क्या सचमुच गर्भ में पल रहा शिशु अपने पिछले जन्मों को याद करता है? क्या वह भगवान से प्रार्थना करता है और जन्म लेते ही सब कुछ भूल जाता है? आइए, गरुड़ पुराण में वर्णित इस अद्भुत रहस्य को सरल भाषा में समझते हैं।
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क्या गर्भ में बच्चा अपने पिछले जन्म को याद रखता है?
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| गरुड़ पुराण के अनुसार गर्भस्थ शिशु का चिंतन |
दोस्तों! हम सभी जानते हैं कि प्रत्येक मनुष्य जन्म लेने से पहले लगभग नौ महीने अपनी माँ के गर्भ में रहता है। उसी समय से एक माँ अपने आने वाले बच्चे के लिए अनगिनत सपने और उम्मीदें संजोने लगती है।
लेकिन क्या आपने कभी यह विचार किया है कि गर्भ में पल रहा शिशु क्या सोचता होगा? क्या वह कुछ महसूस करता है? क्या उसे अपने पिछले जन्मों का स्मरण रहता है? और क्या वास्तव में उसे गर्भ में किसी प्रकार के कष्टों का अनुभव होता है?
गरुड़ पुराण में इन प्रश्नों का अत्यंत रोचक और गहन वर्णन मिलता है। इस ग्रंथ के अनुसार गर्भस्थ जीव अपने पूर्व जन्मों को याद करता है, अपने कर्मों पर विचार करता है, भगवान से प्रार्थना करता है और गर्भ में अनेक प्रकार के कष्ट भी सहन करता है।
आइए, अब गरुड़ पुराण में वर्णित इस अद्भुत प्रसंग को सरल और सहज भाषा में विस्तार से समझते हैं।
गरुड़ पुराण में गर्भस्थ जीव का वर्णन
धर्मकाण्ड के प्रेतकल्प अध्याये में पक्षीराज गरुड़ भगवान विष्णु से पूछते हैं कि हे प्रभु ! जब कोई आत्मा दूसरा शरीर धारण करने से पहले अपनी मां के गर्भ में होती है तो वह कैसा महसूस करती है। कृपया मुझे विस्तार से बताइए। तब भगवान विष्णु गर्व से कहते हैं।
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| भगवान विष्णु शेषनाग की शय्या पर लेटे हुए सुन्दर छवि |
गर्भस्थ जीव को अपने पिछले जन्म कैसे याद रहते हैं?
हे गरूड़ ! गर्भस्थ जीव को अपने पूर्व जन्मों का ज्ञान रहता है। वह वहां स्मरण करता है की आयु के समाप्त होने पर शरीर का परित्याग करके अब मैं मलादी में रहने वाले छोटे छोटे-छोटे क्रीमीय कीटाणुओं की एक विशेष योनि में स्थित हूं । पहले में सरक कर चलने वाले सर्प की योनि में पहुंचा। फिर मच्छर हो गया था। उसके बाद चार पैरों वाला अब्र या वृषभ नामक पशु बन गया था ।अथवा जंगली शूकर की योनि में प्रवेश था ।इस प्रकार गर्भ में रहते हुए उस जीवआत्मा को पूर्ण ज्ञान रहता है ।
गर्भस्थ जीव अपने कर्मों पर क्यों पछताता है?
किंतु जन्म लेते ही वह तत्काल उसे भूल जाता है।उसे याद आता है कि मैं दूसरे को छलने का विचार करता रहा। मैंने शरीर की रक्षा के लिए धर्म का परित्याग करके छल,कपट और चोर वृति का आश्रय लिया। फिर गर्भस्थ जीव को याद आता है कि उसने अपने पिछले जन्म में अत्यंत कष्ट से स्वयं लक्ष्मी को ऐकत्र किया था किंतु अभिलासित धन का उपयोग नहीं कर सका और अग्नि देव अतिथि और बंधु बांधव को स्वादिष्ट फल तथा ताम्बुल दे करके उन्हें संतुष्ट करने में असफल रहा ।
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| यमदूत आत्मा को आदेश देते हुए |
जब ऐसी चिंता गर्भस्थ जीव करता है तब यमदूत उसे कहते हैं कि हे देह धारेण जैसा तुमने किया है उसके अनुसार अपना निस्तार करो। फिर मां के गर्भ में पल रहा जीव स्मरण करता हुआ अपने को कोसते हुए कहता है कि तुमने अपनी कमाई से जो धन अर्जित किया था उसमें से किसी को दान नहीं दिया । पृथ्वी पर रहते हुए तुमने भूमि दान ,गोदान ,जल दान ,फलदान ,तांबूल दान अथवा गंध दान भी नहीं किया। तो अब भला क्या सोच रहे हो ।
तुम्हारे पिता और पितामह मर गए। जिसने तुमको अपने गर्भ में धारण किया वह तुम्हारी माता भी मर गई। तुम्हारे सभी बंधु भी नहीं रहे । ऐसा तुमने देखा है तुम्हारा पांच भौतिक शरीर अग्नि में जलकर भस्म हो गया ।तुम्हारे द्वारा एकत्र किया गया संपूर्ण धन धान्य पुत्रों ने हस्तगत कर लिया। जो कुछ तुम्हारा सुभाषित है और जो कुछ तुमने धर्म संचय किया है वह तुम्हारे साथ है। इस पृथ्वी पर जन्म लेने वाला राजा हो अथवा सन्यासी या कोई श्रेष्ठतम ब्राह्मण हो मरने के बाद पुनः आया हुआ नहीं दिखाई देता है।
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गर्भ में शिशु भगवान से क्या प्रार्थना करता है?
जो भी इस धरातल पर जन्म लेता हैं ,उसकी मृत्यु निश्चित है और इसके बाद वह विलाप करने लगता है और वह भगवान से प्रार्थना करता है । हे प्रभु !जब जन्म के बाद मुझे पुनः मृत्यु को ही प्राप्त होना है तो फिर मेरा जन्म क्यों हो रहा है । अगर संभव हो तो मुझे जीवन मृत्यु के चक्र से मुक्त करिए। गरुड़ पुराण के अनुसार फिर माता के गर्भ में पल रहा शिशु भगवान से कहता है कि मैं गर्भ से अलग होने की इच्छा नहीं करता क्योंकि बाहर जाने से पापकर्म करने पड़ते हैं जिससे नरक आदि प्राप्त होते हैं ।
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| गरुड़ पुराण में गर्भस्थ जीव के कष्टों का वर्णन। |
इस कारण बड़े दुख से व्याप्त हूं। फिर भी दुख से रहित हो आपके चरण का आश्रय लेकर मैं आत्मा का संसार से उद्धार कर लूंगा। माता के गर्भ में पूरे 9 महीने शिशु भगवान से प्रार्थना ही करता है। लेकिन यह समय पूरा होते ही जब प्रसूति के समय वायु से तत्काल बाहर निकलता है तो उसे कुछ भी याद नहीं रहता ।
देवताओं द्वारा गर्भस्थ भगवान् कृष्ण की स्तुति
जन्म लेते ही शिशु सब कुछ क्यों भूल जाता है?
विज्ञान और गरुड़ पुराण के अनुसार
विज्ञान के अनुसार
मां के गर्भ से बाहर आने वाले शिशु को काफी पीड़ा का सामना करना पड़ता है।जिससे बच्चे के मस्तिष्क पर जोर पड़ता है। शायद यही कारण है कि उसे कुछ भी याद नहीं रहता।
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| जन्म लेता हुआ शिशु |
लेकिन गरुड़ पुराण के अनुसार
प्रसूति की हवा से जैसे ही श्वास लेता हुआ शिशु माता के गर्भ से बाहर निकलता है तो उसे किसी बात का भी ज्ञान नहीं रहता। गर्भ से अलग होकर वह ज्ञान रहित हो जाता है। इसी कारण जन्म के समय वह रोता है।
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गर्भ में छह महीने के बाद शिशु को क्या अनुभव होता है?
इन सबके अलावा गरुड़ पुराण में भगवान विष्णु ने यह भी बताया है कि जब शिशु गर्भ में 6 माह का हो जाता है तो वह भूख प्यास को महसूस करने लगता है। और माता के गर्भ में अपना स्थान बदलने के लायक भी हो जाता है। तब वह कुछ कष्ट भी भोक्ता है।
माता जो भी खाने के रूप में ग्रहण करती है । वह उसकी कोमल त्वचा से होकर गुजरता है और इन कष्टों के कारण कई बार शिशु माता के गर्भ में ही बेहोश हो जाता है। 6 मास के बाद शिशु का मस्तक नीचे की ओर और पैर ऊपर हो जाते हैं ऐसी स्थिति में वह चाहकर भी इधर-उधर हिल डुल नही सकता ।
गर्भस्थ शिशु मोक्ष की प्रार्थना क्यों करता है?
वह खुद को एक पिंजरे में बंद पक्षी की तरह महसूस करता है। ऐसे में शिशु ईश्वर की स्तुति करने लगता है और कहता है कि हे लक्ष्मीपति!, हे जगदाधार !संसार को पालने वाले भगवान विष्णु का मैं शरणागत होता हूँ। हे भगवान मैं इस योनि से अलग हो तुम्हारे चरणों का स्मरण कर फिर ऐसे उपाय करूंगा जिससे मैं मुक्ति को प्राप्त कर सकूं।
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| भगवान विष्णु से प्रार्थना करता हुआ शिशु। |
इसके बाद अपने आसपास गंदगी देख फिर दुबारा भगवान से प्रार्थना करता है और कहता है कि -भगवान मुझे कब बाहर निकालोगे, सभी पर दया करने वाले ईश्वर ने मुझे यह ज्ञान दिया है । मैं उस ईश्वर की शरण में जाता हूं। इसलिए मेरा पुनः जन्म मरण होना उचित नहीं है और अंत में भगवान विष्णु पक्षीराज गरूड़ से कहते हैं कि -
शास्त्रीय सार
यही कारण है कि गर्भ में पहुंचकर जो जीवात्मा जैसा चिंतन करता है शरीर धारी वैसा ही जन्म लेकर बालक, युवा और वृद्ध होता है। यदि गर्भ में सोची गई बात सांसारिक के व्यहमोह के कारण विस्मृत हो जाती है तो पुनः मृत्यु काल में उसकी याद आ जाती है। यदि शरीर के नष्ट होने पर वह हृदय में ही रह गई है तो पुनः गर्भ में जाने पर उसका स्मरण होना निश्चित है।
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FAQs
क्या गर्भ में बच्चे को पिछले जन्म याद रहते हैं?
गरुड़ पुराण के अनुसार हाँ, लेकिन जन्म लेते ही वह सब भूल जाता है।
क्या गर्भस्थ शिशु भगवान का स्मरण करता है?
गरुड़ पुराण में ऐसा वर्णन मिलता है कि शिशु गर्भ में भगवान से प्रार्थना करता है।
क्या विज्ञान भी ऐसा मानता है?
आधुनिक विज्ञान पूर्वजन्म की स्मृति की पुष्टि नहीं करता, लेकिन यह स्वीकार करता है कि गर्भ में शिशु का मस्तिष्क धीरे-धीरे विकसित होता है।
गर्भ में बच्चा कब सुनना शुरू करता है?
वैज्ञानिक शोधों के अनुसार गर्भावस्था के मध्य चरण के बाद शिशु बाहरी ध्वनियों पर प्रतिक्रिया देना शुरू कर सकता है।
प्रिय पाठकों
हम आशा करते हैं- कि आपको हमारी यह पोस्ट पसंद आई होगी । आपको जानकारी कैसी लगी। आप कमेंट करके अवश्य बतायें।
इसी के साथ हम अपनी बात को यही समाप्त करते है।और भोलेनाथ जी से प्रार्थना करते हैं कि वह आपके जीवन को मंगलमय बनाये।
धन्यवाद,हर हर महादेव 🙏






