द को ही भज , उन्ही का ध्यान कर ,धनसंचय की लालसा को छोड़ ,सुबुद्धि धारण कर ,मन से तृष्णाहीन हो ,अपने प्रारब्धानुसार तुझे जो कुछ भी वित्त मिल जाय , उसी से मन को प्रसन्न रख। क्योकि मृत्यु समीप आने पर एक वो है जो तेरी रक्षा करेंगे ,मोक्ष प्रदान करेंगे।
हिमालयकृतं शिवस्तोत्रं | हिमालयकृतं शिवस्तोत्रं हिंदी अर्थ सहित
श्री शंकराचार्य जी के आध्यात्मिक संदेशों का सार
मित्रों, श्री शंकराचार्य जी ने जो भी उपदेश दिए ,वो सब इस चर्पटपञ्चरिका स्तोत्र में विस्तार से बताया गया है।
परम तत्व की पूजा कैसे संभव है?
- जो अखण्ड, सच्चिदानन्द और निर्विकल्प, अद्वितीय स्वरूप है -- उसकी पूजा किस प्रकार की जाए?
- जो पूर्ण है -- उसका आवाहन कहाँ किया जाए?
- जो समस्त जगत का आधार है -- उसे किस वस्तु का आसन अर्पित किया जाए?
- जो स्वच्छ और नित्य शुद्ध है -- उसे पाद्य और अर्घ्य कैसे अर्पित किए जाएँ?
- जो नित्य पवित्र है -- उसे आचमन की क्या आवश्यकता?
- जो निर्मल है -- उसे स्नान किस प्रकार कराया जाए?
- जिसके भीतर सम्पूर्ण संसार स्थित है -- उसे वस्त्र कैसा अर्पित किया जाए?
- जो वर्ण और गोत्र से रहित है -- उसके लिए यज्ञोपवीत कैसा?
- जो निर्लेप है -- उसे गन्ध कैसी अर्पित की जाए?
- जो निर्वासनिक है -- उसे पुष्पों से क्या अर्पण किया जाए?
- जो निर्विशेष है -- उसे शोभा की क्या अपेक्षा?
- जो निराकार है -- उसके लिए आभूषण किस प्रकार के?
- जो निरञ्जन है -- उसे धूप से क्या?
- जो सर्वसाक्षी है -- उसके लिए दीप कैसा?
- जो निजानन्दरूपी अमृत से तृप्त है -- उसे नैवेद्य किसलिए अर्पित किया जाए?
- जो स्वयंप्रकाश, चित्स्वरूप तथा सूर्य-चन्द्र आदि को भी प्रकाशित करने वाला है -- उसे ताम्बूल कैसे समर्पित किया जाए?
- जो अनन्त है -- उसकी परिक्रमा कैसी?
- जो अद्वितीय है -- उसे नमस्कार किस प्रकार किया जाए?
- जो वेदवाक्यों से भी अगोचर है -- उसका स्तवन कैसे किया जाए?
- जो स्वयंप्रकाश और सर्वव्यापक है -- उसकी आरती कैसे की जाए?
- जो भीतर और बाहर सर्वत्र परिपूर्ण है -- उसका विसर्जन कैसे संभव है?
मुख्य संदेश
ब्रह्मवेत्ता पुरुषों को सर्वदा, सभी अवस्थाओं में, एकत्व-बुद्धि से भगवान की परापूजा करनी चाहिए।
- हे शम्भो!
- मेरा आत्मा ही आप हैं
- मेरी बुद्धि श्री पार्वतीजी हैं
- मेरे प्राण आपके गण हैं
- यह शरीर आपकी कुटिया है
- नाना प्रकार की भोग-सामग्री आपका पूजोपचार है
- नींद समाधि है,
- मेरे चरणों का चलना आपकी प्रदक्षिणा है
- और मैं जो कुछ भी बोलता हूँ-वह सब आपके स्तोत्र हैं,
- अधिक क्या मैं जो कुछ भी करता हूँ,
- वह सब आपकी आराधना ही है।
- दिन और रात, सायंकाल और प्रातःकाल,
- शिशिर और वसन्त पुनः पुनःआते हैं
- इसी प्रकार कालकी लीला होती रहती है
- और आयु बीत जाती है,
- किन्तु आशारूपी वायु छोड़ती ही नहीं
- अतः हे मूढ ! निरन्तर गोविन्द को ही भज,
क्योंकि मृत्युके समीप आने पर डुकृञ् करणे यह रटना रक्षा नहीं कर सकेगी।
- दिन में आगे अग्नि और पीछे सूर्य से शरीर तपाते हैं,
- रात्रिके समय जानुओं में ठोड़ी दबाये पड़े रहते हैं,
- हाथ में ही भिक्षा माँग लाते हैं,
- वृक्ष के तले ही पड़े रहते हैं,
- फिर भी आशा का जाल जकड़े ही रहता है
- अतः हे मूढ !निरन्तर गोविन्द को ही भज,
क्योंकि मृत्युके समीप आनेपर डुकृञ् करणे यह रटना रक्षा नहीं कर सकेगी।
- अरे, जब तक तू धन कमाने में लगा हुआ है
- तभी तक तेरा परिवार तुझसे प्रेम करता है,
- जब जराग्रस्त होगा तो घर में कोई बात भी न पूछेगा
- अतः हे मूढ ! निरन्तर गोविन्दको ही भज,
क्योंकि मृत्युके समीप आनेपर डुकृञ् करणे यह रटना रक्षा न कर सकेगी।
- जटाजूटधारी होकर, मुण्डित होकर,
- लुञ्चितकेश होकर, काषायाम्बरधारी होकर,
- ऐसे नाना प्रकारके वेष धारण करके
- यह मनुष्य देखता हुआ भी नहीं देखता और
- पेटके लिये ही नाना प्रकार से शोक किया करता है
- अतः हे मूढ ! निरन्तर गोविन्द को ही भज,
क्योंकि मृत्यु के समीप आने पर यह डुकृञ् करणे रटना रक्षा न कर सकेगी।
- जिसने भगवद्गीताको कुछ भी पढ़ा है,
- गङ्गाजलकी जिसने एक बूंद भी पी है,
- एक बार भी जिसने भगवान् कृष्णचन्द्रका अर्चन किया है,
- उसकी यमराज क्या चर्चा कर सकता है
- अतः हे मूढ ! निरन्तर गोविन्दको ही भज,
क्योंकि मृत्युके समीपआनेपर डुकृञ् करणे रटना रक्षा न कर सकेगी।
- अङ्ग गलित हो गये, सिरके बाल पक गये,
- मुख में दाँत नहीं रहे, बूढ़ा हो गया, लाठी लेकर चलने लगा,
- फिर भी आशा पिण्ड नहीं छोड़ती
- अरे मूढ ! निरन्तर गोविन्द को भज,
क्योंकि मृत्युके समीप आने पर डुकृञ् करणे रटना रक्षा न कर सकेगी।
- बालक तो खेल-कूद में आसक्त रहता है,
- तरुण तो स्त्री में आसक्त है और वृद्ध भी
- नाना प्रकार की चिन्ताओं में मग्न रहता है,
- परब्रह्म में तो कोई संलग्न नहीं होता
- अतः अरे मूढ ! तू सदा गोविन्द का ही भजन कर,
क्योंकि मृत्यु के समीप आनेपर डुकृञ् करणे यह रटना रक्षा न कर सकेगी
- इस संसार में पुनः-पुनः जन्म, पुनः-पुनः मरण
- और बारंबार माता के गर्भ में रहना पड़ता है,
- अतः हे मुरारे ! मैं आपकी शरण हूँ।
- इस दुस्तर और अपार संसार से कृपया पार कीजिये।
- इस प्रकार अरे मूढ ! तू तो सदा गोविन्द का ही भजन कर
क्योंकि मृत्यु के समीप आने पर डुकृञ् करणे (यह रटना रक्षा न कर सकेगी ।
- रात्रि, दिन, पक्ष, मास, अयन और वर्ष
- कितनी ही बार आये और गये
- तो भी लोग ईर्ष्या और आशा को नहीं छोड़ते,
- अतः अरे मूढ ! तू सदा गोविन्द का भजन कर,
क्योंकि मृत्यु के समीप आने पर यह डुकृञ् करणे रटना रक्षा न कर सकेगी।
- अवस्था ढलने पर काम-विकार कैसा,
- जल सूखने पर जलाशय क्या तथा
- धन नष्ट होने पर परिवार ही क्या ?
- इसी प्रकार तत्त्वज्ञान होने पर संसार ही कहाँ रह सकता है
- अतः हे मूढ ! सदा गोविन्द को भज,
क्योंकि मृत्युके समीप आने पर यह डुकृञ् करणे रटना रक्षा न कर सकेगी।
- नारी के स्तनों और नाभिनिवेश में मिथ्या
- माया और मोह का ही आवेश है,
- ये मांस और मेद के ही विकार हैं-
- ऐसा बार-बार मन में विचार करो, अतः -
- हे मूढ ! सदा गोविन्द का भजन कर,
क्योंकि मृत्यु के समीप आने पर यह डुकृञ् करणे रटना रक्षा न कर सकेगी।
- स्वप्नवत् मिथ्या संसार की आस्था छोड़कर
- तू कौन है, मैं कौन हूँ ,
- कहाँ से आया हूँ, मेरी माता कौन है
- और पिता कौन है
- इस प्रकार सबको असार समझ तथा-
- हे मूढ ! निरन्तर गोविन्द का भजन कर,
क्योंकि मृत्यु के निकट आने पर यह डुकृञ् करणे रटना रक्षा न कर सकेगी।
- गीता और विष्णुसहस्रनाम का नित्य पाठ करना चाहिये,
- भगवान् विष्णु के स्वरूप का निरन्तर ध्यान करना चाहिये,
- चित्त को संतजनोंके सङ्ग में लगाना चाहिये
- और दीन जनों को धन दान करना चाहिये अतः-
- हे मूढ ! नित्य गोविन्द का ही भजन कर,
क्योंकि मृत्यु के निकट आने पर डुकृञ् करणे यह रटना रक्षा न कर सकेगी।
- जब तक प्राण शरीर में है तब तक ही-
- लोग घर में कुशल पूछते हैं,
- प्राण निकलने पर शरीर का पतन हुआ कि ,
- फिर अपनी स्त्री भी उससे भय मानती है अतः
- हे मूढ !नित्य गोविन्द को ही भज,
क्योंकि मृत्युके निकट आनेपर डुकृञ्करणे यह रटना रक्षा न कर सकेगी।
- पहले तो सुख से स्त्री-सम्भोग किया जाता है,
- किन्तु पीछे शरीर में रोग घर कर लेते हैं,
- यद्यपि संसार में मरना अवश्य है
- तथापि लोग पापाचरण को नहीं छोड़ते
- अतः हे मूढ ! सदा गोविन्दका भजन कर,
क्योंकि मृत्यु के निकट आनेपर डुकृञ् करणे यह रटना रक्षा न कर सकेगी।
मधुराष्टकं स्तोत्र हिंदी अर्थ साहित
- गली में पड़े चिथड़ों से वस्त्र बना लिया,
- पाप-पुण्य से परे मार्ग अपना लिया,
- न मैं हूँ, न तू है और न यह संसार है- (ऐसा भी जान लिया),
- फिर भी किस लिये शोक किया जाता है
- अतः हे मूढ ! सदा गोविन्द का भजन कर,
क्योंकि मृत्यु के निकट आने पर डुकृञ् करणे यह रटना रक्षा न कर सकेगी।
- चाहे गङ्गा-सागर को जाय,
- चाहे नाना व्रतोपवासों का पालन अथवा दान करे
- तथापि बिना ज्ञान के इन सबसे -
- सौ जन्म में भी मुक्ति नहीं हो सकती
- अतः हे मूढ ! सर्वदा गोविन्द का भजन कर,

