सन्तान के मोह से विपत्ति: पुत्र पाने की चाह ने कैसे उजाड़ दिया पूरा परिवार? जानिए आत्मदेव की कथा

VISHVA GYAAN
जिस पुत्र के लिए आत्मदेव ने इतना दुःख सहा, वही पुत्र आगे चलकर उनके पूरे परिवार के विनाश का कारण बन गया! आखिर ऐसा क्यों हुआ?

आत्मदेव को पुत्र प्राप्ति के बाद भी दुःख क्यों मिला?

संक्षिप्त उत्तर: 

कथा के अनुसार, आत्मदेव को पुत्र की अत्यधिक इच्छा थी, जबकि महात्मा ने उन्हें समझाया था कि उनके प्रारब्ध में पुत्र-सुख नहीं है। पुत्र-मोह में उन्होंने चेतावनी की अनदेखी की, जिसके बाद परिवार को अनेक विपत्तियों का सामना करना पड़ा।


हर-हर महादेव! प्रिय पाठकों🙏

क्या संतान की इच्छा हमेशा सुख ही देती है? या कभी-कभी सन्तान का अत्यधिक मोह मनुष्य के जीवन में बड़ी विपत्ति का कारण भी बन सकता है?

आज की यह कथा इसी गहरी सीख से जुड़ी है। यह कथा है आत्मदेव नामक एक ब्राह्मण की, जो संतान न होने के कारण अत्यंत दुखी थे। उन्होंने पुत्र प्राप्ति के लिए दान-पुण्य किया, प्रयास किए और अंततः वन में जाकर एक महात्मा से पुत्र प्राप्ति का उपाय पूछा।

महात्मा ने उन्हें समझाया कि उनके प्रारब्ध में सात जन्मों तक पुत्र-सुख नहीं है और उन्हें पुत्र-मोह छोड़कर भगवान् की भक्ति करनी चाहिए। लेकिन आत्मदेव पुत्र पाने की इच्छा में इतने व्याकुल थे कि उन्होंने महात्मा की बात नहीं मानी।

इसके बाद उनके जीवन में जो घटनाएँ हुईं, उन्होंने यह दिखा दिया कि हर इच्छा की पूर्ति सुख का कारण नहीं होती।

आइए जानते हैं आत्मदेव, धुन्धुली, धुन्धकारी और गोकर्ण से जुड़ी यह रोचक कथा और समझते हैं कि अत्यधिक सन्तान-मोह मनुष्य को किस प्रकार विपत्ति में डाल सकता है।


जिस पुत्र के लिए तरसे, वही बना विपत्ति का कारण

santaan -moh -se -vipatti (a real story )सन्तान के मोह से विपत्ति
गोकर्ण 

किसी समय तुंगभद्रा नदी के किनारे एक उत्तम नगर था। वहाँ आत्मदेव नाम के एक सदाचारी, कर्मनिष्ठ ब्राह्मण रहते थे। उनकी पत्नी का नाम था धुन्धुली। वह सुन्दर थी, सत्कुलोत्पन्न थी, घर का कार्य करने में निपुण थी, किन्तु बहुत बोलने वाली, कृपण, कलहप्रिय और दूसरों के झगड़ों में आनन्द लेने वाली थी। 


आत्मदेव अपनी पत्नी के साथ सन्तुष्ट थे, किन्तु उन्हें इस बात का बड़ा दुःख था कि उनके कोई सन्तान नहीं है। उन्होंने दान-पुण्य में अपनी सम्पत्ति का आधा भाग व्यय भी किया, किन्तु कोई सन्तति नहीं हुई। 


अन्त में दुःखी होकर उन्होंने देह त्याग का निश्चय कर लिया और एक दिन चुपचाप वन में चले गये। वन में प्यास लगने पर एक सरोवर से जल पीकर स्थिर बैठे देख ब्राह्मण आत्मदेव उनके समीप पहुँचे और उनके चरणों पर सिर रखकर फूट-फूटकर रोने लगे। संन्यासी महात्मा के पूछने पर आत्मदेव ने अपने कष्ट की बात बतलायी और पुत्र प्राप्ति का उपाय पूछा।


दैवज्ञ संन्यासी ने योगबल से उनकी भाग्य- रेखा देखकर बताया- तुम्हारे प्रारब्ध में सात जन्मों तक पुत्र नहीं है। पुत्र प्राप्ति के मोह को छोड़ दो! यह मोह अज्ञान से ही है। देखो! महाराज सगर और राजा अंग को भी अत्यन्त दुःख भोगना पड़ा है। 


सूख तो पुत्र के कारण मोह को छोड़कर भगवान् का भजन करने में ही है।' परन्तु ब्राह्मण तो सन्तान की इच्छा से मोहान्ध हो रहे थे। उन्होंने कहा- ‘यदि आपने पुत्र-प्राप्ति का उपाय न बताया तो मैं यहीं आपके सामने ही प्राण त्याग दूंगा।' 


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अन्त में विवश होकर महात्मा ने ब्राह्मण को एक फल देकर कहा- 'क्या किया जाय, तुम्हारा दुराग्रह बलवान किन्तु पुत्र से तुम्हें सुख नहीं होगा। क्योंकि प्रारब्ध के विपरीत हठ करने से कष्ट ही मिलता है। अच्छा, यह फल ले जाकर अपनी पत्नी को खिला दो, इससे उसे पुत्र होगा। 


तुम्हारी पत्नी एक वर्ष तक सत्य बोले, पवित्रतापूर्वक रहे, जीवों पर दया करे, दीनों को दान दे और केवल एक समय भोजन करे तो पुत्र धार्मिक उत्पन्न होगा।' महात्मा तो फल देकर चले गये और ब्राह्मण ने घर आकर फल अपनी पत्नी को दे दिया। परन्तु आत्मदेव की देवीजी भी अद्भुत ही थीं।


उन्होंने वह फल खाया नहीं, उल्टे अपनी सखी के सामने रोने लगीं-'सखी! यदि मैं फल खा लूँ तो मैं गर्भवती हो जाऊँगी, उससे मेरा पेट बढ़ जाएगा, भूख कम हो जायगी, मैं दुर्बल हो जाऊँगी, फिर घर का कार्य कैसे होगा? 


कदाचित् गाँव में डाकू आ गये तो गर्भिणी नारी कैसे भाग सकेगी? कहीं गर्भस्थ शिशु टेड़ा हो गया तो मेरी मृत्यु ही हो जाएगी। प्रसव में भी सुना है महान् कष्ट होता है, मैं सुकुमारी उसे कैसे सहन कर सकूँगी। मेरे असमर्थ होने पर मेरी ननद मेरा सर्वस्व चुरा लेगी। सत्य, शौचादि नियमों का पालन भी मेरे लिए अशक्य ही है। 


पुत्र के लालन-पालन में भी स्त्री को बड़ा दुःख होता है। मेरी समझ से तो वन्ध्या या विधवा स्त्री ही सुखी है।' इस प्रकार कुतर्क करके ब्राह्मण-पत्नी ने फल नहीं खाया।  कुछ दिनों बाद ब्राह्मण-पत्नी की छोटी बहिन उसके पास आयी, ब्राह्मणी ने सब बातें उसे बताकर कहा- 'बहिन! ऐसी दशा में मैं क्या करूँ। 


उसकी बहिन ने कहा- 'चिन्ता मत करो। मैं गर्भवती हूँ, बच्चा होने पर उसे तुम्हें दे दूंगी। तुम मेरे पति को धन दे देना, इससे वह तुम्हें बालक दे देंगे। तब तक तुम गर्भवती के समान घर में गुप्त रूप से रहो।


लोगों में प्रसिद्ध कर दूंगी कि छ: महीने का होकर मेरा पुत्र मर गया। तुम्हारे घर प्रतिदिन आकर मैं तुम्हारे पुत्र का लालन-पोषण करूंगी। यह फल तो परीक्षा के लिये गाय को दे दो।' 


ब्राह्मण-पत्नी ने फल तो गाय को दे दिया और पति से कह दिया- 'मैंने फल खा लिया।' समय पर उसकी बहिन को पुत्र हुआ। गुप्त रूप से उस बहिन के पति ने बालक लाकर ब्राह्मण-पत्नी को दे दिया। 


ब्राह्मणी ने पति को बताया- बड़ी सरलता से पुत्र हो गया।' ब्राह्मण के आनन्द का क्या ठिकाना? बड़ी धूमधाम से पुत्रोत्सव मनाया जाने लगा। ब्राह्मण ने उस बालक का नाम माता के नाम पर धुन्धकारी रक्खा।


कुछ दिनों के बाद गाय ने भी एक मानव-शिशु को जन्म दिया। लोगों को इससे बड़ा कुतुहल हुआ। यह बालक बहुत ही सुन्दर, तेजस्वी था, किन्तु उसके कान गाय के समान थे। 


ब्राह्मण ने उस बालक के भी संस्कार कराये और उसका नाम गोकर्ण रक्खा। बड़े होकर बालक गोकर्ण तो विनम्र, सदाचारी, विद्वान् और धार्मिक हुए, किन्तु धुन्धकारी महान् दुष्ट हुआ।


वह स्नान तथा दूसरी पवित्रता की क्रियाओं से दूर ही रहता था, अखाद्य पदार्थ उसे प्रिय थे, अत्यन्त क्रोधी था, बायें हाथ से भोजन करता था, चोर था, सबसे अकारण द्वेष रखता था, छोटे बच्चों को उठाकर कुएँ में फेंक देता था, हत्यारा था, हाथ में सदा शस्त्र रखता था, दीनों और अंधों को सदा पीड़ा देता रहता था, चाण्डालों के साथ हाथ रस्सी और साथ में कुत्ते लिये घूमा करता था।



वेश्यागामी बनकर उसने सब पैतृक सम्पत्ति नष्ट कर दी और माता-पिता को पीटकर घर के बर्तन भी बेचने को ले जाने लगा। अब आत्मदेव को पुत्र के उत्पात का दुःख असह्य हो गया। वे दुःखी होकर आत्मघात करने को उद्यत हो गये। 


परन्तु गोकर्ण ने उन्हें समझाया कि ‘यह संसार ही असार है। यहाँ सुख है नहीं। सुख तो भगवान् का भजन करने में ही है।' गोकर्ण के उपदेश को स्वीकार करके आत्मदेव वन में चले गये। वहाँ भगवद् भक्ति में मन लगाया, इससे अन्त में उन्हें भगवल्लोक की प्राप्ति हुई। 


इधर घर में धुन्धकारी ने माता को नित्य पीटना प्रारम्भ किया कि 'धन कहाँ छिपाकर रक्खा है, बता!' इस नित्य की मार से व्याकुल होकर ब्राह्मणी ने कुएँ में कूदकर आत्मघात कर लिया।


स्वभाव से विरक्त गोकर्ण तीर्थयात्रा करने चले गये। अब तो धुन्धकारी को स्वतन्त्रता हो गयी। पाँच वेश्याएँ उसने घर में ही टिका लीं। चोरी, डकैती, जुआ आदि से उनका पोषण करने लगा। एक बार अपने कुकर्मों से धुन्धकारी ने बहुत-सा धन एकत्र कर लिया। 


धनारशि देखकर वेश्याओं के मन में लोभ आया। उन्होंने परस्पर सलाह करके एक रात में सोते हुए धुन्धकारी को रस्सियों से बाँध दिया और उसके मुख पर जलते अंगार रखकर उसे मार डाला। फिर उसका शव गड्ढा खोदकर गाड़ दिया और सब धन लेकर वे चली गयीं। 


मरकर धुन्धकारी प्रेत हुआ। तीर्थयात्रा करके जब गोकर्ण लौटे और रात्रि में अपने घर में सोये, तब नाना वेशों में प्रेत बना धुन्धकारी उन्हें डराने का प्रयत्न करने लगा। 


गोकर्ण की कृपा से वह बोलने में समर्थ हुआ, उसके मुख से उसकी दुर्गति का वृत्त जानकर गोकर्ण ने उसे इस दुर्दशा से मुक्त करने का वचन दिया और अन्त में श्रीमद्भागवत का सप्ताह सुनाकर उसे प्रेतत्त्व से मुक्त किया।


FAQs

1. आत्मदेव को पुत्र की इच्छा क्यों थी?

आत्मदेव संतानहीन होने के कारण अत्यंत दुखी थे और पुत्र प्राप्ति की तीव्र इच्छा रखते थे।


2. महात्मा ने आत्मदेव को क्या बताया था?

उन्होंने बताया कि आत्मदेव के प्रारब्ध में सात जन्मों तक पुत्र-सुख नहीं है और उन्हें पुत्र-मोह छोड़कर भगवान् की भक्ति करनी चाहिए।


3. धुन्धकारी कैसा व्यक्ति बना?

कथा के अनुसार, धुन्धकारी अत्यंत दुष्ट और अनाचारी बन गया। उसने धन नष्ट किया और अपने माता-पिता को भी कष्ट दिया।


4. गोकर्ण और धुन्धकारी में क्या अंतर था?

गोकर्ण सदाचारी, विद्वान और धार्मिक थे, जबकि धुन्धकारी का जीवन दुष्कर्मों से भर गया था।


5. धुन्धकारी की मृत्यु कैसे हुई?

कथा के अनुसार, जिन वेश्याओं के लिए वह धन जुटाता था, उन्होंने धन के लोभ में उसे बाँधकर मार डाला।


6. धुन्धकारी का उद्धार कैसे हुआ?

गोकर्ण ने उसके कल्याण के लिए श्रीमद्भागवत सप्ताह का आयोजन किया, जिसके प्रभाव से कथा के अनुसार धुन्धकारी प्रेतयोनि से मुक्त हुआ।


प्रिय पाठकों! 

इस कथा का उद्देश्य सन्तान को दोष देना नहीं, बल्कि यह समझाना है कि किसी भी इच्छा का अत्यधिक मोह मनुष्य को विवेक से दूर कर सकता है।


आत्मदेव की सबसे बड़ी भूल यह थी कि उन्होंने अपनी इच्छा को ही जीवन का सबसे बड़ा सुख मान लिया। जबकि महात्मा उन्हें पहले ही समझा चुके थे कि प्रारब्ध के विपरीत हठ करने से सुख के बजाय दुःख मिल सकता है।


वहीं गोकर्ण का चरित्र हमें बताता है कि विपरीत परिस्थितियों में भी ज्ञान, भक्ति और सदाचार मनुष्य को सही मार्ग दिखा सकते हैं।


इसलिए संतान से प्रेम अवश्य करें, लेकिन सन्तान-मोह में अपना विवेक न खोएँ। बच्चों को केवल सुख-सुविधाएँ देना ही पर्याप्त नहीं, बल्कि अच्छे संस्कार और सही मार्गदर्शन देना भी माता-पिता का महत्वपूर्ण दायित्व है।


राधे-राधे 🙏
हर हर महादेव 🙏


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