दुर्गा सप्तशती के 13 अध्यायों की दिव्य यात्रा के बाद अब हम प्रवेश कर रहे हैं उन स्तोत्रों में, जो केवल कथा नहीं, बल्कि साधना, सुरक्षा और माँ की कृपा प्राप्त करने का मार्ग माने जाते हैं।
इससे पहले हमने देवी कवच के माध्यम से माँ की दिव्य सुरक्षा को समझा, और अब अर्गला स्तोत्र में हम माँ की कृपा और बाधाओं को दूर करने वाले रहस्य को
अर्गला का अर्थ होता है — द्वार की कुंडी या बाधा को हटाने वाला माध्यम।
अर्थात - यह स्तोत्र जीवन की रुकावटों, बाधाओं और नकारात्मक शक्तियों को दूर कर सफलता, विजय, यश और माँ दुर्गा की कृपा प्राप्त करने का मार्ग खोलता है।
इस स्तोत्र में बार-बार एक पंक्ति आती है-
“रूपं देहि, जयं देहि, यशो देहि, द्विषो जहि”
यही अर्गला स्तोत्र का हृदय है।
यह केवल सांसारिक सफलता की प्रार्थना नहीं, बल्कि जीवन को भीतर और बाहर दोनों रूपों से सुंदर बनाने की पुकार है।
आज हम अर्गला स्तोत्र को सरल भाषा में, संस्कृत पाठ, हिन्दी अर्थ, पाठ विधि, लाभ और इसके गहरे आध्यात्मिक रहस्य सहित विस्तार से समझेंगे।
इस Post में आप जानेंगे
- अर्गला स्तोत्र क्या है?
- अर्गला स्तोत्र का पूरा संस्कृत पाठ
- सरल हिन्दी अर्थ सहित व्याख्या
- “रूपं देहि, जयं देहि” का गहरा अर्थ
- अर्गला स्तोत्र का पाठ कैसे करें?
- पाठ के नियम और सावधानियाँ
- कितने दिन तक पाठ करना चाहिए?
- किन समस्याओं में इसका पाठ लाभकारी है?
- अर्गला स्तोत्र के आध्यात्मिक और जीवन संबंधी लाभ
- इसका गहरा आध्यात्मिक रहस्य
- अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
तो चलिए शुरू करते हैं आज की पोस्ट और सबसे पहले जानते हैं की-
अर्गला स्तोत्र क्या है और इसका पाठ क्यों किया जाता है?
अर्गला स्तोत्र दुर्गा सप्तशती का एक महत्वपूर्ण स्तोत्र है, जिसका पाठ माँ दुर्गा की कृपा, सफलता, विजय, यश और बाधाओं को दूर करने के लिए किया जाता है। “रूपं देहि, जयं देहि, यशो देहि, द्विषो जहि” इसका सबसे प्रसिद्ध मंत्र है, जो जीवन में शुभता, सम्मान और आंतरिक शक्ति का प्रतीक माना जाता है।
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| माँ दुर्गा का दिव्य स्वरूप, जो अर्गला स्तोत्र के माध्यम से भक्तों के जीवन की बाधाएँ दूर कर कृपा और विजय प्रदान करती हैं। |
अथ अर्गला स्तोत्रम्
संस्कृत पाठ व सरल हिन्दी अर्थ
ॐ नमश्चण्डिकायै॥
हिन्दी अर्थ
माँ चण्डिका को मेरा प्रणाम।
मार्कण्डेय उवाच
जय त्वं देवि चामुण्डे
जय भूतार्तिहारिणि।
जय सर्वगते देवि
कालरात्रि नमोऽस्तु ते॥ १॥
हिन्दी अर्थ
हे देवी चामुण्डे! आपकी जय हो।
हे सभी प्राणियों के दुखों को दूर करने वाली माता! आपकी जय हो।
हे सर्वव्यापी देवी!
हे कालरात्रि स्वरूपिणी!
आपको मेरा बार-बार प्रणाम।
देवी से रक्षा की प्रार्थना
जयन्ती मङ्गला काली
भद्रकाली कपालिनी।
दुर्गा क्षमा शिवा धात्री
स्वाहा स्वधा नमोऽस्तु ते॥ २॥
हिन्दी अर्थ
हे जयन्ती!
हे मंगलमयी!
हे काली!
हे भद्रकाली!
हे कपालिनी!
हे दुर्गा!
हे क्षमा स्वरूपिणी!
हे शिवा!
हे पालन करने वाली माता!
आपको प्रणाम है।
मुख्य प्रार्थना
मधुकैटभविध्वंसि
विधातृवरदे नमः।
रूपं देहि जयं देहि
यशो देहि द्विषो जहि॥ ३॥
हिन्दी अर्थ
हे मधु और कैटभ नामक असुरों का नाश करने वाली माँ!
हे ब्रह्मा को वर देने वाली देवी!
मुझे सुंदर रूप दें,
विजय दें,
यश दें,
और मेरे शत्रुओं का नाश करें।
महिषासुर मर्दिनी से प्रार्थना
महिषासुरनिर्नाशि
भक्तानां सुखदे नमः।
रूपं देहि जयं देहि
यशो देहि द्विषो जहि॥ ४॥
हिन्दी अर्थ
हे महिषासुर का वध करने वाली माँ!
हे भक्तों को सुख देने वाली देवी!
मुझे रूप दें,
विजय दें,
यश दें,
और शत्रुओं का नाश करें।
रक्तबीज विनाशिनी
रक्तबीजवधे देवि
चण्डमुण्डविनाशिनि।
रूपं देहि जयं देहि
यशो देहि द्विषो जहि॥ ५॥
हिन्दी अर्थ
हे रक्तबीज का वध करने वाली देवी!
हे चण्ड और मुण्ड का नाश करने वाली माँ!
मुझे सौंदर्य दें,
विजय दें,
यश दें,
और मेरे शत्रुओं का नाश करें।
शुम्भ-निशुम्भ विनाशिनी
शुम्भस्यैव निशुम्भस्य
धूम्रलोचनमर्दिनि।
रूपं देहि जयं देहि
यशो देहि द्विषो जहि॥ ६॥
हिन्दी अर्थ
हे शुम्भ, निशुम्भ और धूम्रलोचन का संहार करने वाली माँ!
मुझे रूप दें,
विजय दें,
यश दें,
और मेरे शत्रुओं का नाश करें।
भक्त की निरंतर प्रार्थना
वन्दिताङ्घ्रियुगे देवि
सर्वसौभाग्यदायिनि।
रूपं देहि जयं देहि
यशो देहि द्विषो जहि॥ ७॥
हिन्दी अर्थ
हे देवी!
जिनके चरणों की सभी देवता वंदना करते हैं,
हे समस्त सौभाग्य देने वाली माता!
मुझे सुंदरता, विजय, यश प्रदान करें
और शत्रुओं का नाश करें।
अचिन्त्य रूप वाली माँ
अचिन्त्यरूपचरिते
सर्वशत्रुविनाशिनि।
रूपं देहि जयं देहि
यशो देहि द्विषो जहि॥ ८॥
हिन्दी अर्थ
हे अचिन्त्य रूप और अद्भुत चरित्र वाली देवी!
हे सभी शत्रुओं का नाश करने वाली माँ!
मुझे रूप दें, विजय दें, यश दें
और द्वेष रखने वालों का अंत करें।
भक्तों के पाप हरने वाली
नतेभ्यः सर्वदा भक्त्या
चापर्णे दुरितापहे।
रूपं देहि जयं देहि
यशो देहि द्विषो जहि॥ ९॥
हिन्दी अर्थ
हे अपर्णा माता!
जो भक्तिभाव से आपको प्रणाम करते हैं,
आप उनके पाप और दुखों को दूर करती हैं।
मुझे रूप, विजय, यश दें
और शत्रुओं का नाश करें।
रोग और दुःख हरने वाली
स्तुवद्भ्यो भक्तिपूर्वं त्वां
चण्डिके व्याधिनाशिनि।
रूपं देहि जयं देहि
यशो देहि द्विषो जहि॥ १०॥
हिन्दी अर्थ
हे चण्डिका!
जो भक्त प्रेम और श्रद्धा से आपकी स्तुति करते हैं,
आप उनके रोग और कष्टों को दूर करती हैं।
मुझे विजय, यश और कृपा दें।
सौभाग्य और आरोग्य की प्रार्थना
देहि सौभाग्यमारोग्यं
देहि देवि परं सुखम्।
रूपं देहि जयं देहि
यशो देहि द्विषो जहि॥ ११॥
हिन्दी अर्थ
हे देवी!
मुझे सौभाग्य दें,
स्वास्थ्य दें,
और जीवन में परम सुख प्रदान करें।
साथ ही विजय, यश और शत्रुनाश भी दें।
कल्याण और धन की प्रार्थना
विधेहि देवि कल्याणं
विधेहि परमां श्रियम्।
रूपं देहि जयं देहि
यशो देहि द्विषो जहि॥ १२॥
हिन्दी अर्थ
हे माँ!
मेरा कल्याण करें
और श्रेष्ठ समृद्धि प्रदान करें।
मुझे विजय और यश भी दें।
विद्या और शक्ति की प्रार्थना
विधेहि द्विषतां नाशं
विधेहि बलमुच्चकैः।
रूपं देहि जयं देहि
यशो देहि द्विषो जहि॥ १३॥
हिन्दी अर्थ
हे देवी!
मेरे विरोधियों का नाश करें
और मुझे उच्च शक्ति एवं साहस प्रदान करें।
अर्गला स्तोत्र के पाठ का फल
अर्गला स्तोत्र केवल शब्दों का पाठ नहीं है-
यह माँ के चरणों में पूर्ण समर्पण है।
जो व्यक्ति सच्चे मन से इसका पाठ करता है-
- उसके जीवन की बाधाएँ धीरे-धीरे कम होने लगती हैं
- कार्यों में सफलता मिलने लगती है
- मन में आत्मविश्वास और स्थिरता आती है
- नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है
- शत्रु और विरोध शांत होने लगते हैं
- जीवन में सम्मान, यश और सौभाग्य बढ़ता है
कहा जाता है-
- जहाँ अर्गला स्तोत्र का श्रद्धा से पाठ होता है,
- वहाँ माँ की कृपा सहज रूप से प्रवाहित होने लगती है।
“रूपं देहि, जयं देहि…” का अंतिम रहस्य
इस स्तोत्र का सबसे प्रसिद्ध भाग है-
रूपं देहि
जयं देहि
यशो देहि
द्विषो जहि
बहुत लोग इसे केवल सांसारिक सफलता की प्रार्थना मानते हैं-
लेकिन इसका वास्तविक अर्थ बहुत गहरा है।
- रूपं देहि = मुझे सुंदर व्यक्तित्व और सद्गुण दो
- जयं देहि = मेरे संघर्षों में विजय दो
- यशो देहि = अच्छे कर्मों से सम्मान दो
- द्विषो जहि = मेरे भीतर और बाहर के शत्रुओं का नाश करो
सबसे बड़ा शत्रु बाहर नहीं-
- अंदर का भय, क्रोध, मोह और अहंकार है।
माँ का संदेश
माँ मानो हमसे कहती हैं-
- “तुम केवल प्रयास करो,
- मार्ग मैं खोल दूँगी…”
- जब मन थक जाए…
- जब सफलता दूर लगे…
- जब सब रास्ते बंद दिखें…
तब माँ को पुकारिए-
- वह भीतर से शक्ति देंगी
- और सही दिशा भी।
निष्कर्ष
अर्गला स्तोत्र हमें यह सिखाता है-
- सफलता केवल मेहनत से नहीं,
- कृपा और सही दिशा से भी मिलती है।
और जब भक्ति सच्ची हो-
- तो बंद दरवाजे भी खुलने लगते हैं।
जिसके साथ माँ की कृपा हो-
- उसके लिए असंभव भी संभव हो जाता है।
अंतिम प्रार्थना
जय माता दी 🌺
अर्गला स्तोत्र का पाठ कैसे करें? (पाठ विधि)
1. प्रातःकाल स्नान के बाद पाठ करें
सुबह ब्रह्म मुहूर्त या सूर्योदय के बाद स्नान करके स्वच्छ वस्त्र पहनें।
2. माँ दुर्गा की प्रतिमा या चित्र के सामने बैठें
यदि संभव हो तो पूजा स्थान में
माँ दुर्गा, माँ चामुंडा या माँ चण्डिका के चित्र के सामने बैठें।
3. दीपक और धूप जलाएँ
घी का दीपक या तिल के तेल का दीपक जलाना शुभ माना जाता है।
साथ में धूप या अगरबत्ती भी लगा सकते हैं।
4. पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख रखें
पूर्व दिशा ज्ञान और प्रकाश का प्रतीक है,
उत्तर दिशा आध्यात्मिक उन्नति का।
5. शांत मन से पाठ करें
जल्दबाजी या केवल औपचारिकता में पाठ न करें।
भाव और श्रद्धा सबसे अधिक महत्वपूर्ण हैं।
6. दुर्गा सप्तशती से पहले पढ़ना श्रेष्ठ माना जाता है
अधिकतर साधक क्रम इस प्रकार रखते हैं-
- देवी कवच
- अर्गला स्तोत्र
- कीलक स्तोत्र
- मुख्य सप्तशती पाठ
अर्गला स्तोत्र कितने दिन पढ़ना चाहिए?
यह व्यक्ति की श्रद्धा और संकल्प पर निर्भर करता है।
सामान्य रूप से-
- 11 दिन
- 21 दिन
- 40 दिन
- नवरात्रि के 9 दिन
बहुत शुभ माने जाते हैं।
कई भक्त इसका नियमित दैनिक पाठ भी करते हैं।
किन समस्याओं में अर्गला स्तोत्र पढ़ें?
यदि जीवन में-
- बार-बार रुकावटें आ रही हों
- कार्य बनते-बनते रुक जाते हों
- सफलता में देरी हो रही हो
- मानसिक अशांति हो
- आत्मविश्वास कम हो
- शत्रु बाधा या विरोध बढ़ रहा हो
- नकारात्मकता अधिक महसूस हो
तो अर्गला स्तोत्र का पाठ अत्यंत लाभकारी माना जाता है।
अर्गला स्तोत्र के लाभ
मानसिक लाभ
- मन शांत होता है
- आत्मविश्वास बढ़ता है
- भय और चिंता कम होती है
आध्यात्मिक लाभ
- माँ दुर्गा की कृपा प्राप्त होती है
- नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है
- भक्ति और विश्वास मजबूत होता है
जीवन संबंधी लाभ
- कार्यों में सफलता
- बाधाओं का निवारण
- सम्मान और यश
- सही निर्णय लेने की शक्ति
पाठ के नियम (बहुत जरूरी)
- स्नान के बाद पाठ करें
- स्वच्छ वस्त्र पहनें
- शुद्ध स्थान पर बैठें
- मन शांत रखें
- उच्चारण स्पष्ट रखें
- श्रद्धा और विनम्रता रखें
क्या नहीं करना चाहिए?
- केवल प्रयोग की तरह पाठ न करें
- जल्दबाजी में न पढ़ें
- अपमान या परीक्षा के भाव से न करें
- केवल लाभ के लिए बिना भक्ति के न करें
अर्गला स्तोत्र का गहरा आध्यात्मिक अर्थ
“अर्गला” का अर्थ है-
- द्वार की कुंडी
- बाधा हटाने वाला माध्यम
अर्थात-
यह स्तोत्र जीवन के बंद दरवाजों को खोलने का प्रतीक है।
लेकिन सबसे बड़ी बाधाएँ बाहर नहीं होतीं-
- डर
- भ्रम
- आलस्य
- क्रोध
- नकारात्मक सोच
- आत्मविश्वास की कमी
माँ की कृपा से ये भीतर की रुकावटें हटती हैं।
यही इसका सबसे गहरा रहस्य है।
अंतिम प्रार्थना
हे माँ चण्डिका 🙏
- हमारे जीवन की सभी बाधाओं को दूर कीजिए।
- हमें सही दिशा दीजिए।
- हमारे भीतर के भय, क्रोध और भ्रम को नष्ट कीजिए।
- हमें ऐसा मन दीजिए
- जो हर परिस्थिति में आपकी शरण में बना रहे।
जय माता दी
आगे पढ़ें
कीलक स्तोत्र – दुर्गा सप्तशती के गूढ़ रहस्य खोलने वाला स्तोत्र
अंतिम संदेश
अर्गला स्तोत्र केवल पढ़ने के लिए नहीं-
- विश्वास रखिए
- माँ को स्मरण कीजिए
- और धैर्य के साथ आगे बढ़िए
क्योंकि-
- जहाँ माँ की कृपा होती है,
- वहाँ रुकावटें टिक नहीं पातीं।
अर्गला स्तोत्र से जुड़े महत्वपूर्ण प्रश्न
Q1. अर्गला स्तोत्र क्या है?
अर्गला स्तोत्र दुर्गा सप्तशती का एक महत्वपूर्ण भाग है, जो माँ दुर्गा की कृपा, सफलता, यश और बाधाओं को दूर करने के लिए पढ़ा जाता है।
Q2. अर्गला स्तोत्र का पाठ कब करना चाहिए?
इसका पाठ प्रातःकाल, नवरात्रि में, दुर्गा सप्तशती पाठ से पहले, या किसी विशेष कार्य की सफलता के लिए किया जा सकता है।
Q3. “रूपं देहि, जयं देहि” का क्या अर्थ है?
इसका अर्थ है—मुझे सुंदर गुण दें, विजय दें, यश दें और शत्रुओं का नाश करें। इसका गहरा अर्थ बाहरी और आंतरिक दोनों सफलता से जुड़ा है।
Q4. अर्गला स्तोत्र का सबसे बड़ा लाभ क्या है?
इसका सबसे बड़ा लाभ है—जीवन की बाधाओं का दूर होना, आत्मविश्वास बढ़ना और माँ की कृपा से सही दिशा प्राप्त होना।
Q5. क्या अर्गला स्तोत्र का पाठ रोज़ किया जा सकता है?
हाँ, श्रद्धा और शुद्ध भाव से इसका पाठ प्रतिदिन किया जा सकता है। नियमित पाठ से मानसिक शांति और सकारात्मक ऊर्जा मिलती है।
Q6. अर्गला स्तोत्र का गहरा आध्यात्मिक अर्थ क्या है?
“अर्गला” का अर्थ है बाधा हटाना। यह स्तोत्र जीवन के बंद द्वारों—जैसे भय, भ्रम, असफलता और नकारात्मकता—को दूर करने का प्रतीक है।
Q7. क्या केवल अर्गला स्तोत्र पढ़ना लाभदायक है?
हाँ, केवल अर्गला स्तोत्र का पाठ भी अत्यंत फलदायक माना जाता है। कई भक्त इसे स्वतंत्र रूप से भी पढ़ते हैं और माँ की कृपा प्राप्त करते हैं।
आपकी राय
क्या “रूपं देहि, जयं देहि, यशो देहि” मंत्र से जुड़ा आपका कोई विशेष अनुभव रहा है?
क्या आपको लगता है कि माँ की कृपा से जीवन की बाधाएँ सच में दूर होने लगती हैं?
अपने विचार, अनुभव और श्रद्धा नीचे कमेंट बॉक्स में हमारे साथ अवश्य साझा करें। आपकी बात किसी दूसरे भक्त के लिए भी प्रेरणा बन सकती है।
इसी के साथ विदा लेते हैं।
अगली रोचक, ज्ञानवर्धक और दिव्य जानकारी के साथ Vishvagyaan.online में फिर से मुलाकात होगी।

