श्रीकृष्ण ने अर्जुन को युद्ध के लिए क्यों कहा? जब अहिंसा भी धर्म है - गीता का गूढ़ रहस्य

VISHVA GYAAN

श्रीकृष्ण ने अर्जुन को युद्ध के लिए क्यों कहा?

जय श्री कृष्ण प्रिय पाठकों,

महाभारत का युद्ध केवल दो सेनाओं का टकराव नहीं था, बल्कि यह धर्म और अधर्म, कर्तव्य और मोह, करुणा और न्याय के बीच का संघर्ष था।


जब अर्जुन ने अपने ही स्वजनों को युद्धभूमि में देखा, तो उसका मन काँप उठा। धनुष हाथ से गिर गया, शरीर शिथिल हो गया और वह बोला –

मैं अपने ही लोगों को मारकर राज्य नहीं चाहता।”


यहीं से एक बहुत बड़ा प्रश्न जन्म लेता है –

जब अहिंसा भी धर्म है, तो श्रीकृष्ण ने अर्जुन को युद्ध करने के लिए क्यों कहा?

क्या भगवान हिंसा का समर्थन कर रहे थे?

या अहिंसा का अर्थ हम सही से समझ ही नहीं पाए?


इस लेख में हम भगवद्गीता, धर्मशास्त्र और जीवन-दर्शन के आधार पर इस प्रश्न का सरल, स्पष्ट और गूढ़ उत्तर खोजेंगे।


श्रीकृष्ण अर्जुन को युद्ध का उपदेश देते हुए – भगवद गीता
धर्म की रक्षा हेतु श्रीकृष्ण का अर्जुन को उपदेश


अहिंसा का सही अर्थ क्या है?

अधिकांश लोग अहिंसा को केवल इतना समझते हैं –

 किसी को मारना नहीं, चोट न पहुँचाना।

लेकिन हिंदू दर्शन में अहिंसा का अर्थ इससे कहीं गहरा है।


अहिंसा का शास्त्रीय अर्थ

  • किसी के अधर्म को बढ़ावा न देना
  • अन्याय को देखकर मौन न रहना
  • समाज को नष्ट होने से बचाना

यदि किसी अधर्मी को रोकने के लिए कठोर कदम आवश्यक हो जाए,

तो वह हिंसा नहीं, धर्मरक्षा होती है।

अधर्म को सहना भी हिंसा है।


अर्जुन की समस्या क्या थी?

अर्जुन महाभारत के युद्ध से इसलिए नहीं भागना चाहता था कि वह करुणावान था, बल्कि इसलिए कि वह मोहग्रस्त हो गया था

अर्जुन का मोह तब पूरी तरह टूटा जब उसने श्रीकृष्ण का विराट स्वरूप देखा…श्री कृष्ण का विराट स्वरूप: गीता का वह अध्याय जिसने अर्जुन को बदल दिया?


अर्जुन के तर्क:

  • सामने अपने गुरु, पितामह, भाई खड़े हैं
  • इन्हें मारकर राज्य का क्या लाभ?
  • कुलनाश होगा, समाज टूटेगा
  • पर श्रीकृष्ण ने अर्जुन के इस भाव को मोहजनित करुणा कहा।
  • मोह से उपजी करुणा धर्म नहीं होती।


श्रीकृष्ण का उत्तर: कर्तव्य सर्वोपरि है

श्रीकृष्ण ने अर्जुन को याद दिलाया कि वह कौन है।


अर्जुन का धर्म क्या था?

  • अर्जुन क्षत्रिय था
  • क्षत्रिय का धर्म है –
  • अन्याय के विरुद्ध खड़ा होना
  • समाज की रक्षा करना
  • अधर्म को रोकना

श्रीकृष्ण स्पष्ट कहते हैं:

स्वधर्मे निधनं श्रेयः, परधर्मो भयावहः”

(गीता 3.35)

अपने धर्म का पालन करते हुए मरना भी श्रेष्ठ है,

दूसरे का धर्म अपनाना विनाशकारी है।


क्या श्रीकृष्ण ने हिंसा सिखाई?

नहीं

श्रीकृष्ण ने निष्काम कर्म सिखाया।

गीता का मूल संदेश:

  • कर्म करो, फल की आस छोड़कर
  • अहंकार त्यागो
  • स्वयं को निमित्त मानो

अर्जुन से कहा गया –

  • तू मारने वाला नहीं है,
  • ये सब पहले ही मारे जा चुके हैं।
  • तू केवल माध्यम है।


अधर्म के विरुद्ध युद्ध: क्यों आवश्यक था?


महाभारत युद्ध से पहले कृष्ण ने हर संभव प्रयास किया –

  • शांति दूत बनकर गए
  • केवल 5 गाँव माँगे
  • युद्ध टालना चाहा

पर दुर्योधन बोला –

  • सुई की नोक जितनी भूमि भी नहीं दूँगा।
  • जब संवाद समाप्त हो जाए,
  • और अधर्म निरंतर बढ़ता जाए,
  • तो युद्ध अंतिम विकल्प बन जाता है।


अहिंसा और न्याय का संतुलन

यदि आज कोई अत्याचारी –

  • बच्चों को मार रहा हो
  • स्त्रियों का अपमान कर रहा हो
  • समाज को तोड़ रहा हो

और आप कहें –

  • मैं अहिंसक हूँ, मैं कुछ नहीं करूँगा
  • तो यह अहिंसा नहीं, कायरता है।

श्रीकृष्ण ने यही सिखाया –

अधर्म के सामने मौन भी पाप है।

यहीं से एक गहरा नैतिक प्रश्न जन्म लेता है -क्या धर्म के लिए अधर्म के साथ जाया जा सकता है? यही सबसे बड़ा नैतिक प्रश्न है कि जो अधिकतर लोगों के मन मे अक्सर आता है कि क्या धर्म की रक्षा के लिए अधर्म के साथ खड़ा हुआ जा सकता है?


श्रीकृष्ण स्वयं युद्ध में क्यों नहीं लड़े?

महाभारत के युद्ध में सबसे बहुत महत्वपूर्ण बात यही थी कि 

श्रीकृष्ण ने शस्त्र नहीं उठाए,

लेकिन सारथी बनकर धर्म का संचालन किया।

उन्होंने दिखाया –

शक्ति का प्रयोग आवश्यक है

पर अहंकार के बिना


अर्जुन का युद्ध: व्यक्तिगत नहीं, सामाजिक था

अर्जुन किसी निजी द्वेष से नहीं लड़ रहा था।

वह लड़ रहा था –

  • स्त्री सम्मान के लिए
  • न्याय के लिए
  • धर्मराज्य की स्थापना के लिए

यही कारण है कि युद्ध के बाद अर्जुन को कोई गर्व नहीं हुआ।


आज के जीवन में इसका क्या अर्थ है?

आज युद्ध तलवार से नहीं होते,आज युद्ध होते हैं –

  • अन्याय के विरुद्ध आवाज़ उठाने में
  • गलत के सामने “न” कहने में
  • सत्य के पक्ष में खड़े होने में

श्रीकृष्ण आज भी यही कहते हैं –

  • धर्म के पक्ष में खड़े हो जाओ,
  • मैं तुम्हारे साथ हूँ।


और पढ़े-महाभारत के योद्धा मरने के बाद एक रात के लिए क्यों जीवित हुए?

मित्रों ! महाभारत का युद्ध केवल मृत्यु का नहीं, बल्कि आत्मिक सत्य और चेतना का भी था। इसलिए मरने के बाद सभी योद्धा एक रात के लिए जीवित हुए 

निष्कर्ष

श्रीकृष्ण ने अर्जुन को युद्ध इसलिए नहीं सिखाया कि वे हिंसा चाहते थे, बल्कि इसलिए कि वे धर्म की रक्षा चाहते थे।

अहिंसा तब तक ही सुंदर है, जब तक वह अधर्म को बढ़ावा न दे।

जहाँ अन्याय सीमा लांघ जाए, वहाँ धर्म स्वयं शस्त्र उठाता है।

और वही युद्ध, भगवद्गीता बन जाता है।


FAQs


1. क्या भगवद्गीता हिंसा को सही ठहराती है?

नहीं। गीता अधर्म के विरुद्ध निष्काम कर्म सिखाती है, न कि हिंसा।


2. अहिंसा और युद्ध एक साथ कैसे हो सकते हैं?

जब युद्ध व्यक्तिगत स्वार्थ से नहीं, बल्कि समाज की रक्षा के लिए हो।


3. क्या अर्जुन का युद्ध करना पाप था?

नहीं। वह अपने स्वधर्म का पालन कर रहा था।


4. क्या आज भी गीता का यह संदेश लागू होता है?

हाँ। आज भी अन्याय के विरुद्ध खड़ा होना ही धर्म है।


5. श्रीकृष्ण ने युद्ध से पहले शांति क्यों चाही?

क्योंकि युद्ध अंतिम विकल्प है, पहला नहीं।


तो प्रिय पाठकों, कैसी लगी आपको पोस्ट ,हम आशा करते हैं कि आपकों पोस्ट पसंद आयी होगी। इसी के साथ विदा लेते हैं अगली रोचक, ज्ञानवर्धक जानकारी के साथ विश्वज्ञान मे फिर से मुलाकात होगी ,तब तक के लिय आप अपना ख्याल रखे, हंसते रहिए, मुस्कराते रहिए और औरों को भी खुशियाँ बांटते रहिए।

धन्यवाद ,हर हर महादेव 🙏

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