हिमालयकृतं शिवस्तोत्रम् – उत्पत्ति, संस्कृत पाठ, हिंदी अर्थ और आध्यात्मिक महत्व

VISHVA GYAAN

हिमालयकृतं शिवस्तोत्रम् – उत्पत्ति, महत्व और हिंदी अर्थ 

जय शिव शंकर प्रिय पाठकों 🙏 आशा करते हैं भगवान शिव की कृपा से आप स्वस्थ,सकुशल और प्रसन्नचित होंगे। 

हिमालयकृतं स्तोत्र क्या है? 


हिमालयकृतं शिवस्तोत्रम् एक अत्यंत प्राचीन और भावपूर्ण शिव-स्तुति है। यह एक अत्यंत भावपूर्ण स्तोत्र है। जिसका उल्लेख श्रीब्रह्मवैवर्त महापुराण (श्रीकृष्ण जन्म खंड) में मिलता है। इसके अलावा इस स्तोत्र का उल्लेख कुछ शिव-भक्ति परंपराओं, पुराणों और स्तोत्र-संग्रहों में मिलता है।

स्तोत्र के रचनाकार 


इस स्तोत्र की विशेषता यह है कि इसकी रचना किसी ऋषि या देवता ने नहीं, बल्कि पर्वतराज हिमालय ने स्वयं भगवान शिव की स्तुति में की।


हिमालय कौन है 


हिमालय यहाँ केवल एक पर्वत नहीं, बल्कि माँ पार्वती के पिता और एक जाग्रत चेतन सत्ता के रूप में माने जाते हैं।

हिमालय ने शिव को केवल ईश्वर नहीं,
बल्कि योगी, तपस्वी और साक्षात् ब्रह्म के रूप में देखा।
इस स्तोत्र में एक पिता का भाव भी है और एक भक्त की पूर्ण शरणागति भी।


इस स्तोत्र में शिव को-


  • ब्रह्मा, विष्णु और महेश
  • काल से परे चेतना
  • निर्गुण और सगुण दोनों
  • तथा समस्त देवताओं के मूल कारण
  • के रूप में स्वीकार किया गया है।


यह स्तोत्र क्यों विशेष है

इस स्तोत्र में शास्त्रीय भारी भाषा नहीं, बल्कि सरल, सच्चा भाव है। यह स्तोत्र बताता है कि - जब अहंकार नहीं, केवल समर्पण होता है- तब स्तुति स्वयं स्तोत्र बन जाती है
इसमें शिव को पाने की कोई याचना नहीं,
केवल स्वीकृति और कृतज्ञता है।

इसी कारण हिमालयकृतं शिवस्तोत्रम् केवल एक पाठ नहीं, बल्कि शिव-तत्व को समझने का माध्यम है।


इस लेख में हम-


हिमालयकृतं शिवस्तोत्रम् का संस्कृत पाठ

सरल हिंदी अर्थ और इसके पाठ का आध्यात्मिक महत्व

पाठ कब और कैसे करें व लाभ के बारे मे 

विस्तार से समझेंगे। 

हिमालयकृतं शिवस्तोत्रम् – हिमालय पर्वत पर ध्यानस्थ भगवान शिव
यह चित्र हिमालयकृतं शिवस्तोत्रम् में वर्णित शिव-तत्त्व को भावात्मक रूप से दर्शाता है।


हिमालयकृतं शिवस्तोत्रं संस्कृत में 


त्वं ब्रह्मा सृष्टिकर्ता च त्वं विष्णुः परिपालकः ।

त्वं शिवः शिवदोऽनन्तः सर्वसंहारकारकः ।।



त्वमीश्वरो गुणातीतो ज्योतीरूपः सनातनः ।

प्रकृतिः प्रकृतीशश्च प्राकृतः प्रकृतेः परः ।।



नानारूपविधाता त्वं भक्तानां ध्यानहेतवे ।

येषु रूपेपु यत्प्रीतिस्तत्तद्रूपं बिभर्षि च ।।



सूर्यस्त्वं सृष्टिजनक आधारः सर्वतेजसाम ।

सोमस्त्वं सस्यपाता च सततं शीतरश्मिना ।।



वायुस्त्वं वरुणस्त्वं च विद्वांश्च विदुषां गुरुः ।

इन्द्रस्त्वं देवराजश्च कालो मृत्युर्मस्तथा ।।



मृत्युञ्जयो मृत्युमृत्युः कालकालो यमान्तकः ।

वेदस्त्वं वेदकर्ता च वेदवेदाङ्गपारगः ।।



विदुषां जनकस्त्वं च विद्वांश्च विदुषां गुरुः ।  

 मन्त्रस्त्वं हि जपस्त्वं हि तपस्त्वं तत्फलप्रदः ।।



वाक त्वं रागाधिदेवी त्वं तत्कर्ता तद्गुरुः स्वयम । 

अहो सरस्वतीबीज कस्त्वां स्तोतुमिहेश्वरः ।।



इत्येवमुक्त्वा शैलेन्द्रस्तस्थौ धृत्वा पदांबुजम ।  

तत्रोवास तमाबोध्य चावरुह्य वृषाच्छिवः ।।



स्तोत्रमेतन्महापुण्यं त्रिसन्ध्यं यः पठेन्नरः । 

मुच्यते सर्वपापेभ्यो भयेभ्यश्च भवार्णवे ।।



अपुत्रो लभते पुत्रं मासमेकं पठेद्यदि ।  

भार्याहीनो लभेद्भार्यां सुशीलां सुमनोहराम ।।



चिरकालगतं वस्तु लभते सहसा ध्रुवम।  

राज्यभ्रष्टो लभेद्राज्यं शङ्करस्य प्रसादतः।।



कारागारे श्मशाने च शत्रुग्रस्तेऽतिसङ्कटे। गभीरेऽतिजलाकीर्णे भग्नपोते विषादने।।

रणमध्ये महाभीते हिंस्रजन्तुसमन्विते, 

यः पठेच्छ्रद्धया सम्यक स्तोत्रमेतज्जगद्गुरोः ।

सर्वतो मुच्यते स्तुत्वा शङ्करस्य प्रसादतः।।

  

 इति श्रीब्रह्मवैवर्ते महापुराणे श्रीकृष्णजन्मखण्डे हिमालयकृतं शिवस्तोत्रं संपूर्णम ॥



हिमालयकृतं शिवस्तोत्रं हिंदी अर्थ सहित 


त्वं ब्रह्मा सृष्टिकर्ता च त्वं विष्णुः परिपालकः ।

 त्वं शिवः शिवदोऽनन्तः सर्वसंहारकारकः।।

हिमालय ने कहा — ( हे परम शिव ) आप ही इस सृष्टि को चलाने वाले (सृष्टिकर्ता ) ब्रह्मा हैं। आप ही इस जगत के पालनहारअथार्त पालन -पोषण करने वाले विष्णु हैं। आप ही सबका संहार (अंत )करने वाले अनन्त हैं और आप ही सबका कल्याण करने वाले कल्याणकारी शिव हैं ।।१।।


  त्वमीश्वरो गुणातीतो ज्योतीरूपः सनातनः

  प्रकृतिः प्रकृतीशश्च प्राकृतः प्रकृतेः परः।।


हे भोलेनाथ !आप गुणातीत ईश्वर है अथार्त जिनके गुणों को न कहा जा सके ,जो गुणों से भरपूर हो ,आप सनातन ज्योतिस्वरूप (सदियों से चली आ रही दिव्य रौशनी )हैं। प्रकृति और प्रकृति के ईश्वर हैं अथार्त वह मूलतत्व जिसका परिणाम जगत है । प्राकृत पदार्थ होते हुए भी प्रकृति से परे हैं ।।२।।



  नानारूपविधाता त्वं भक्तानां ध्यानहेतवे ।

  येषु रूपेपु यत्प्रीतिस्तत्तद्रूपं बिभर्षि च ।।


हे शिव !आप इतने दयालु है की आप भक्तों के ध्यान(भजन ) करने के लिए अनेक रूप धारण करते हैं। जो मनुष्य जिस रूप में आपको प्यार करता है ,जिस रूप में आपको देखना चाहता है , आप उसके लिए वही रूप धारण कर लेते हैं ।। ३।.



  सूर्यस्त्वं सृष्टिजनक आधारः सर्वतेजसाम ।

  सोमस्त्वं सस्यपाता च सततं शीतरश्मिना।।


आप ही सृष्टि के जन्मदाता (जीवन देने वाले )सूर्य हैं। समस्त तेजों के आधार हैं। आप ही शीतल किरणों से सदा शस्यों का पालन करनेवाले सोम हैं ।।४।।



वायुस्त्वं वरुणस्त्वं च विद्वांश्च विदुषां गुरुः ।

इन्द्रस्त्वं देवराजश्च कालो मृत्युर्मस्तथा।।


आप ही हवा (वायु ), पानी (वरुण) और सर्वदाहक अग्नि हैं। आप ही देवराज इंद्र , काल , मृत्यु तथा यम हैं ।।५।।



मृत्युञ्जयो मृत्युमृत्युः कालकालो यमान्तकः।   

वेदस्त्वं वेदकर्ता च वेदवेदाङ्गपारगः।।


मृत्युंजय होने के कारण मृत्यु की (मृत्यु को जीत लेने बाद )भी मृत्यु , काल के भी काल तथा यम के भी यम हैं। वेद , वेदकर्ता तथा वेद -वेदांगों के पारंगत विद्वान् भी आप ही हैं।।६।।



विदुषां जनकस्त्वं च विद्वांश्च विदुषां गुरुः।  

मन्त्रस्त्वं हि जपस्त्वं हि तपस्त्वं तत्फलप्रदः।।


आप ही विद्वानों के जनक , विद्वान् तथा विद्वानों के गुरु हैं। आप ही मंत्र , जप , तप और उनके फलदाता हैं।।७।।



वाक त्वं रागाधिदेवी त्वं तत्कर्ता तद्गुरुः स्वयम। 

अहो सरस्वतीबीज कस्त्वां स्तोतुमिहेश्वरः।।


आप ही वाक् (शब्द )और वाणी (बोली )की अधिष्ठात्री देवी हैं। आप ही उनके सृष्टा और गुरु हैं। अहो ! सरस्वती बीजस्वरूप आपकी स्तुति यहां कौन कर सकता है अथार्त किसी मनुष्य या देवताओं में इतनी सामर्थ नहीं जी आपकी स्तुति कर सके। ।.८। .



इत्येवमुक्त्वा शैलेन्द्रस्तस्थौ धृत्वा पदांबुजम।  

तत्रोवास तमाबोध्य चावरुह्य वृषाच्छिवः।।


ऐसा कहकर पर्वतराज हिमालय (गिरिराज हिमालय ) ने भगवान शिवजी के चरणकमलों (पैरौं ) को पकड़कर खड़े रहे।भगवान शिव ने वृषभ (बैल ) से उतरकर शैलराज (पर्वत राज किमालय ) को प्रबोध (सत्यज्ञान) देकर वहाँ निवास किया।।९।।


स्तोत्रमेतन्महापुण्यं त्रिसन्ध्यं यः पठेन्नरः। 

मुच्यते सर्वपापेभ्यो भयेभ्यश्च भवार्णवे ।।


जो मनुष्य तीनों समय इस परम् पुण्य व दिव्य स्तोत्र का पाठ करता है ,वह भवसागर (संसाररूपी सागर )में रहकर भी समस्त पापों तथा भयों से मुक्त हो जाता है ।.१०।.



अपुत्रो लभते पुत्रं मासमेकं पठेद्यदि ।  

भार्याहीनो लभेद्भार्यां सुशीलां सुमनोहराम ।।
  

यदि किसी मनुष्य के पास पुत्र न हो तो वो अगर एक महीने तक इस सुंदर व दिव्य पाठ सुने या करे तो उसे पुत्र प्राप्ति अवश्य होती है। इसी तरह यदि कोई भार्याहीन है अथार्त जिस आदमी की शादी न हो रही वह इस का श्रवण करे तो उसे सुंदर व सुशील भार्या (पत्नी ) की प्राप्ति होती है ।.११।.



चिरकालगतं वस्तु लभते सहसा ध्रुवम।  

राज्यभ्रष्टो लभेद्राज्यं शङ्करस्य प्रसादतः।।


वह बहुत समय से खोयी हुई वस्तु को सरलता तथा अवश्य पा लेता है। जिस व्यक्ति का राज्य पूरी तरह नष्ट हो चुका हो या बहुत ऊँचे पद निचे गिर गया हो वह मनुष्य भगवान भोलेनाथ के आशीर्वाद से दुबारा उस राज्य व पद को प्राप्त कर लेता है ।.१२।.

 

कारागारे श्मशाने च शत्रुग्रस्तेऽतिसङ्कटे। 

गभीरेऽतिजलाकीर्णे भग्नपोते विषादने।।

रणमध्ये महाभीते हिंस्रजन्तुसमन्विते, 

यः पठेच्छ्रद्धया सम्यक स्तोत्रमेतज्जगद्गुरोः ।

सर्वतो मुच्यते स्तुत्वा शङ्करस्य प्रसादतः।।



कारागार , श्मशान और शत्रु संकट में पड़ने पर तथा अत्यंत जल से भरे गंभीर जलाशय में नाव टूट जाने पर , विष खा लेने पर , महाभयंकर संग्राम के बीच फंस जानेपर तथा हिंसक जंतुओं के बीच घिर जानेपर इस स्तुति का पाठ करके मनुष्य भगवान शंकर की कृपा से समस्त भयों से मुक्त हो जाता है।.१३ -१४।.


इति श्रीब्रह्मवैवर्ते महापुराणे श्रीकृष्णजन्मखण्डे हिमालयकृतं शिवस्तोत्रं संपूर्णम ॥


 

हिमालयकृतं शिवस्तोत्रम् का भावार्थ

शिव को ब्रह्मा-विष्णु-महेश क्यों कहा?

हिमालयकृतं शिवस्तोत्रम् में शिव को-

  • निर्गुण और सगुण दोनों रूपों में नमन और 
  • समस्त सृष्टि के आधार के रूप में वर्णन किया गया है। 

इसके अलावा शिव को-

  • काल से परे
  • जन्म-मरण से मुक्त
  • करुणा के सागर
  • बताया गया है।
यह स्तोत्र शिव के तत्त्वज्ञान को सरल भक्ति भाव में प्रकट करता है।

हिमालयकृतं शिवस्तोत्रम् का आध्यात्मिक महत्व


यह स्तोत्र शिव को किसी एक रूप में सीमित नहीं करता,
बल्कि उन्हें संपूर्ण सृष्टि की चेतना के रूप में स्वीकार करता है।

इस स्तोत्र में शिव-

  • सृष्टिकर्ता
  • पालनकर्ता
  • संहारकर्ता
  • तीनों रूपों में प्रकट होते हैं।

यह पाठ मनुष्य के भीतर-

  • भय
  • अस्थिरता
  • अहंकार
  • को शांत करता है और शरणागति का भाव उत्पन्न करता है।

इसी कारण यह स्तोत्र

ध्यान, जप और मानसिक शांति के लिए
अत्यंत प्रभावशाली माना गया है।

पाठ करने का लाभ (भावात्मक अर्थ में)

  • मन में स्थिरता और वैराग्य आता है
  • शिव को केवल “मांगने वाला देव” नहीं,
  • बल्कि अंतरात्मा के रूप में देखने की दृष्टि मिलती है
  • यह स्तोत्र ध्यान और मौन साधना के लिए अत्यंत उपयुक्त है।


कब और कैसे पढ़ें?

  • सोमवार, प्रदोष, या
  • शांत मन से, बिना जल्दबाजी
  • अर्थ समझकर या कम से कम भाव समझकर पूर्ण श्रद्धा के साथ करें। 

अंत में एक सरल बात

हिमालयकृतं शिवस्तोत्रम् हमें यह सिखाता है कि--
शिव को प्रसन्न करने के लिए शब्दों की सुंदरता नहीं,
हृदय की निर्मलता चाहिए।

शिव ही ऐसे इकलौते ईश्वर है जो जितनी जल्दी रूठते है तो उतनी ही जल्दी प्रसन्न भी हो जाते है। इनकी महिमा सबसे अलग है। उनकी इस विशेषता को बताते हुए हमने एक ब्लॉग पोस्ट लिखी है।

जिसमें बताया गया है कि शिव को प्राप्त करने के लिए किस चीज़ की आवश्यकता होती है? कैसे वो जल्दी प्रसन्न होते है। 

एक महत्वपूर्ण बात

इस स्तोत्र का कोई एक सर्वमान्य संस्कृत पाठ नहीं मिलता।
यह अलग-अलग स्तोत्र-संग्रहों और परंपराओं में
थोड़े-थोड़े अंतर के साथ मिलता है।
इसीलिए हमने आपको - भावार्थ दिया
किसी एक संस्करण को “अंतिम” बताकर भ्रम नहीं दिया।


हिमालयकृतं शिवस्तोत्रम् से जुड़े सामान्य प्रश्न (FAQs)


क्या हिमालयकृतं शिवस्तोत्रम् का कोई एक प्रमाणिक पाठ है?

हिमालयकृतं शिवस्तोत्रम् का कोई एक सर्वमान्य, शत-प्रतिशत समान पाठ उपलब्ध नहीं है।

यह स्तोत्र श्रीब्रह्मवैवर्त महापुराण (श्रीकृष्ण जन्म खंड) में वर्णित है,
परंतु विभिन्न स्तोत्र-संग्रहों और पांडुलिपियों में इसके श्लोकों के क्रम या शब्दों में हल्का अंतर मिलता है।

इसलिए शास्त्रीय दृष्टि से इसका भाव अधिक महत्वपूर्ण है, न कि शब्दों का बिल्कुल समान होना।

श्रद्धा और अर्थ के साथ किया गया पाठ ही इसका वास्तविक फल देता है।


क्या हिमालयकृतं शिवस्तोत्रम् का रोज पाठ किया जा सकता है?

हाँ, हिमालयकृतं शिवस्तोत्रम् का नित्य पाठ किया जा सकता है। यह स्तोत्र किसी विशेष व्रत या संकल्प से बंधा नहीं है।

जो लोग रोज पाठ नहीं कर सकते, वे इसे—
  • सोमवार
  • प्रदोष
  • या मानसिक शांति की आवश्यकता होने पर भी पढ़ सकते हैं।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि पाठ बोझ या दिखावे से नहीं,
बल्कि शांत मन और श्रद्धा से किया जाए।


क्या केवल सुनने से भी हिमालयकृतं शिवस्तोत्रम् का फल मिलता है?

हाँ, श्रद्धा से सुनने मात्र से भी इस स्तोत्र का फल मिलता है

पुराणों में यह स्पष्ट कहा गया है कि-

जहाँ भाव होता है, वहाँ शब्द स्वयं फल देने लगते हैं।
जो व्यक्ति स्वयं पाठ नहीं कर सकता,
यदि वह ध्यानपूर्वक, एकाग्र मन से इस स्तोत्र को सुनता है,
तो भी उसके मन में शांति, स्थिरता और सकारात्मक परिवर्तन आता है।
हालाँकि, अर्थ समझकर सुनना फल को और अधिक गहरा बना देता है।


क्या यह स्तोत्र गृहस्थ लोग भी पढ़ सकते हैं?

हाँ, हिमालयकृतं शिवस्तोत्रम् गृहस्थों के लिए पूर्णतः उपयुक्त स्तोत्र है।
यह किसी तांत्रिक विधि, संन्यास या कठोर नियम से जुड़ा नहीं है।

इस स्तोत्र में--

  • गृहस्थ जीवन
  • संतुलन
  • कर्तव्य और वैराग्य
  • तीनों का सुंदर समन्वय दिखाई देता है।
  • इसी कारण यह स्तोत्र
  • विद्यार्थियों, गृहस्थों और साधकों-
  • सभी के लिए समान रूप से उपयोगी माना गया है।

यह लेख शास्त्रीय ग्रंथों, पुराणिक संदर्भों और भक्ति परंपराओं के आधार पर तैयार किया गया है।

तो प्रिय पाठकों, कैसी लगी आपको पोस्ट ,हम आशा करते हैं कि आपकों पोस्ट पसंद आयी होगी। 

इसी के साथ विदा लेते हैं अगली रोचक, ज्ञानवर्धक जानकारी के साथ विश्वज्ञान मे फिर से मुलाकात होगी ,तब तक के लिय आप अपना ख्याल रखे, हंसते रहिए, मुस्कराते रहिए और औरों को भी खुशियाँ बांटते रहिए।

धन्यवाद ,
हर हर महादेव। जय श्री कृष्ण। 🙏

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