हमेशा बच्चे गलत नहीं होते | क्या माता-पिता हमेशा सही होते है , और बच्चे हमेशा गलत ?
नहीं, हमेशा बच्चे गलत नहीं होते और न ही माता-पिता हमेशा सही होते हैं। हर पीढ़ी की सोच, अनुभव और परिस्थितियाँ अलग होती हैं। कई बार बच्चों की भावनाएँ और दृष्टिकोण भी सही होते हैं, बस संवाद की कमी के कारण उन्हें समझा नहीं जाता। सही समाधान संवाद और आपसी समझ में है।
कैसे है आप लोग, हम आशा करते हैं कि आप स्वस्थ और प्रसन्नचित होंगे।
1- तुलना करना - माता-पिता की पहली और सबसे बड़ी गलती
- “देखो, उसका बेटा कक्षा में प्रथम आया है।”
- “वो लड़की IAS बन गई।”
- “उसका बच्चा डॉक्टर बन गया।”
2- माता-पिता की दूसरी गलती - आलोचना करना
अक्सर हम कहते या सोचते हैं —
- “यह ऐसा क्यों है?”
- “यह इस तरह क्यों नहीं करता?”
- “काश यह थोड़ा और समझदार होता…”
- “यह बहुत धीमा है।”
- “यह साफ-सुथरा नहीं रहता।”
- “यह ठीक से पढ़ाई नहीं करता।”
- “यह अच्छा नहीं खाता।”
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| हमेशा बच्चे गलत नहीं होते | क्या माता-पिता हमेशा सही होते है , और बच्चे हमेशा गलत ? |
दोस्तों, हमारे विचार ही हमारी वास्तविकता बनाते हैं।
जिन विचारों को हम बार-बार दोहराते हैं, वही धीरे-धीरे हमारे जीवन का सत्य बन जाते हैं।
इसी प्रकार, माता-पिता जो विचार अपने बच्चों के बारे में बार-बार सोचते या बोलते हैं, वे केवल शब्द नहीं होते — वे ऊर्जा होते हैं। बच्चा उन विचारों को आत्मसात कर लेता है, अर्थात उन्हें अपने जीवन का हिस्सा बना लेता है।
ऐसे विचारों का बच्चों के मन और व्यक्तित्व पर गहरा प्रभाव पड़ता है। धीरे-धीरे बच्चा स्वयं भी अपने बारे में वैसे ही विचार करने लगता है।
अक्सर जब बच्चा छोटा होता है, तो माता-पिता अनजाने में ऐसे विचार बोल देते हैं या सोचने लगते हैं—
- “यह बहुत धीमा है, हर काम धीरे-धीरे करता है।”
- “यह कोई भी काम ठीक से नहीं कर सकता।”
- “यह तो हर चीज गिरा देता है।”
- “यह तो तोड़-फोड़ मचा देता है।”
- “पढ़ने बैठेगा और थोड़ी ही देर में उठ जाएगा।”
- “इसका मन कभी एकाग्र नहीं रहता।”
जब ये बातें बार-बार दोहराई जाती हैं, तो बच्चा भी स्वयं को वैसा ही समझने लगता है। और यही सोच धीरे-धीरे उसके आत्मविश्वास को प्रभावित करने लगती है।
क्यों हैं ऐसे आज के बच्चे/ माँ-बाप के साथ बुरा व्यवहार क्यों।
क्या आप जानते हैं — ये सभी बार-बार दोहराई गई पंक्तियाँ उस बच्चे के लिए एक लेबल बन जाती हैं।
हम पर जो भी लेबल लगाए जाते हैं, उनमें से अधिकांश हमारे बचपन में लगाए जाते हैं — और अक्सर वे हमारे अपने माता-पिता द्वारा लगाए जाते हैं। धीरे-धीरे हम उन लेबलों को ही अपनी पहचान बना लेते हैं।
आज हम 30, 40 या 50 वर्ष के हो सकते हैं, लेकिन हममें से बहुत से लोग उन पुराने लेबलों को आज तक नहीं बदल पाते।
क्यों?
क्योंकि हम मान बैठे होते हैं कि “हम ऐसे ही हैं।”
लेकिन ज़रा सोचिए — हमें किसने बताया कि हम ऐसे हैं?
अक्सर उत्तर होता है — हमारे माता-पिता ने।
और बचपन में हमें यही सिखाया जाता है कि माता-पिता हमेशा सही होते हैं, वे जो कहते हैं, वही सत्य होता है।
इसलिए जब माता-पिता बार-बार कहते हैं, “तुम ऐसे हो”, तो बच्चा उसे सत्य मान लेता है। और वही बात धीरे-धीरे उसके व्यक्तित्व का हिस्सा बन जाती है।
यही कारण है कि माता-पिता की जिम्मेदारी बहुत बड़ी है।
उन्हें अपने बच्चों पर नकारात्मक नहीं, बल्कि सकारात्मक लेबल लगाने चाहिए — ऐसे शब्द जो आत्मविश्वास बढ़ाएँ, न कि उसे सीमित कर दें।
एक छोटा-सा उदाहरण
मान लीजिए किसी बच्चे से गलती से गिलास टूट गया।
यदि माता-पिता तुरंत कह दें —
- “तुम तो हमेशा चीजें तोड़ते हो।”
- “तुमसे कोई काम ठीक से नहीं होता।”
यह बच्चे के मन में उसकी पहचान बन जाता है।
लेकिन यदि उसी परिस्थिति में कहा जाए —
- “कोई बात नहीं, अगली बार ध्यान से करना।”
- “मुझे पता है तुम सावधानी रख सकते हो।”
- तो वही बच्चा जिम्मेदार बनना सीखता है।
3- अंतर शब्दों का नहीं, दृष्टिकोण का है
- बच्चे गलती से नहीं बिगड़ते,
- वे बार-बार मिले संदेशों से अपना व्यक्तित्व बनाते हैं।
इसलिए याद रखिए —
- हम अपने बच्चों से जो कहते हैं,
- वही धीरे-धीरे वे अपने बारे में मानने लगते हैं।
आप अपने बच्चे को जो बनाना चाहते हैं, उसी अनुसार उस पर सकारात्मक लेबल लगाइए।
मान लीजिए आपका बच्चा थोड़ा धीमा है।
लेकिन प्रश्न यह है — वह किसके संदर्भ में धीमा है?
स्पष्ट है, हम उसे किसी और से तुलना करके देख रहे होते हैं।
फिर भी यदि मान लें कि उसे काम करने में थोड़ा अधिक समय लगता है -
वह किसी काम के बीच में रुक जाता है,
थोड़ा ब्रेक ले लेता है,
चीजें इधर-उधर रखते हुए बैठ जाता है।
हाँ, यह एक तथ्य हो सकता है।
लेकिन हर तथ्य को पहचान बनाना आवश्यक नहीं होता।
याद रखिए -
संकल्प से ही सिद्धि होती है।
हमारे विचार ही हमारी वास्तविकता का निर्माण करते हैं।
यदि हम बार-बार सोचते रहें -
- “यह बहुत धीमा है।”
- “इससे कुछ नहीं होगा।”
- “यह भविष्य में क्या करेगा?”
और यदि परिवार के सदस्य भी आपस में इसी प्रकार चर्चा करें, शिकायत करें या उसकी बुराई करें -
तो यही बातें धीरे-धीरे उस बच्चे के मन में एक स्थायी लेबल बन जाती हैं।
फिर वह स्वयं भी अपने बारे में यही मानने लगता है —
- “मैं जल्दी कुछ नहीं कर सकता।”
- “मैं हमेशा धीमा हूँ।”
- “मैं किसी से मुकाबला नहीं कर सकता।”
4- असली प्रश्न यह है
क्या हम अपने बच्चे को उसकी वर्तमान गति से पहचानेंगे —
या उसकी संभावनाओं से?
क्योंकि
वह शायद गहराई से सीख रहा होता है।
- वह दूसरों से बात करने में झिझकने लगता है,
- माता-पिता से दूरी बनाने लगता है,
- घर में उसका मन नहीं लगता।
- उसके मन में अनेक प्रश्न और भावनाएँ चलती रहती हैं
- लेकिन वह किसी से कुछ नहीं कहता।
- क्योंकि उसे डर होता है -
- “अगर मैंने कुछ कहा, तो फिर से डाँट या ताना मिलेगा।”
अब ज़रा ठहरकर सोचिए -
हाँ क्यों नहीं , बिल्कुल लगा सकते हैं।
- “बेटा/बेटी, तुम सक्षम हो।”
- “तुम बहुत अच्छा कर रहे हो।”
- “तुम्हारा हर प्रयास मूल्यवान है।”
- “देखो, तुमने यह काम पूरा कर लिया — बहुत बढ़िया।”
यदि हम बार-बार “धीमा” शब्द को भावों में दोहराएँगे,
और जैसा हम जानते हैं —
जिस वास्तविकता को आप भविष्य में देखना चाहते हैं,
भगवान हमें जैसे स्वीकार करते हैं -
4- क्या आप जानते हैं कि भगवान हमें क्या बताते हैं?
वे कहते हैं —
- “आप एक शांत आत्मा हैं।”
- “आप एक प्यारी आत्मा हैं।”
- “आप शुद्ध और शक्तिशाली आत्मा हैं।”
क्या हम हमेशा ऐसे होते हैं?
शायद नहीं।
लेकिन भगवान हमें बार-बार यही याद दिलाते हैं।
- कभी पुस्तकों के माध्यम से,
- कभी भजनों के माध्यम से,
- कभी कहानियों के माध्यम से,
- और कभी किसी महापुरुष के शब्दों के माध्यम से।
हम इन बातों को सुनते हैं, पढ़ते हैं, दोहराते हैं —
- “मैं शांत हूँ।”
- “मैं शुद्ध हूँ।”
- “मैं शक्तिशाली हूँ।”
- और धीरे-धीरे हम वैसे ही बनने लगते हैं।
तो हमें भी अपने बच्चों का पालन-पोषण उसी दृष्टि से करना चाहिए।
उन्हें बार-बार कहें -
- “तुम एक शक्तिशाली आत्मा हो।”
- “तुम एक अच्छी और ईमानदार आत्मा हो।”
- “तुम समय के पाबंद हो।”
- “तुम जिम्मेदार हो।”
यह मत कहिए -
- “तुम हमेशा देर से आते हो।”
- “तुम कभी समय पर तैयार नहीं होते।”
- क्योंकि बच्चे वही बनते हैं,
- जो वे अपने बारे में बार-बार सुनते हैं।
सच्चे दोस्त होते है पिता/पिता का महत्त्व /घर की ढाल होते है पिता
5- संस्कारों पर गहरा प्रभाव
इसलिए —
न तुलना।
हम बच्चों पर जो भी लेबल लगाएँ,
जो नकारात्मक वास्तविकता इस समय दिखाई दे रही है,
बल्कि उस वास्तविकता को शब्द दीजिए,
जिसे आप अपने बच्चे में देखना चाहते हैं।
6- प्रतिस्पर्धा या विकास?
यह बात पहली बार में कठिन लग सकती है,
क्योंकि बचपन से हमें सिखाया गया है कि “जीवन एक प्रतियोगिता है।”
लेकिन सोचिए —
क्योंकि वह हमेशा स्वयं को किसी और के संदर्भ में मापता रहता है।
जीवन वास्तव में प्रतियोगिता नहीं है।
- चाहे वह नर्सरी की कक्षा हो,
- चाहे 10वीं–12वीं की बोर्ड परीक्षा,
- या फिर करियर का चुनाव।
दो व्यक्तियों के बीच वास्तविक तुलना संभव ही नहीं है —
हर बच्चा केवल अपने ही संदर्भ में आगे बढ़ सकता है।
7- प्रतिस्पर्धा के छुपे हुए संस्कार
जब हम बच्चों को लगातार दूसरों से आगे निकलने की सीख देते हैं,
तो अनजाने में हम उनमें ये संस्कार बो रहे होते हैं —
ईर्ष्या,
हीन भावना,
और “मैं बेहतर हूँ” या “मैं कम हूँ” का भाव।
हम उन्हें सिखाते हैं कि —
“यदि तुम किसी से कम हासिल करोगे, तो तुम खुश नहीं रह सकते।”
इस प्रकार हम उनके मूल्य को उनके प्रदर्शन से जोड़ देते हैं।
जैसे वे तभी अच्छे हैं जब वे अधिक अंक लाएँ,
या किसी और से ज्यादा सफलता प्राप्त करें।
सच्ची परवरिश प्रतिस्पर्धा नहीं,
स्व-विकास (Self Growth) सिखाती है।
बच्चे को यह सिखाइए कि उसे कल से बेहतर बनना है —
अपने ही कल से।
यह सच्चा पालन-पोषण नहीं है।
पालन-पोषण का अर्थ है बच्चों को यह स्मरण कराना -
- “तुम पवित्र हो।”
- “तुम शक्तिशाली हो।”
- “तुममें विशेषताएँ हैं, जिन्हें और विकसित करना है।”
तो उसकी क्षमता स्वतः बढ़ने लगती है।
लेकिन जब बच्चा निरंतर तुलना और प्रतिस्पर्धा में उलझा रहता है,
तो संभव है कि वह कई लोगों से आगे निकल जाए
लेकिन फिर भी-
क्योंकि वह हमेशा दूसरों से आगे निकलने की दौड़ में व्यस्त रहेगा।
8- माता-पिता को किन चार बातों से बचना चाहिए?
हर माता-पिता को इन चार संस्कारों से सावधान रहना चाहिए:
तुलना
प्रतिस्पर्धा
नियंत्रण
बच्चों को अनुशासन की आवश्यकता है -
लेकिन गुस्से की नहीं।
9- प्रेम और नियम (Law) का संतुलन बनाइए।
उन्हें प्यार से अनुशासित कीजिए।
पहले समझाइए कि यह उनके हित में क्यों है,
फिर दृढ़ता से मार्गदर्शन कीजिए।
लेकिन एक बात निश्चित हो —
बच्चों पर कभी हाथ न उठाएँ।
कभी नहीं।
अनुशासन का तरीका संवाद है, हिंसा नहीं।
हमें उनके स्वाभिमान को चोट नहीं पहुँचानी चाहिए।
क्योंकि स्वाभिमान टूट जाए तो आत्मविश्वास भी टूट जाता है।
10-विशेष रूप से किशोरावस्था (Teenage) में
जब बच्चा उस उम्र में पहुँचता है जहाँ वह सही और गलत का निर्णय स्वयं लेने लगता है —
विशेषकर 13 से 19 वर्ष की आयु (टीनएज) में -
आज के समय में यह और भी महत्वपूर्ण है-
कि बच्चा अपने जीवन में घटने वाली हर बात माता-पिता से खुलकर साझा कर सके।
इसके लिए रिश्ते में
पारदर्शिता
और स्वीकृति होनी चाहिए।
11- स्वीकृति की शक्ति
जब बच्चा छोटा होता है,
वह स्कूल से लौटकर हर छोटी-बड़ी बात साझा करता है।
क्यों?
क्योंकि वह जानता है - उसे स्वीकार किया जाएगा।
एक बच्चे को सबसे अधिक आवश्यकता होती है -
- स्वीकृति की।
- न कि आलोचना या तुलना की।
आत्मा को हमेशा स्वीकार किए जाने की जरूरत होती है।
जब बच्चा बड़ा होता है और कभी-कभी ऐसी गलती कर बैठता है जो हमें उचित नहीं लगती,
तब परीक्षा हमारी होती है —
- क्या हम उसे पहले की तरह स्वीकार करेंगे,
- या उसकी गलती को उसकी पहचान बना देंगे?
मान लीजिए-
स्कूल जाने के बजाय वह दोस्तों के साथ फिल्म देखने चला गया।
क्यों?
क्योंकि उसके सारे दोस्त जा रहे थे।
उस दिन भी वह घर आया और रोज़ की तरह सब कुछ आपको बता दिया। उसने कुछ नहीं छुपाया।
क्योंकि उसके संस्कार में यह था कि वह अपने माता-पिता से हर बात साझा करता है।
वह आपके सिद्धांतों और पालन-पोषण से मेल नहीं खा रहा था।
और शायद उसी दिन -
पहली बार आपने उसे ठुकरा दिया।
आपने कहा —
- “तुमने बहुत गलत किया।”
- “क्या हम तुम्हें इसी लिए स्कूल भेजते हैं?”
- “क्या हमने तुम्हें यही सिखाया है?”
ये शब्द शायद पहली बार इतने कठोर रूप में बोले गए।
लेकिन बच्चा अनजान था?
वह चाहता तो नहीं बताता।
लेकिन जैसे वह हर दिन सच्चाई बताता था,
वैसे ही उस दिन भी उसने सब कुछ कह दिया।
लेकिन उस दिन उसे मिला — अस्वीकार (Rejection)।
12- अस्वीकार का खतरा
उसी दिन उसे दोस्तों से स्वीकृति मिल जाती है।
और यही सबसे जोखिम भरी स्थिति होती है।
फिर हमें आश्चर्य होता है —
“वह हमारी बात से ज्यादा दोस्तों की क्यों सुनता है?”
यदि उसे यह स्वीकृति घर में मिल जाए,
तो वह बाहर तलाश नहीं करेगा।
13- स्वीकृति की असली शक्ति
कि वह सही के लिए खड़ा हो सके —
भले ही उसे अकेले ही क्यों न खड़ा होना पड़े।
जब बच्चा जानता है —
भले ही मुझसे गलती हो जाए”-
तब उसका आत्मबल कई गुना बढ़ जाता है।
गलती सुधारने की आवश्यकता है,
लेकिन बच्चे को अस्वीकार करने की नहीं।
बच्चों के प्रति माता पिता का कर्तव्य/माता पिता बच्चो के प्रति अपनी जिम्मेदारी को कैसे पूरा करें
बातचीत का सिलसिला कभी बंद नहीं होगा।
एक दिन ईमानदारी अवश्य जीतेगी।
और सबसे महत्वपूर्ण बात —
तो बच्चा साथियों के दबाव पर निर्भर नहीं रहता।
जीवन के निर्णय और स्वतंत्रता
जीवन की इस यात्रा में यह आवश्यक नहीं कि आपका बच्चा हमेशा आपकी बात माने।
कल 20 या 30 वर्ष का हो जाएगा।
उसे अपने जीवन के अनेक निर्णय स्वयं लेने होंगे।
उसके अपने कर्म, संस्कार और अनुभव सक्रिय हो चुके हैं।
फिर भी संभव है कि वह आपकी सलाह न माने।
ऐसी स्थिति में हमें यह समझना होगा कि हर आत्मा अपने कर्मों और अनुभवों से सीखती है।
14- शब्दों से आगे — भावों की शक्ति
तो हमें अपने भावों और ऊर्जा पर ध्यान देना चाहिए।
हर बात केवल मौखिक रूप से नहीं सिखाई जा सकती।
तो वे शांत मन से अपने बच्चों के लिए सकारात्मक भाव और शुभकामनाएँ भेज सकते हैं।
सुबह कुछ क्षण मौन में बैठकर
अपने बच्चे के लिए यह संकल्प करें —
- “तुम सही निर्णय लेने में सक्षम हो।”
- “तुम सुरक्षित हो।”
- “तुम्हारे अंदर सही चुनने की बुद्धि है।”
- भावों की ऊर्जा भी संबंधों पर गहरा प्रभाव डालती है।
15- जब बच्चा निर्णय ले चुका हो
तो अब आपकी परीक्षा शुरू होती है।
उस समय बार-बार यह सोचना —- “उसे पछतावा होगा।”
- “यह फैसला गलत है।”
- “इससे उसे नुकसान होगा।”
- “यह रिश्ता उसके लिए ठीक नहीं है।”
- — ये सभी बहुत शक्तिशाली नकारात्मक विचार हैं।
याद रखिए,
यदि निर्णय लेने से पहले आपने उसे समझा दिया था,
तो अब निर्णय के बाद आपकी भूमिका बदल जाती है।
अब आपको नियंत्रण नहीं,
बल्कि स्थिरता और समर्थन देना है।
हम अपने बच्चों का भाग्य नियंत्रित नहीं कर सकते,
कभी-कभी सीख अनुभव से आती है,
सलाह से नहीं।
और जब बच्चा यह जानता है कि
भले ही मैं गिर जाऊँ,”
तब वह जल्दी संभल भी जाता है।
लेकिन जब आपका बच्चा कोई निर्णय पहले ही ले चुका हो,
तो उस क्षण आपको अपने विचार तुरंत बदलने की आवश्यकता होती है।
डर और चिंता से भरे विचारों को छोड़कर,
उन्हें आशीर्वाद में बदलने की आवश्यकता होती है।
आप कह सकते हैं -
- “बेटा/बेटी, तुमने यह निर्णय ले लिया है।
- कोई बात नहीं। ईश्वर की शक्तियाँ तुम्हारे साथ हैं।
- हमारा आशीर्वाद तुम्हारे साथ है।
- तुम अवश्य सफल होगे।”
हो सकता है परिस्थिति कठिन हो।
हो सकता है उसने ऐसा रिश्ता या करियर चुना हो
जो आपको चुनौतीपूर्ण लगता हो।
लेकिन संभव है —
उसके अपने कर्मों और अनुभवों का परिणाम हो।
अब आपका कार्य अतीत को बदलना नहीं,
वर्तमान को शक्ति देना है।
यदि आपके हर विचार में शुद्धता और विश्वास है,
यदि आप उसके लिए सकारात्मक भाव रखते हैं,
तो वह आत्मा अपने अनुभवों को गरिमा, सम्मान और मजबूती के साथ पार कर सकेगी।
16- माता-पिता की वास्तविक भूमिका
वह अपनी नियति, अपने संस्कार और अपने कर्मों के साथ इस संसार में आता है।
आप उसके जीवन का रास्ता पूरी तरह समतल नहीं बना सकते।
सड़क जैसी है - वैसी ही रहेगी।
लेकिन आप उसे यह सिखा सकते हैं कि उस रास्ते पर चलना कैसे है।
- कहाँ संभलना है,
- कहाँ धैर्य रखना है,
- कहाँ झुकना है,
- और कहाँ साहस के साथ आगे बढ़ना है।
- आप अपने विचारों,
- अपने आशीर्वाद,
- अपनी सलाह
- और सबसे बढ़कर — अपने स्वयं के संस्कारों के माध्यम से
- उसे जीवन जीने की कला सिखा सकते हैं।
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| हमेशा बच्चे गलत नहीं होते | क्या माता-पिता हमेशा सही होते है , और बच्चे हमेशा गलत ? |
माता-पिता ध्यान करना प्रारम्भ करें।
यह लगभग हर माता-पिता का अनुभव है -
क्योंकि सच यही है -
17- आध्यात्मिक जीवनशैली का प्रभाव
स्वस्थ आहार केवल प्रोटीन या पोषक तत्वों तक सीमित नहीं है —
इसलिए ऐसा भोजन दें जिसमें-
- प्रेम हो,
- शांति हो,
- आशीर्वाद हो,
- और सकारात्मक ऊर्जा हो।
18- ध्यान के स्पंदनों की शक्ति
- तो घर का वातावरण बदलने लगता है।
- घर में शांति और शक्ति के स्पंदन उत्पन्न होते हैं।
- और वही स्पंदन बच्चों को आंतरिक रूप से मजबूत बनाते हैं।
यदि बच्चे पढ़ाई कर रहे हैं,
- तो उन्हें केवल बाहरी संसाधनों की नहीं,
- आंतरिक शक्ति की भी आवश्यकता होती है।
- जब माता-पिता चिंता छोड़कर स्थिर और शक्तिशाली रहते हैं,
- तो बच्चों के प्रदर्शन पर भी सकारात्मक प्रभाव पड़ता है।
पहले माता-पिता चिंता करते थे -
याद रखिए
इसलिए प्रत्येक माता-पिता को -
यह मत कहिए -
19- आध्यात्मिक घर - स्वर्ग समान घर
- घर में जो कुछ भी सुना जाए,
- जो पढ़ा जाए,
- जो देखा जाए,
- जो खाया और पिया जाए —
यदि वह सब शुद्ध और सकारात्मक हो,
- तो वही घर स्वर्ग बन जाता है।
- और जब घर स्वर्ग बनता है,
- तो उस घर में बड़े होने वाले बच्चे इस संसार के लिए प्रकाश बनते हैं।
20- अंत में माता-पिता की वास्तविक जिम्मेदारी
इसलिए
- पहले स्वयं को भीतर से दिव्य बनाइए।
- अपने मन की स्थिति को ऊँचा उठाइए।
- अपने संस्कारों को शुद्ध कीजिए।
- फिर उन्हीं संस्कारों की शक्ति से
- अपने बच्चों को भी ऊँचा उठाइए।
क्योंकि
- बच्चे हमारे कहे हुए से कम,
- हमारे जीए हुए से अधिक सीखते हैं।


