बच्चों के प्रति माता पिता का कर्तव्य/माता पिता बच्चो के प्रति अपनी जिम्मेदारी को कैसे पूरा करें/baccho ke prati mata -pita ka accha caunceller banna

VISHVA GYAAN

क्या आपका बच्चा आपसे अपनी हर बात शेयर करता है? अगर नहीं, तो सोचिए—कहीं आपकी डांट या डर के कारण वह अपनी बातें किसी और से तो share नहीं कर रहा? माता-पिता के लिए यह बात समझना बेहद जरूरी है।


माता-पिता को अपने बच्चों का काउंसलर क्यों बनना चाहिए?

संक्षिप्त उत्तर: 

क्योंकि माता-पिता अपने बच्चों को सबसे करीब से जानते हैं। यदि बच्चा बिना डर और झिझक के अपनी समस्याएं माता-पिता से कह सके, तो माता-पिता समय रहते उसे सही दिशा और सुरक्षित मार्गदर्शन दे सकते हैं।


हर-हर महादेव! प्रिय पाठकों 🙏

भगवान भोलेनाथ का आशीर्वाद आप सभी पर बना रहे और वे आपके परिवार में हमेशा प्रेम, सुख और शांति बनाए रखें।


बच्चे जब छोटे होते हैं, तो अपनी छोटी-सी छोटी बात भी माता-पिता को बताना चाहते हैं। स्कूल में क्या हुआ, किस दोस्त के साथ खेले, किस बात पर खुशी हुई—वे सब कुछ अपने माता-पिता के साथ share करते हैं। लेकिन जैसे-जैसे बच्चे बड़े होते हैं, कई बार उनके और माता-पिता के बीच एक दूरी बनने लगती है।


बच्चे अपने कमरे में रहने लगते हैं, फोन पर पासवर्ड लगा लेते हैं और अपनी परेशानियां माता-पिता से बताने के बजाय दोस्तों या किसी दूसरे व्यक्ति से साझा करने लगते हैं। आखिर ऐसा क्यों होता है? माता-पिता और बच्चों के बीच यह अटूट रिश्ता कहां और कैसे बदल जाता है?


बच्चों को केवल अनुशासन की नहीं, बल्कि विश्वास, स्वीकृति, प्रेम और सही मार्गदर्शन की भी जरूरत होती है। इसका अर्थ यह नहीं कि माता-पिता बच्चों की हर गलती को सही मान लें। बल्कि उन्हें पहले बच्चे की बात समझनी चाहिए, फिर प्यार और धैर्य के साथ सही-गलत का अंतर समझाना चाहिए।


आज की इस पोस्ट में हम समझेंगे कि काउंसलर और माता-पिता में क्या अंतर है, माता-पिता अपने बच्चों के अच्छे काउंसलर कैसे बन सकते हैं और बच्चों के साथ ऐसा रिश्ता कैसे बनाया जाए जिसमें वे अपनी परेशानियां बिना डर के माता-पिता से कह सकें।


इस पोस्ट में आप पाएंगे-

हर मनुष्य को स्वीकृति की आवश्यकता होती है 
काउंसलर (सलाहकार )और माता-पिता के बीच क्या अंतर है?
काउंसलर का कर्तव्य 
बच्चो के प्रति माता -पिता का अच्छा काउंसलर बनना 


बच्चों के प्रति माता पिता का कर्तव्य/माता पिता बच्चो के प्रति अपनी जिम्मेदारी को कैसे पूरा करें


हर मनुष्य को स्वीकृति (मंजूरी ,आज़ादी ) की आवश्यकता होती है  

प्रिय पाठकों !बच्चे मन के साफ़  होते है। यदि आपको अपने बच्चों का बचपन याद हो तो आपने देखा होगा की बचपन में जब आपके बच्चे बहुत छोटे थे और खेलने के लिए बाहर जाया करते थे। जब वो खेलकर  घर वापस आते थे,तो आपको सब कुछ बताना शुरू कर देते थे। आपके न पूछने पर भी वे आपको बताते थे,माँ आज मैंने ये खेला , पापा मैंने आज ये किया। 


उस वक़्त यदि आपके पास समय होता था तब तो आप उसकी बात  सुन लेते थे पर कई बार आपके पास समय न होने पर भी आप उनकी बातों को सुनते थे और आप उसकी बातों को सुनकर खुश  होते थे और आज समय में क्या होता है ?आप उनके पीछे दौड़ते हुए पूछते हैं कि उन्होंने पूरे दिन क्या किया। क्या ऐसा नहीं होता है?


पहले वे हमारे पीछे आकर बातें बताते थे और आज हम उनके पीछे भागते हैं ,लेकिन वे अपने कमरे के दरवाजे बंद कर लेते हैं और अपने फोन में पासवर्ड डाल देते हैं। पूछने पर भी आपको कुछ नहीं बताते और यदि आप उन पर उत्तर देने के लिए दबाव डालते हैं, तो हो सकता है कि वे सच न कहें। PARENTS AUR BACCHO  का ये अटूट रिश्ता कैसे और कहाँ बदल गया ? 


एक समय था जब हमारे बच्चे हमें अपनी हर छोटी-बड़ी बात बताया करते थे। लेकिन जैसे-जैसे वे बड़े हुए, उन्होंने हमसे बातें करना कम कर दिया। आखिर ऐसा क्यों हुआ?


जब बच्चे छोटे थे, तो उनकी छोटी-छोटी बातें सुनकर हमें खुशी होती थी। हम उनकी बातों को ध्यान से सुनते थे और उन्हें अपनापन और स्वीकृति देते थे।


इसलिए एक बात हमेशा याद रखें—“हर व्यक्ति को स्वीकृति और अपनापन चाहिए।” जब बच्चे महसूस करते हैं कि उनकी बात बिना डर और बिना जज किए सुनी जा रही है, तो वे अपने मन की बातें खुलकर साझा करते हैं। हमें बच्चों के साथ ऐसा ही विश्वास और अपनापन बनाए रखना चाहिए।


जब बच्चा थोड़ा बड़ा हुआ तो एक दिन वह हमारे पास आकर बोला—“माँ, आज हम क्लास बंक करके दोस्त के घर गए और फिर मूवी देखने चले गए।”


अब सोचिए, हमने उसकी बात सुनकर कैसी प्रतिक्रिया दी? क्या हम मुस्कुराए? शायद नहीं। हमने तुरंत उसे डांटना शुरू कर दिया—“तुमने ऐसा क्यों किया? क्या यही सब करने के लिए तुम्हें स्कूल भेजते हैं?”


लेकिन उस बच्चे ने तो वही किया था, जो वह बचपन से करता आया था। उसने ईमानदारी से अपनी बात हमें बताई थी। फर्क सिर्फ इतना था कि इस बार उसकी सच्चाई के बदले उसे डांट और अस्वीकृति मिली।


यहीं से कई बार बच्चा अपनी बातें माता-पिता से छिपाना शुरू कर देता है। उसे लगता है कि “अगर मैं अपनी बात बताऊंगा, तो मुझे डांट पड़ेगी।” इसलिए माता-पिता को चाहिए कि पहले बच्चे की पूरी बात सुनें, फिर प्यार से उसकी गलती समझाएं।


बच्चों के प्रति माता पिता का कर्तव्य/माता पिता बच्चो के प्रति अपनी जिम्मेदारी को कैसे पूरा करें


यह भी पढ़े-- हमेशा बच्चे गलत नहीं होते /क्या माता-पिता हमेशा सही होते है , और बच्चे हमेशा गलत ?


कुछ दिनों बाद बच्चे ने फिर अपनी कोई बात माता-पिता को बताई, लेकिन इस बार भी उसे डांट और अस्वीकृति मिली। धीरे-धीरे उसने अपने मन की बातें माता-पिता से बताना ही बंद कर दिया।


माता-पिता को यह बात हमेशा याद रखनी चाहिए कि जिस दिन बच्चा घर में अपनी बात कहने से डरने लगता है, उसी दिन वह अपनी बातों की स्वीकृति बाहर तलाशना शुरू कर सकता है। उसे लगता है कि माता-पिता उसे नहीं समझेंगे, जबकि दोस्त उसकी बात को आसानी से स्वीकार कर लेंगे।


माता-पिता अक्सर सोचते हैं कि बच्चा अब वह काम नहीं करता, इसलिए उन्हें कुछ नहीं बता रहा। लेकिन कई बार ऐसा नहीं होता। बच्चा काम करना बंद नहीं करता, बल्कि उस काम के बारे में माता-पिता को बताना बंद कर देता है।


मान लीजिए बच्चा स्कूल बंक करके दोस्तों के साथ फिल्म देखने चला गया। पार्टी में उसने सिगरेट पीने की कोशिश की, देर रात घर लौटा या तेज गति से गाड़ी चलाने की कोशिश की—क्या ये सब सही है? नहीं, बिल्कुल नहीं। माता-पिता को इन गलत कामों को रोकना और बच्चे को सही रास्ता समझाना जरूरी है।


लेकिन सवाल यह है कि बच्चे को समझाने का तरीका क्या हो?


मान लीजिए कक्षा के सभी बच्चे पिकनिक पर जा रहे हैं और आपका बच्चा भी उनके साथ जाना चाहता है। वह घर आकर आपसे कहता है-“माँ, मेरे सारे दोस्त जा रहे हैं, मैं भी जाना चाहता हूँ।”


आप उसकी बात सुनकर तुरंत कह सकते हैं- तुम गलत हो। तुम्हें वहां जाने की जरूरत नहीं है। हमने तुम्हें ऐसी बातें कब सिखाईं?


या फिर आप प्यार से कह सकते हैं-


बेटा, मैं समझ सकता हूँ कि तुम्हारे सभी दोस्त जा रहे हैं और तुम्हारा भी उनके साथ जाने का मन कर रहा है। तुम्हारी इच्छा गलत नहीं है, लेकिन जिस तरह से तुम वहां जाने की सोच रहे हो, वह तुम्हारे लिए ठीक नहीं है। आओ, मिलकर इसका कोई अच्छा रास्ता निकालते हैं।


दोनों बातों में बहुत बड़ा अंतर है।


पहले तरीके में बच्चे को लगता है कि “मेरी बात कोई समझना ही नहीं चाहता।” लेकिन दूसरे तरीके में उसे महसूस होता है कि “मेरे माता-पिता मेरी बात समझ रहे हैं, बस मुझे सही रास्ता दिखा रहे हैं।”


जब बच्चा महसूस करता है कि माता-पिता उसकी बात सुनते और समझते हैं, तो उसके मन में उनके लिए विश्वास और सम्मान बढ़ता है। फिर उसके लिए माता-पिता की सलाह मानना भी आसान हो जाता है।


इसके विपरीत, यदि हर बात पर उसे डांटा जाए, शर्मिंदा किया जाए या कहा जाए—“तुम क्या कर रहे हो? क्या यही हमने तुम्हें सिखाया है? लोग क्या कहेंगे?” तो बच्चा धीरे-धीरे माता-पिता से दूरी बनाने लग सकता है।


वह अपनी परेशानियां, अपनी गलतियां और अपने दोस्तों से जुड़ी बातें भी छिपाने लगेगा। बाहर से देखने पर लगेगा कि बच्चा बिल्कुल ठीक है, लेकिन माता-पिता को पता ही नहीं होगा कि उसके जीवन में वास्तव में क्या चल रहा है।


बच्चों की सुरक्षा के लिए सबसे जरूरी है विश्वास


आज के समय में बच्चों को सुरक्षित रखने का एक महत्वपूर्ण तरीका यह है कि वे अपने जीवन की जरूरी बातें माता-पिता से बिना डर के साझा कर सकें।


हो सकता है कि बच्चा जो कुछ बताए, वह हर बार माता-पिता को पसंद न आए। हो सकता है कि वह कोई गलती भी स्वीकार करे। लेकिन उस समय सबसे पहले उसकी बात सुनना जरूरी है।


बच्चे को यह विश्वास होना चाहिए कि “मैंने गलती की है, फिर भी मैं अपने माता-पिता से बात कर सकता हूँ।”


क्योंकि जब बच्चा अपनी समस्या घर में नहीं बताएगा, तो वह समाधान के लिए बाहर किसी और की ओर देख सकता है। दोस्त उसे सही सलाह भी दे सकते हैं और गलत दिशा भी दिखा सकते हैं। माता-पिता को यह पता ही नहीं चलेगा कि बच्चा किसकी बात मान रहा है।


इसलिए बच्चों को केवल रोकना-टोकना ही पर्याप्त नहीं है। उनके साथ ऐसा रिश्ता बनाइए कि वे अपनी खुशी, परेशानी, गलती, डर और उलझन—सबसे पहले आपके साथ share  करना चाहें।


माता-पिता का प्यार, समझ और सही मार्गदर्शन बच्चे के लिए सबसे मजबूत सुरक्षा बन सकता है।


काउंसलर (सलाहकार )और माता-पिता के बीच क्या अंतर है?


बच्चों के प्रति माता पिता का कर्तव्य/माता पिता बच्चो के प्रति अपनी जिम्मेदारी को कैसे पूरा करें


अब सवाल आता है कि काउंसलर और माता-पिता के बीच आखिर अंतर क्या है? और आज के समय में बच्चों के लिए काउंसलर की जरूरत क्यों महसूस होने लगी है?


हमारे समय में जब हम स्कूल में पढ़ते थे, तब शायद स्कूलों में काउंसलर जैसी व्यवस्था आम नहीं थी। लेकिन आज बच्चों की पढ़ाई के साथ-साथ उनकी भावनाओं, परेशानियों और मानसिक स्थिति को समझने के लिए काउंसलर की भूमिका भी महत्वपूर्ण मानी जाती है।


लेकिन एक सवाल और है-

ऐसा क्यों होता है कि कई बार बच्चा अपनी परेशानी माता-पिता को बताने के बजाय किसी दूसरे व्यक्ति या काउंसलर से बात करना पसंद करता है?


इसका एक बड़ा कारण है-

बच्चे को बिना डर अपनी बात कहने की जरूरत।


माता-पिता बच्चे से बहुत प्यार करते हैं, लेकिन जब बच्चा कोई गलती करता है तो माता-पिता अक्सर उसे डांट देते हैं। उन्हें लगता है कि डांटने से बच्चा अपनी गलती समझ जाएगा और दोबारा ऐसा नहीं करेगा।


वहीं काउंसलर का तरीका थोड़ा अलग होता है।


मान लीजिए कोई बच्चा काउंसलर के पास जाकर कहता है, 

मुझसे बहुत बड़ी गलती हो गई है।”


तो काउंसलर सबसे पहले-

उसकी पूरी बात ध्यान से सुनता है। वह तुरंत उसे बुरा-भला कहकर या शर्मिंदा करके चुप नहीं कराता। वह बच्चे की बात समझने की कोशिश करता है और फिर उसे सही रास्ता दिखाता है।


बच्चे को यह महसूस होता है कि-

मैं अपनी बात खुलकर कह सकता हूँ। मेरी बात सुनी जाएगी और मुझे तुरंत जज नहीं किया जाएगा।


और यही भावना -

बच्चे को अपनी बात बताने में सहज बनाती है।


माता-पिता से बच्चा क्यों डर सकता है?


अब सोचिए, यही बात जब बच्चा अपने माता-पिता से कहता है तो क्या होता है?


कई बार माता-पिता उसकी पूरी बात सुनने से पहले ही कह देते हैं-


तुमने ऐसा क्यों किया?
तुम्हें इतनी भी समझ नहीं है?
हमने तुम्हें यही सिखाया है?
लोग क्या कहेंगे?


माता-पिता की चिंता गलत नहीं होती। वे अपने बच्चे को गलत रास्ते पर जाते हुए नहीं देखना चाहते। लेकिन बात कहने का तरीका बहुत मायने रखता है।


अगर हर बार बच्चा अपनी परेशानी बताता है और उसे डांट या आलोचना मिलती है,


तो धीरे-धीरे उसके मन में यह डर बैठ सकता है कि-


अगर मैंने अपनी बात बताई तो मुझे डांट पड़ेगी, इसलिए बेहतर है कि मैं चुप रहूं।


और फिर बच्चा अपनी समस्याएं माता-पिता से छिपाने लगता है।


और पढ़े- माता-पिता की डांट बच्चों को तोड़ती है या बनाती हैं?


बच्चे को माता-पिता से क्या चाहिए?


एक काउंसलर बच्चे की बात सुन सकता है और उसे सही दिशा दिखा सकता है। लेकिन माता-पिता बच्चे को जो दे सकते हैं, वह बहुत अलग और अनमोल है—प्यार, अपनापन, भावनात्मक सहारा, शक्ति और आशीर्वाद।


इसलिए आज के समय की जरूरत केवल यह नहीं है कि हर बच्चे के पास एक काउंसलर हो।


जरूरत यह भी है कि हर माता-पिता अपने बच्चे के लिए एक अच्छे काउंसलर की तरह बनें।


इसका अर्थ यह नहीं कि -

माता-पिता बच्चे की हर गलती को सही मान लें।


अगर बच्चा गलत काम कर रहा है तो उसे रोकना जरूरी है। लेकिन उसे रोकते समय यह भी जरूरी है कि बच्चा यह महसूस करे—


मेरे माता-पिता मेरी गलती से नाराज हैं, लेकिन मुझसे प्यार करना उन्होंने बंद नहीं किया।


यही अंतर -

बहुत बड़ा बदलाव ला सकता है।


हर व्यक्ति को दूसरे की बात समझने की जरूरत है


अगर हम इस बात को थोड़ा और गहराई से देखें तो हमें समझ आता है कि -


केवल माता-पिता और बच्चों के बीच ही नहीं, बल्कि हर रिश्ते में समझ और स्वीकृति की जरूरत होती है।


हमें सामने वाले के व्यवहार को देखकर तुरंत उसके बारे में नकारात्मक निर्णय नहीं बना लेना चाहिए।


हर व्यक्ति अपने अनुभवों, परिस्थितियों और संस्कारों के साथ जीवन जीता है। इसलिए किसी के व्यवहार को समझने से पहले उसकी स्थिति को समझने की कोशिश करनी चाहिए।


आध्यात्मिक दृष्टि से यह भी माना जाता है कि -

आत्मा अपने संस्कारों को साथ लेकर आगे बढ़ती है। शरीर बदलता है, लेकिन संस्कारों के बारे में आध्यात्मिक परंपराओं में अलग-अलग मान्यताएं मिलती हैं।


इस विचार को समझने का एक सरल तरीका है-

सामने वाले के व्यवहार को देखकर केवल यह न सोचें कि “यह ऐसा क्यों करता है?” 


बल्कि यह भी सोचें कि -

इसके पीछे कौन-सा अनुभव या भाव हो सकता है?


यही सोच-

हमें आलोचना से समझ की ओर ले जाती है।


किसी के दर्द को समझे बिना उसे कमजोर न कहें


मान लीजिए कोई बच्चा किसी बात से बहुत डरता है। वह अकेले कमरे में नहीं जाना चाहता, रात में अकेले सोने से घबराता है या बार-बार माता-पिता के पास आकर बैठता है।


माता-पिता अगर बिना कारण समझे उसे “डरपोक” या “कायर” कह दें, तो बच्चा और अधिक दुखी हो सकता है।


हो सकता है उसके डर के पीछे कोई ऐसा अनुभव हो जिसे वह ठीक से शब्दों में बता भी न पा रहा हो।


आध्यात्मिक विचारों में पुनर्जन्म और पूर्व संस्कारों को भी व्यक्ति के वर्तमान व्यवहार से जोड़ा जाता है। इसी संदर्भ में यह विचार रखा जाता है कि किसी आत्मा के पिछले अनुभव उसके संस्कारों को प्रभावित कर सकते हैं। यह एक आध्यात्मिक मान्यता है, वैज्ञानिक रूप से सिद्ध तथ्य नहीं।


इसलिए हमें किसी बच्चे के व्यवहार को देखकर तुरंत उसका मजाक नहीं उड़ाना चाहिए। हमें पहले समझने की कोशिश करनी चाहिए।


अगर दर्द में पड़े व्यक्ति को भी आलोचना मिले तो क्या होगा?


जिस व्यक्ति के भीतर पहले से डर, दुख या किसी पुराने अनुभव का दर्द है, 

अगर उसे बार-बार यह सुनने को मिले कि-

तुम बहुत कमजोर हो।
तुम्हें इतनी सी बात से डर लगता है?
तुम कभी कुछ नहीं कर सकते।

तो उसका आत्मविश्वास और कम हो सकता है।


इसके बजाय अगर हम उससे कहें-

मैं समझता हूँ कि तुम्हें डर लग रहा है। तुम अकेले नहीं हो। हम मिलकर इसका सामना करेंगे।

तो उसके भीतर सुरक्षा और विश्वास की भावना पैदा हो सकती है


और यही एक -

अच्छे माता-पिता, अच्छे मित्र और अच्छे काउंसलर की पहचान है।


असली उपचार क्या है?

किसी को केवल यह कह देना कि तुम गलत हो हमेशा उसे बदल नहीं देता।


कई बार व्यक्ति को पहले यह महसूस कराने की जरूरत होती है कि-

कोई मुझे समझने वाला भी है।”


जब किसी व्यक्ति को बिना अपमानित किए सुना जाता है, उसकी भावनाओं को समझा जाता है और फिर सही दिशा दिखाई जाती है, तो उसके भीतर बदलाव की संभावना बढ़ती है।


इसलिए मरहम लगाने वाला वही है जो दर्द को पहचान सके।


माता-पिता अगर अपने बच्चों के लिए ऐसे ही बन जाएं—जो उनकी बात सुनें, उनकी भावनाओं को समझें, गलती पर सही मार्ग दिखाएं और हर परिस्थिति में उनका हाथ थामे रहें—तो बच्चा बाहर स्वीकृति खोजने के बजाय सबसे पहले अपने घर की ओर देखेगा।


और शायद यही आज के समय में माता-पिता की सबसे बड़ी जिम्मेदारी है-

बच्चे को केवल सही रास्ता दिखाना नहीं, बल्कि इतना विश्वास देना कि वह गलत रास्ते पर जाने से पहले भी अपने माता-पिता से बात कर सके।


यह भी पढ़े--रिश्तों को समझे /रिश्तो की कदर करें/रिश्ते अनमोल होते है


काउंसलर का कर्तव्य 

एक काउंसलर का कर्तव्य है कि वह उन लोगो को जो उनसे बात कर रहे होते है या सलाह मांग रहे होते है ,वो उनको सही सलाह दे। यदि कोई व्यक्ति उनसे कोई बात पूछे या कुछ गलत करने जा रहा हो तो वो उन्हें रोके ,टोके ,सिर्फ हाँ में हाँ न मिलाये क्योकि व्यक्ति उसके पास भरोसा करके जाता है। विश्वास करके जाता है। 


बच्चो के प्रति माता -पिता का अच्छा काउंसलर बनना 


बच्चों के प्रति माता पिता का कर्तव्य/माता पिता बच्चो के प्रति अपनी जिम्मेदारी को कैसे पूरा करें


प्रिय पाठकों ! यदि आप  चाहते है की आपका बच्चा आपको सबकुछ बताये ,सारी बातें शेयर करें तो -आप अपने बच्चो को समझे ,उनकी पूरी बातें सुने। इस कलयुगी दौर में बच्चे  का बिगड़ना ,बहकना स्वाभाविक है। 


कहने का मतलब है की -

बच्चे गलत रास्ते बहुत जल्दी अपनाते है ,


क्योकि -

उन्हें उन रास्तों पर चलना अच्छा लगता है। उन्हें  कोई रोकने -टोकने वाला नहीं है। 


इसका मतलब ये तो नहीं की हम बच्चो को उनके हाल पर छोड़ दे। 


घर के अंदर आप बच्चो का ध्यान रख सकते हो लेकिन घर से बाहर कैसे रखोगे। क्या आप उनका बाहर आना जाना बंद दोगे ? नहीं -इन समस्याओं से छुटकारा तभी मिलेगा जब आप उनको समझोगे। 


जब वो कोई ऐसा काम करें जो आपको पसंद न हो तो डांटने ,मारने की जगह पहले उनकी पूरी बात सुने- की उन्होंने ऐसा काम क्यों किया। दोस्तों कई बार आँखों देखा और  कानों सुना सही नहीं होता। 


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आपका बच्चा आपका अपना बच्चा है। उन पर भरोसा रखे। अपना विश्वास टूटने न दें। बच्चो को मारने -पीटने से हो सकता है की वो शांत बैठ जाए और उस गलती को दुबारा न दोहराये ,पर आगे कोई गलती नहीं करेंगे इस बात की क्या गारंटी है। 


यदि आप चाहते की आपका बच्चा किसी दूसरे काउंसलर के पास न जाए ,उसे कभी काउंसलर की जरूरत न पड़े ,आपका बच्चा आपकी सुने ,सही रास्ते पर चले - तो दूसरों से पहले आप उनके  काउंसलर बन जाएँ। क्योकि बच्चो के लिए माता -पिता से अच्छा काउंसलर कभी हो ही नहीं सकता। 


माता -पिता से अच्छा कोई और बच्चे को नहीं समझ सकता ,माता पितासे अच्छा कोई दोस्त नहीं हो सकता। दुसरे लोग अच्छी शिक्षा दें रहे है या बुरी शिक्षा दे रहे है।  हमे क्या पता ? क्या पता कैसी शिक्षा दे रहे है ?


कल यदि बच्चे -

घर से परेशान या दुखी होकर और लोगों की बातों में आकर वो कोई गलत कदम उठा लें - तो फिर क्या करोगें ?


इसलिए समय रहते समझ जाइये-

गलतियां बच्चो से बड़ी तो नहीं हो सकती। बच्चे है तो सबकुछ है और अगर बच्चे नहीं तो कुछ भी नहीं।


FAQs – बच्चों और माता-पिता के रिश्ते से जुड़े सवाल


1. बच्चे अपनी समस्याएं माता-पिता से छिपाने क्यों लगते हैं?

उत्तर: जब बच्चों को लगता है कि उनकी बात सुनने से पहले उन्हें डांटा, अपमानित या जज किया जाएगा, तो वे धीरे-धीरे अपनी बातें छिपाने लगते हैं। इसलिए माता-पिता को पहले उनकी बात ध्यान से सुनने की आदत बनानी चाहिए।


2. क्या बच्चों की हर बात स्वीकार कर लेनी चाहिए?

उत्तर: बच्चे की बात सुनना और उसकी गलती को स्वीकार करना दो अलग बातें हैं। माता-पिता को बच्चे की भावनाओं और समस्या को समझना चाहिए, लेकिन गलत व्यवहार को सही नहीं ठहराना चाहिए। प्यार से सही रास्ता दिखाना जरूरी है।


3. बच्चे से दोस्त जैसा व्यवहार करने का क्या मतलब है?

उत्तर: इसका मतलब यह नहीं कि माता-पिता अपनी जिम्मेदारी छोड़ दें। इसका अर्थ है कि बच्चा अपनी परेशानी, डर, गलती या उलझन बिना झिझक माता-पिता से बता सके और उसे लगे कि उसकी बात पहले समझी जाएगी।


4. अगर बच्चा कोई बड़ी गलती कर दे तो माता-पिता को क्या करना चाहिए?

उत्तर: सबसे पहले शांत रहकर बच्चे की पूरी बात सुननी चाहिए और यह समझना चाहिए कि गलती क्यों हुई। उसके बाद गलती के परिणाम और सही व्यवहार के बारे में समझाना चाहिए। जरूरत पड़ने पर किसी योग्य विशेषज्ञ की सहायता लेना भी उचित हो सकता है।


5. क्या बच्चों को हर समय डांटना उनके व्यवहार को बदल सकता है?

उत्तर: केवल डांटने से बच्चे कुछ समय के लिए शांत हो सकते हैं, लेकिन इससे समस्या की जड़ हमेशा दूर नहीं होती। लगातार डांटने से बच्चा अपनी बातें छिपाना भी सीख सकता है। इसलिए अनुशासन के साथ संवाद और समझ जरूरी है।


6. माता-पिता बच्चे का विश्वास कैसे जीत सकते हैं?

उत्तर: बच्चे की बात बीच में काटे बिना सुनें, उसकी भावनाओं का मजाक न उड़ाएं, हर छोटी बात पर गुस्सा न करें और गलती होने पर उसे समझाने का प्रयास करें। जब बच्चे को विश्वास होगा कि माता-पिता उसकी बात सुनेंगे, तो वह अपनी परेशानियां साझा करने में अधिक सहज महसूस करेगा।


7. अगर बच्चा दोस्तों के प्रभाव में गलत रास्ते पर जा रहा हो तो क्या करें?

उत्तर: तुरंत केवल दोस्तों को दोष देने के बजाय बच्चे से शांतिपूर्वक बात करें और उसके व्यवहार के पीछे का कारण समझें। उसे गलत संगति के संभावित परिणाम समझाएं और अच्छे विकल्प दें। आवश्यकता होने पर शिक्षक, स्कूल काउंसलर या योग्य मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ की मदद ली जा सकती है।


8. क्या माता-पिता को बच्चों की हर गतिविधि पर नजर रखनी चाहिए?

उत्तर: बच्चों की सुरक्षा और मार्गदर्शन के लिए माता-पिता का जागरूक रहना जरूरी है, लेकिन हर समय कठोर निगरानी करना भरोसे को कमजोर कर सकता है। उम्र के अनुसार उचित सीमाएं तय करके बच्चे को जिम्मेदारी और स्वतंत्रता देना अधिक उपयोगी है।


9. बच्चों के लिए माता-पिता सबसे अच्छे मार्गदर्शक कैसे बन सकते हैं?

उत्तर: जब माता-पिता बच्चे को प्रेम दें, उसकी बात ध्यान से सुनें, उसकी भावनाओं को समझें, गलतियों पर उचित अनुशासन रखें और सही-गलत का अंतर समझाएं, तब वे बच्चे के लिए एक मजबूत मार्गदर्शक बन सकते हैं।


10. अगर बच्चा माता-पिता से बिल्कुल बात नहीं करता तो क्या करें?

उत्तर: उस पर लगातार सवालों की बौछार करने के बजाय धीरे-धीरे विश्वास का माहौल बनाएं। उसके साथ समय बिताएं, उसकी पसंद की गतिविधियों में रुचि लें और बातचीत के लिए दबाव न बनाएं। यदि बच्चा लंबे समय तक गंभीर परेशानी में दिखाई दे या सुरक्षा से जुड़ा खतरा हो, तो योग्य पेशेवर सहायता लेना बेहतर है।


तो प्रिय पाठकों ,

आशा करते है आपको हमारी आज की ये पोस्ट पसंद आई होगी।  आपके मन में कोई प्रश्न हो ,आप कुछ पूछना चाहते हों या जीवन में कोई उलझन हो तो आप कमेंट बॉक्स में वो भी पूछ सकते है। विश्वज्ञान आपके लिए हमेशा ज्ञानपूर्ण और ऐसी ही रोचक जानकारियां लेकर आता रहेगा। 


इसी के साथ विदा लेते है और भोलेनाथ जी से आपके जीवन की मंगल कामना करते है की वो आपको हमेशा खुश रखे और आपके बच्चो को सद्बुद्धि प्रदान करें। 


धन्यवाद ,हर हर महादेव 🙏

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