क्या आपने कभी सोचा है कि देवी केवल मंदिरों में ही नहीं, बल्कि हमारे भीतर भी मौजूद हैं?
जय माता दी प्रिय पाठकों 🙏
आशा करते हैं कि आप सुरक्षित और प्रसन्न होंगे।
आशा करते हैं कि आप सुरक्षित और प्रसन्न होंगे।
मित्रों,
आज हम एक अत्यंत महत्वपूर्ण और रहस्यमय स्तुति पर बात करेंगे-
अथ तंत्रोक्तं देवी सूक्तम्
यह देवी सूक्त साधारण स्तुति नहीं है, बल्कि यह तांत्रिक परंपरा में माँ आदिशक्ति की महिमा को समझने और अनुभव करने का एक शक्तिशाली माध्यम है। आइए इसे सरल और गहराई से समझते हैं, ताकि आप इसे अपने ब्लॉग पर भी सहज भाषा में प्रस्तुत कर सकें।
तंत्रोक्त देवी सूक्त क्या है?
तंत्रोक्त का अर्थ है - तंत्र शास्त्रों में बताया गया
और “देवी सूक्त” का अर्थ है - देवी की स्तुति करने वाले मंत्र या श्लोक
इस प्रकार, तंत्रोक्त देवी सूक्त वह स्तुति है जिसमें माँ भगवती के तांत्रिक स्वरूप, उनकी शक्तियों और उनके सर्वव्यापी अस्तित्व का वर्णन किया गया है।
यह सूक्त विशेष रूप से दुर्गा सप्तशती के पाठ में आता है और साधक इसे माँ की कृपा प्राप्त करने के लिए पढ़ते हैं।
देवी सूक्त का मुख्य भाव
इस सूक्त में माँ स्वयं यह बताती हैं कि—
वे ही इस संसार की मूल शक्ति हैं
वे ही सृष्टि, पालन और संहार करती हैं
हर जीव, हर शक्ति, हर विचार — सब उन्हीं से उत्पन्न होता है
माँ अपने भक्तों की हर संकट में रक्षा करती हैं।
अगर आप जानना चाहते हैं कि देवी कवच कैसे एक सुरक्षा घेरा बनाता है, तो पढ़े- देवी कवच की शक्ति और सुरक्षा का पूरा रहस्य
सीधे शब्दों में कहें तो,
जो कुछ भी है, वह सब देवी ही हैं
इस सूक्त में बार-बार एक ही बात अलग-अलग रूपों में कही गई है-
“या देवी सर्वभूतेषु…”
अर्थात — जो देवी सभी प्राणियों में स्थित हैं
अब इसे सरल रूप में समझते हैं:
हमारी बुद्धि = देवी
हमारी नींद = देवी
हमारी भूख = देवी
हमारी शक्ति = देवी
हमारी श्रद्धा = देवी
हमारी समृद्धि (लक्ष्मी) = देवी
हमारी दया और प्रेम = देवी
हमारा संतोष = देवी
यहाँ तक कि मोह और भ्रम भी देवी का ही रूप है।
यानी,
हम जो कुछ महसूस करते हैं — सब देवी की शक्ति से ही होता है।
देवी केवल एक रूप में नहीं हैं, बल्कि उनके कई गुप्त और रहस्यमयी स्वरूप हैं।
अगर आप इन्हें गहराई से समझना चाहते हैं, तो माँ दुर्गा के गुप्त रूपों का पूरा रहस्य जानने के लिए पढ़े-मूर्ति रहस्य: माँ दुर्गा के गुप्त रूपों का रहस्य
अथ तंत्रोक्तं देवी सूक्तम्
नमो देव्यै महादेव्यै शिवायै सततं नमः।
नमः प्रकृत्यै भद्रायै नियताः प्रणताः स्म ताम्॥
रौद्रायै नमो नित्यायै गौर्यै धात्र्यै नमो नमः।
ज्योत्स्नायै चन्द्ररूपिण्यै सुखायै सततं नमः॥
कल्याण्यै प्रणतां वृद्ध्यै सिद्ध्यै कुर्मो नमो नमः।
नैरृत्यै भद्रकाल्यै नमो नमः॥
दुर्गायै दुर्गपारायै सारायै सर्वकारिण्यै।
ख्यात्यै तथैव कृष्णायै धूम्रायै सततं नमः॥
अतिसौम्याऽतिरौद्रायै नतास्तस्यै नमो नमः।
नमो जगत्प्रतिष्ठायै देव्यै कृत्यै नमो नमः॥
“या देवी सर्वभूतेषु…” (तंत्रोक्त स्तुति का मुख्य भाग)
या देवी सर्वभूतेषु विष्णुमायेति शब्दिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥
या देवी सर्वभूतेषु चेतनेत्यभिधीयते।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥
या देवी सर्वभूतेषु बुद्धिरूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥
या देवी सर्वभूतेषु निद्रारूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥
या देवी सर्वभूतेषु क्षुधारूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥
या देवी सर्वभूतेषु छायारूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥
या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥
या देवी सर्वभूतेषु तृष्णारूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥
या देवी सर्वभूतेषु क्षान्तिरूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥
या देवी सर्वभूतेषु जातिरूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥
या देवी सर्वभूतेषु लज्जारूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥
या देवी सर्वभूतेषु शान्तिरूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥
या देवी सर्वभूतेषु श्रद्धारूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥
या देवी सर्वभूतेषु कान्तिरूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥
या देवी सर्वभूतेषु लक्ष्मीरूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥
या देवी सर्वभूतेषु वृत्तिरूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥
या देवी सर्वभूतेषु स्मृतिरूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥
या देवी सर्वभूतेषु दयारूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥
या देवी सर्वभूतेषु तुष्टिरूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥
या देवी सर्वभूतेषु मातृरूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥
या देवी सर्वभूतेषु भ्रान्तिरूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥
समापन श्लोक
इन्द्रियाणामधिष्ठात्री भूतानां चाखिलेषु या।
भूतेषु सततं तस्यै व्याप्त्यै देव्यै नमो नमः॥
चितिरूपेण या कृत्स्नमेतद्व्याप्य स्थिता जगत्।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥
स्तुता सुरैः पूर्वमभीष्टसंश्रयात्तथा सुरेन्द्रेण दिनेषु सेविता।
करोतु सा नः शुभहेतुरीश्वरी शुभानि भद्राण्यभिहन्तु चापदः।।
या साम्प्रतं चोद्धतदैत्यतापितैरस्माभिरीशा च सुरैर्नमस्यते।
या च स्मृता तत्क्षणमेव हन्ति नः सर्वापदो भक्तिविनम्रमूर्तिभिः।।
। इति तन्त्रोक्तं देवी सूक्तं संपूर्णम् ।
अब हम “अथ तंत्रोक्तं देवी सूक्तम्” का लाइन-बाय-लाइन सरल हिंदी अर्थ समझते हैं,
प्रारंभिक श्लोक हिन्दी अर्थ
नमो देव्यै महादेव्यै शिवायै सततं नमः।
हे देवी! आपको नमस्कार है, आप महादेवी हैं, शिव की शक्ति हैं — आपको बार-बार प्रणाम है।
नमः प्रकृत्यै भद्रायै नियताः प्रणताः स्म ताम्॥
आप ही इस सृष्टि की मूल प्रकृति हैं, आप कल्याण करने वाली हैं --हम सदा आपको प्रणाम करते हैं।
रौद्रायै नमो नित्यायै गौर्यै धात्र्यै नमो नमः।
आपको प्रणाम जो कभी उग्र (रौद्र) रूप में हैं, जो नित्य हैं, जो गौरी (शांत) हैं और जो सबको धारण करने वाली हैं।
ज्योत्स्नायै चन्द्ररूपिण्यै सुखायै सततं नमः॥
आपको प्रणाम जो चंद्रमा की तरह शीतल और प्रकाश देने वाली हैं, जो सबको सुख देती हैं।
कल्याण्यै प्रणतां वृद्ध्यै सिद्ध्यै कुर्मो नमो नमः।
हे कल्याण करने वाली माँ! जो आपके सामने झुकते हैं, उनकी उन्नति और सिद्धि देने वाली आपको प्रणाम है।
नैरृत्यै भद्रकाल्यै नमो नमः॥
आपको प्रणाम जो नकारात्मक शक्तियों को नष्ट करती हैं और भद्रकाली रूप में रक्षा करती हैं।
दुर्गायै दुर्गपारायै सारायै सर्वकारिण्यै।
आपको प्रणाम जो दुर्गा हैं, जो कठिनाइयों से पार लगाती हैं, जो सबका सार हैं और सब कार्य करने वाली हैं।
ख्यात्यै तथैव कृष्णायै धूम्रायै सततं नमः॥
आपको प्रणाम जो प्रसिद्ध हैं, जो कृष्ण (गंभीर/गूढ़) स्वरूप में हैं और जो धूम्र (रहस्यमयी) रूप में हैं।
अतिसौम्याऽतिरौद्रायै नतास्तस्यै नमो नमः।
आपको प्रणाम जो बहुत ही शांत भी हैं और बहुत ही उग्र भी — हम आपको नमन करते हैं।
नमो जगत्प्रतिष्ठायै देव्यै कृत्यै नमो नमः॥
आपको प्रणाम जो पूरे जगत की आधार हैं और सब कार्यों को करने वाली देवी हैं।
“या देवी सर्वभूतेषु…” (मुख्य भाग)
(हर पंक्ति का अर्थ लगभग एक जैसा है, बस देवी का रूप बदलता है)
या देवी सर्वभूतेषु विष्णुमायेति शब्दिता।
जो देवी सभी प्राणियों में विष्णु की माया के रूप में जानी जाती हैं।उन्हें बार-बार नमस्कार है।
या देवी सर्वभूतेषु चेतनेत्यभिधीयते।
जो देवी सभी में चेतना (जीवन की जागरूकता) के रूप में हैं।
उन्हें बार-बार नमस्कार है।
या देवी सर्वभूतेषु बुद्धिरूपेण संस्थिता।
जो देवी सभी में बुद्धि (समझ और सोच) के रूप में हैं।
उन्हें बार-बार नमस्कार है।
या देवी सर्वभूतेषु निद्रारूपेण संस्थिता।
जो देवी सभी में नींद (आराम देने वाली शक्ति) के रूप में हैं।
उन्हें बार-बार नमस्कार है।
या देवी सर्वभूतेषु क्षुधारूपेण संस्थिता।
जो देवी सभी में भूख के रूप में हैं।
उन्हें बार-बार नमस्कार है।
या देवी सर्वभूतेषु छायारूपेण संस्थिता।
जो देवी सभी में छाया (सुरक्षा और साथ) के रूप में हैं।
उन्हें बार-बार नमस्कार है।
या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता।
जो देवी सभी में शक्ति (ताकत और ऊर्जा) के रूप में हैं।
उन्हें बार-बार नमस्कार है।
या देवी सर्वभूतेषु तृष्णारूपेण संस्थिता।
जो देवी सभी में इच्छा और प्यास के रूप में हैं।
उन्हें बार-बार नमस्कार है।
या देवी सर्वभूतेषु क्षान्तिरूपेण संस्थिता।
जो देवी सभी में क्षमा (सहन करने की शक्ति) के रूप में हैं।
उन्हें बार-बार नमस्कार है।
या देवी सर्वभूतेषु जातिरूपेण संस्थिता।
जो देवी सभी में जन्म और अस्तित्व के रूप में हैं।
उन्हें बार-बार नमस्कार है।
या देवी सर्वभूतेषु लज्जारूपेण संस्थिता।
जो देवी सभी में लज्जा (संकोच और मर्यादा) के रूप में हैं।
उन्हें बार-बार नमस्कार है।
या देवी सर्वभूतेषु शान्तिरूपेण संस्थिता।
जो देवी सभी में शांति के रूप में हैं।
उन्हें बार-बार नमस्कार है।
या देवी सर्वभूतेषु श्रद्धारूपेण संस्थिता।
जो देवी सभी में श्रद्धा (भक्ति और विश्वास) के रूप में हैं।
उन्हें बार-बार नमस्कार है।
या देवी सर्वभूतेषु कान्तिरूपेण संस्थिता।
जो देवी सभी में सौंदर्य और आकर्षण के रूप में हैं।
उन्हें बार-बार नमस्कार है।
या देवी सर्वभूतेषु लक्ष्मीरूपेण संस्थिता।
जो देवी सभी में धन और समृद्धि के रूप में हैं।
उन्हें बार-बार नमस्कार है।
या देवी सर्वभूतेषु वृत्तिरूपेण संस्थिता।
जो देवी सभी में जीवन चलाने के साधनों के रूप में हैं।
उन्हें बार-बार नमस्कार है।
या देवी सर्वभूतेषु स्मृतिरूपेण संस्थिता।
जो देवी सभी में स्मृति (याद रखने की शक्ति) के रूप में हैं।
उन्हें बार-बार नमस्कार है।
या देवी सर्वभूतेषु दयारूपेण संस्थिता।
जो देवी सभी में दया (करुणा) के रूप में हैं।
उन्हें बार-बार नमस्कार है।
या देवी सर्वभूतेषु तुष्टिरूपेण संस्थिता।
जो देवी सभी में संतोष (संतुष्टि) के रूप में हैं।
उन्हें बार-बार नमस्कार है।
या देवी सर्वभूतेषु मातृरूपेण संस्थिता।
जो देवी सभी में माँ (ममता और स्नेह) के रूप में हैं।
उन्हें बार-बार नमस्कार है।
या देवी सर्वभूतेषु भ्रान्तिरूपेण संस्थिता।
जो देवी सभी में भ्रम (माया) के रूप में हैं।
उन्हें बार-बार नमस्कार है।
हर श्लोक के अंत में:
“नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः”
अर्थ: उस देवी को बार-बार नमस्कार है।
समापन श्लोक
इन्द्रियाणामधिष्ठात्री भूतानां चाखिलेषु या।
जो देवी सभी इंद्रियों को नियंत्रित करती हैं और सभी प्राणियों में विद्यमान हैं।
भूतेषु सततं तस्यै व्याप्त्यै देव्यै नमो नमः॥
जो देवी हर जगह फैली हुई हैं, उन्हें बार-बार नमस्कार है।
चितिरूपेण या कृत्स्नमेतद्व्याप्य स्थिता जगत्।
जो देवी चेतना (चिति) के रूप में पूरे संसार में फैली हुई हैं।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥
उस देवी को बार-बार प्रणाम है।
स्तुता सुरैः पूर्वमभीष्टसंश्रयात्तथा सुरेन्द्रेण दिनेषु सेविता।
करोतु सा नः शुभहेतुरीश्वरी शुभानि भद्राण्यभिहन्तु चापदः।।
हे माँ! जैसे आपने पहले देवताओं की रक्षा की, वैसे ही हमारी भी रक्षा करें और हमें सुख दें।
या साम्प्रतं चोद्धतदैत्यतापितैरस्माभिरीशा च सुरैर्नमस्यते।
या च स्मृता तत्क्षणमेव हन्ति नः सर्वापदो भक्तिविनम्रमूर्तिभिः।।
हे माँ! आप इतनी करुणामयी हैं कि केवल सच्चे मन से याद करने पर ही हमारी सारी परेशानियाँ दूर कर देती हैं।
तांत्रिक दृष्टि से इसका महत्व
तंत्र शास्त्र में देवी को केवल पूजा की वस्तु नहीं माना जाता, बल्कि-
ऊर्जा (Energy)
चेतना (Consciousness)
कुंडलिनी शक्ति
के रूप में समझा जाता है।
जो हमें सिखाता है कि-
देवी कहीं बाहर नहीं, बल्कि हमारे अंदर ही हैं।
साधना में इसका उपयोग
अगर कोई साधक इस सूक्त का नियमित पाठ करता है, तो--
मन में शांति और स्थिरता आती है
डर और नकारात्मकता दूर होती है
आत्मविश्वास बढ़ता है
देवी की कृपा का अनुभव होता है
खासकर नवरात्रि, अमावस्या या शुक्रवार के दिन इसका पाठ बहुत फलदायी माना जाता है।
ध्यान रखने वाली बातें
इस सूक्त को श्रद्धा और शुद्ध मन से पढ़ना चाहिए
केवल शब्द पढ़ना ही काफी नहीं, उसका भाव समझना भी जरूरी है
तांत्रिक साधना बिना गुरु के गहराई में नहीं करनी चाहिए
इसका गहरा आध्यात्मिक संदेश
इस सूक्त का सबसे बड़ा संदेश यह है कि--
हम अकेले नहीं हैं
हर क्षण माँ हमारे साथ हैं
हमारी शक्ति, बुद्धि, भावना — सब उन्हीं का रूप है
जब यह बात दिल से समझ में आ जाती है, तो जीवन बदलने लगता है।
अंत में
प्रिय पाठकों,
जब भी आप कमजोर महसूस करें, डर लगे या मन भटक जाए,
बस इतना याद रखें--
माँ आपके अंदर ही हैं
और उसी क्षण आप फिर से मजबूत महसूस करेंगे।
FAQs
1. तंत्रोक्तं देवी सूक्तम् क्या है?
यह देवी की स्तुति है जो तंत्र शास्त्रों में वर्णित है।
इसमें माँ के विभिन्न रूपों—जैसे शक्ति, बुद्धि, श्रद्धा, लक्ष्मी आदि-का वर्णन किया गया है।
2. तंत्रोक्तं देवी सूक्तम् कहाँ से लिया गया है?
यह दुर्गा सप्तशती (मार्कंडेय पुराण) का एक महत्वपूर्ण भाग है, जिसे देवी की उपासना में पढ़ा जाता है।
3. “या देवी सर्वभूतेषु” का क्या अर्थ है?
इसका अर्थ है-
- जो देवी सभी प्राणियों में अलग-अलग रूपों में स्थित हैं
- जैसे बुद्धि, शक्ति, नींद, श्रद्धा, दया आदि।
4. तंत्रोक्त देवी सूक्तम् का पाठ कब करना चाहिए?
आप इसे किसी भी दिन कर सकते हैं, लेकिन विशेष रूप से—
- नवरात्रि
- शुक्रवार
- अमावस्या
इन दिनों इसका पाठ अधिक फलदायी माना जाता है।
5. इस सूक्त का पाठ करने से क्या लाभ होता है?
इसके नियमित पाठ से-
- मन शांत होता है
- डर और नकारात्मकता दूर होती है
- आत्मविश्वास बढ़ता है
- देवी की कृपा प्राप्त होती है
6. क्या बिना समझे इसका पाठ करना ठीक है?
हाँ, कर सकते हैं, लेकिन
अर्थ समझकर पढ़ने से इसका प्रभाव कई गुना बढ़ जाता है।
7. क्या महिलाएं तंत्रोक्त देवी सूक्तम् का पाठ कर सकती हैं?
बिल्कुल, महिलाएं और पुरुष—दोनों इसका पाठ कर सकते हैं।
इसमें कोई प्रतिबंध नहीं है।
8. क्या इस सूक्त के लिए किसी विशेष विधि की जरूरत होती है?
सामान्य पाठ के लिए कोई कठिन विधि नहीं है—
बस साफ मन और श्रद्धा जरूरी है।
लेकिन गहरी तांत्रिक साधना के लिए गुरु मार्गदर्शन आवश्यक होता है।
9. क्या केवल “या देवी सर्वभूतेषु” का जप करना पर्याप्त है?
हाँ, यह सूक्त का सबसे शक्तिशाली भाग है।
केवल इस मंत्र का जप भी बहुत लाभकारी माना जाता है।
10. क्या इस सूक्त से जीवन की समस्याएं दूर हो सकती हैं?
यह सूक्त हमें मानसिक शक्ति, शांति और सही दिशा देता है।
इससे हम समस्याओं का सामना बेहतर तरीके से कर पाते हैं।
11. क्या तंत्रोक्त देवी सूक्तम् से माँ जल्दी प्रसन्न होती हैं?
अगर इसे सच्चे मन और श्रद्धा से पढ़ा जाए, तो माँ की कृपा जल्दी अनुभव होने लगती है।
प्रिय पाठकों,
हम आशा करते हैं कि तंत्रोक्तं देवी सूक्तम् से जुड़ी यह जानकारी आपको सरल और उपयोगी लगी होगी।
अगर आपको यह पोस्ट अच्छी लगी हो, तो इसे अपने मित्रों और परिवार के साथ जरूर साझा करें।
और नीचे कमेंट करके बताइए - आप माँ को किस रूप में सबसे ज्यादा महसूस करते हैं?
आपका एक कमेंट हमें और बेहतर लिखने की प्रेरणा देता है।
धन्यवाद, 🙏
जय माता दी 🙏
हर हर महादेव 🙏

