दुर्गा सप्तशती अध्याय 5: शुम्भ-निशुम्भ का अहंकार और माँ दुर्गा की चुनौती
पिछले अध्याय में हमने देखा कि कैसे देवताओं ने माँ दुर्गा की स्तुति की और माँ ने उन्हें आशीर्वाद दिया। लेकिन क्या अब सब कुछ शांत हो गया?
संक्षेप में उत्तर
दुर्गा सप्तशती अध्याय 5 में शुम्भ और निशुम्भ नामक असुरों का वर्णन है, जो देवी के सौंदर्य से प्रभावित होकर उन्हें अपने पास लाने का प्रयास करते हैं। देवी उन्हें चुनौती देती हैं कि जो उन्हें युद्ध में हरा देगा, वही उन्हें प्राप्त कर सकता है।
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| शुम्भ-निशुम्भ के दूत द्वारा माँ दुर्गा को संदेश देते हुए – यह दृश्य अहंकार और आत्मसम्मान के बीच होने वाली पहली टकराहट को दर्शाता है। |
कहानी: शुम्भ-निशुम्भ का अहंकार
बहुत समय बाद…
दो शक्तिशाली असुर थे - शुम्भ और निशुम्भ
उन्होंने अपनी शक्ति के बल पर तीनों लोकों पर कब्जा कर लिया।
देवताओं को फिर से स्वर्ग से निकाल दिया गया।
उनका अहंकार इतना बढ़ गया था कि-
- उन्हें लगता था कि संसार में उनसे बड़ा कोई नहीं।
देवी के सौंदर्य की चर्चा
एक दिन उनके सेवक चंड और मुंड ने माँ दुर्गा (देवी) को देखा।
वे माँ की सुंदरता और तेज से चकित रह गए।
उन्होंने जाकर शुम्भ-निशुम्भ से कहा-
- हे स्वामी! हमने ऐसी सुंदर देवी कभी नहीं देखी।
- वह आपके योग्य ही हैं।
अहंकार का प्रस्ताव
यह सुनकर शुम्भ-निशुम्भ के मन में अहंकार जाग उठा।
उन्होंने सोचा-
- जो भी सुंदर और श्रेष्ठ है, वह हमारा ही होना चाहिए।
उन्होंने अपने दूत को देवी के पास भेजा और संदेश दिया-
- तुम हमारे पास आ जाओ, हम तुम्हें रानी बना देंगे।
माँ दुर्गा का उत्तर
माँ दुर्गा ने मुस्कुराते हुए उत्तर दिया-
- मैंने एक व्रत लिया है कि मैं उसी से विवाह करूंगी,
- जो मुझे युद्ध में हरा देगा।
दूत की प्रतिक्रिया
दूत यह सुनकर हैरान रह गया…
उसने कहा-
- तुम जानती नहीं हो कि हमारे स्वामी कितने शक्तिशाली हैं!”
- लेकिन माँ शांत रहीं…
उन्होंने साफ शब्दों में कहा-
- यदि वे मुझे जीत सकते हैं, तो आकर युद्ध करें।
युद्ध की भूमिका तैयार
जब दूत ने यह बात शुम्भ-निशुम्भ को बताई,
तो वे क्रोधित हो गए।
- उनका अहंकार अब चुनौती में बदल चुका था।
उन्होंने अपनी सेना को तैयार किया-
- और माँ दुर्गा के खिलाफ युद्ध की तैयारी शुरू कर दी।
असली संदेश (Deep Meaning)
शुम्भ-निशुम्भ = हमारा अहंकार और लालच
माँ दुर्गा = आत्मसम्मान और शक्ति
जब अहंकार बढ़ता है,
तो इंसान सोचता है- सब कुछ मेरा है
लेकिन माँ दुर्गा हमें सिखाती हैं-
- खुद की कीमत समझो, और गलत के सामने झुको मत।
एक छोटी सी जीवन से जुड़ी कहानी
एक लड़की थी…
किसी ने उसे कहा-
- अगर तुम मेरी बात मानोगी, तभी तुम्हें सफलता मिलेगी।
लेकिन उसने अपने आत्मसम्मान को नहीं छोड़ा।
- उसने मेहनत की और अपने दम पर सफल हुई।
यही माँ दुर्गा का संदेश है—
- कभी भी अपने आत्मसम्मान से समझौता मत करो।
जीवन के लिए महत्वपूर्ण सीख
आत्मसम्मान सबसे बड़ी शक्ति है
अहंकार हमेशा गलत फैसले कराता है
सही के लिए खड़े रहना जरूरी है
किसी के दबाव में आकर निर्णय न लें
निष्कर्ष
दुर्गा सप्तशती का अध्याय 5 हमें यह सिखाता है कि
जब अहंकार बढ़ता है, तो वह खुद अपने विनाश को बुलाता है।
और जो अपने आत्मसम्मान के साथ खड़ा रहता है,
वही सच्चा विजेता होता है।
अगर आपने दुर्गा सप्तशती का अध्याय 4 नहीं पढ़ा, तो पहले उसे जरूर पढ़ें: देवताओं की स्तुति और माँ दुर्गा का दिव्य आशीर्वाद
FAQs (अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न)
1. दुर्गा सप्तशती अध्याय 5 में क्या बतया गया है?
अध्याय 5 में शुम्भ-निशुम्भ के अहंकार, देवी को भेजे गए संदेश और युद्ध की शुरुआत का वर्णन है।
2. शुम्भ और निशुम्भ कौन थे?
वे दो शक्तिशाली असुर थे जिन्होंने तीनों लोकों पर कब्जा कर लिया था और अत्यंत अहंकारी हो गए थे।
3. देवी को विवाह का प्रस्ताव क्यों दिया गया?
चंड और मुंड ने देवी की सुंदरता का वर्णन किया, जिससे प्रभावित होकर शुम्भ-निशुम्भ ने देवी को अपना बनाने का विचार किया।
4. माँ दुर्गा ने क्या उत्तर दिया?
माँ दुर्गा ने कहा कि वे उसी से विवाह करेंगी जो उन्हें युद्ध में हरा सके।
5. इस अध्याय का मुख्य संदेश क्या है?
यह अध्याय सिखाता है कि आत्मसम्मान सबसे महत्वपूर्ण है और अहंकार व्यक्ति को गलत दिशा में ले जाता है।
6. क्या यह अध्याय आगे के युद्ध की शुरुआत है?
हाँ, यह अध्याय आगे होने वाले बड़े युद्ध की भूमिका तैयार करता है।
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इसी के साथ विदा लेते हैं अगली रोचक, ज्ञानवर्धक जानकारी के साथ विश्वज्ञान मे फिर से मुलाकात होगी ,तब तक के लिय आप अपना ख्याल रखे, हंसते रहिए, मुस्कराते रहिए और औरों को भी खुशियाँ बांटते रहिए।
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