देवउठनी एकादशी के बाद शादी-विवाह क्यों शुरू होते हैं?
धार्मिक मान्यता के अनुसार चातुर्मास के दौरान भगवान विष्णु योगनिद्रा में रहते हैं और इस अवधि में विवाह जैसे मांगलिक कार्य नहीं किए जाते। देवउठनी एकादशी पर भगवान विष्णु के जागने के बाद मांगलिक कार्यों का शुभारंभ माना जाता है।
हर हर महादेव 🙏
हमारे हिंदू धर्म में वर्षभर अनेक पर्व और व्रत आते हैं, लेकिन कुछ पर्व ऐसे होते हैं जिनका संबंध केवल पूजा-पाठ से ही नहीं, बल्कि हमारे सामाजिक और पारिवारिक जीवन से भी जुड़ा हुआ है।
इन्हीं में से एक है देवउठनी एकादशी।
आपने अक्सर देखा होगा कि देवउठनी एकादशी के आसपास लोग यह पूछना शुरू कर देते हैं कि अब शादी-विवाह का शुभ समय कब से शुरू होगा?
आखिर ऐसा क्यों है?
क्या केवल भगवान विष्णु के जागने की मान्यता के कारण विवाह जैसे मांगलिक कार्य फिर से शुरू किए जाते हैं, या इसके पीछे चातुर्मास से जुड़ी कोई धार्मिक परंपरा भी है?
आइए इन सभी प्रश्नो के उत्तरों को ध्यान से समझते हैं।
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| देवउठनी एकादशी के बाद शादी-विवाह शुरू होने की धार्मिक मान्यता |
देवउठनी एकादशी क्या है?
देवउठनी एकादशी को प्रबोधिनी एकादशी या हरिबोधिनी एकादशी भी कहा जाता है।
हिंदू धार्मिक परंपरा में मान्यता है कि आषाढ़ शुक्ल एकादशी, जिसे देवशयनी एकादशी कहा जाता है, से भगवान विष्णु योगनिद्रा में चले जाते हैं। इसके बाद चातुर्मास की अवधि मानी जाती है।
इस अवधि में विवाह सहित कई मांगलिक कार्यों को रोकने की परंपरा रही है।
जब कार्तिक शुक्ल एकादशी आती है तो इसे देवउठनी एकादशी कहा जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार इसी दिन भगवान विष्णु योगनिद्रा से जागते हैं।
इसी कारण इसे देवताओं के जागने का पर्व भी माना जाता है।
भगवान विष्णु के जागने के बाद विवाह क्यों शुरू होते हैं?
इसके पीछे चातुर्मास से जुड़ी धार्मिक मान्यता है।
चातुर्मास के दौरान भगवान विष्णु के योगनिद्रा में रहने की मान्यता के कारण विवाह और अन्य बड़े मांगलिक संस्कारों को स्थगित रखने की परंपरा रही है।
देवउठनी एकादशी पर भगवान विष्णु के जागने के बाद शुभ कार्यों का समय फिर से शुरू होने की धार्मिक मान्यता है।
इसलिए इस दिन के बाद विवाह के लिए शुभ मुहूर्त देखे जाने लगते हैं।
हालांकि इसका अर्थ यह नहीं है कि देवउठनी एकादशी के अगले ही दिन हर जगह विवाह होना आवश्यक है।
विवाह के लिए अलग-अलग तिथियों और स्थानीय पंचांग के अनुसार शुभ मुहूर्त देखे जाते हैं।
तुलसी विवाह का इससे क्या संबंध है?
देवउठनी एकादशी के बाद तुलसी विवाह की परंपरा भी विशेष रूप से प्रसिद्ध है।
तुलसी विवाह में भगवान विष्णु के स्वरूप शालिग्राम जी और माता तुलसी का विवाह कराया जाता है।
इसे भगवान विष्णु के जागरण और मांगलिक कार्यों के पुनः आरंभ से जोड़कर देखा जाता है।
इसीलिए बहुत से परिवारों में तुलसी विवाह के बाद विवाह आदि मांगलिक कार्यों के लिए विशेष उत्साह दिखाई देता है।
अगर आप तुलसी विवाह की पूरी पूजा विधि और इससे जुड़ी धार्मिक मान्यताओं को जानना चाहते हैं, तो हमारे इस लेख को भी पढ़ सकते हैं: तुलसी विवाह से जुड़े 50 सवालों के जवाब: तुलसी विवाह, पूजा, मंत्र और धार्मिक महत्व
क्या चातुर्मास में बिल्कुल कोई शुभ कार्य नहीं होता?
नहीं ऐसा बिल्कुल भी नहीं है कि ,
चातुर्मास के दौरान सभी प्रकार के धार्मिक कार्य बंद हो जाते हैं,
इस अवधि में पूजा, व्रत, जप, दान, कथा और भक्ति से जुड़े अनेक धार्मिक कार्य किए जाते हैं।
मुख्य रूप से विवाह, गृहप्रवेश जैसे कुछ मांगलिक संस्कारों को रोकने की परंपरा कई हिंदू परिवारों में रही है।
देवउठनी एकादशी के बाद कौन-कौन से काम शुरू होते हैं?
देवउठनी एकादशी के बाद परंपरागत रूप से विवाह, गृहप्रवेश और अन्य मांगलिक संस्कारों के लिए शुभ मुहूर्त देखे जाते हैं।
इसी वजह से देवउठनी एकादशी के बाद का समय कई परिवारों के लिए विशेष महत्व रखता है।
हालांकि किसी भी मांगलिक कार्य की तारीख तय करते समय अपने क्षेत्र और परिवार की परंपरा के अनुसार पंचांग तथा शुभ मुहूर्त देखना उचित रहता है।
देवउठनी एकादशी को भगवान विष्णु की पूजा क्यों की जाती है?
इस दिन भगवान विष्णु की विशेष पूजा की जाती है।
कई स्थानों पर भगवान विष्णु के शालिग्राम स्वरूप और माता तुलसी की पूजा भी की जाती है।
भक्त भगवान विष्णु से परिवार में सुख-शांति, समृद्धि और मंगल की प्रार्थना करते हैं।
इस दिन का महत्व केवल विवाह के मौसम की शुरुआत तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भगवान विष्णु की भक्ति और धार्मिक जागरण का भी महत्वपूर्ण पर्व है।
एक छोटी-सी बात
हमारे त्योहारों में केवल तिथि जानना ही महत्वपूर्ण नहीं है। उनके पीछे छिपी धार्मिक परंपरा को समझना भी उतना ही सुंदर है।
देवउठनी एकादशी हमें भगवान विष्णु के जागने की मान्यता के साथ यह भी याद दिलाती है कि हिंदू धर्म में समय, ऋतु, व्रत और संस्कारों का आपस में गहरा संबंध रहा है।
इसीलिए देवउठनी एकादशी के बाद जब विवाह और दूसरे मांगलिक कार्यों की शुरुआत होती है तो उसके पीछे केवल एक तारीख नहीं, बल्कि चातुर्मास से जुड़ी पूरी धार्मिक परंपरा होती है।
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FAQs
1. देवउठनी एकादशी 2026 कब है?
देवउठनी एकादशी 2026 में कार्तिक शुक्ल एकादशी के दिन मनाई जाएगी। इस दिन भगवान विष्णु के योगनिद्रा से जागने की धार्मिक मान्यता है।
2. देवउठनी एकादशी के बाद शादी-विवाह क्यों शुरू होते हैं?
धार्मिक मान्यता के अनुसार चातुर्मास में भगवान विष्णु योगनिद्रा में रहते हैं, इसलिए विवाह जैसे मांगलिक कार्यों की परंपरागत रूप से शुरुआत नहीं की जाती। देवउठनी एकादशी पर भगवान विष्णु के जागने के बाद विवाह के शुभ मुहूर्त देखे जाते हैं।
3. क्या देवउठनी एकादशी के अगले दिन से शादी शुरू हो जाती है?
जरूरी नहीं। देवउठनी एकादशी के बाद विवाह के लिए शुभ मुहूर्त उपलब्ध होते हैं, लेकिन वास्तविक विवाह की तारीख पंचांग में दिए गए शुभ मुहूर्त के अनुसार तय की जाती है।
4. देवउठनी एकादशी और तुलसी विवाह में क्या संबंध है?
तुलसी विवाह की परंपरा भगवान विष्णु के जागरण से जुड़ी मानी जाती है। इसी कारण देवउठनी एकादशी के आसपास तुलसी विवाह का विशेष महत्व होता है और इसके बाद मांगलिक कार्यों की शुरुआत की परंपरा है।
5. चातुर्मास में शादी क्यों नहीं की जाती?
धार्मिक परंपरा के अनुसार चातुर्मास भगवान विष्णु के योगनिद्रा में रहने का समय माना जाता है। इसलिए इस अवधि में विवाह जैसे बड़े मांगलिक संस्कारों को स्थगित रखने की परंपरा रही है।
6. क्या चातुर्मास में पूजा-पाठ करना बंद रहता है?
नहीं। चातुर्मास में पूजा, व्रत, जप, दान और कथा जैसे धार्मिक कार्य किए जाते हैं। मुख्य रूप से विवाह जैसे कुछ मांगलिक संस्कारों को रोकने की परंपरा रही है।
7. देवउठनी एकादशी के बाद कौन-कौन से शुभ कार्य किए जाते हैं?
परंपरागत रूप से देवउठनी एकादशी के बाद विवाह, गृहप्रवेश और अन्य मांगलिक संस्कारों के लिए शुभ मुहूर्त देखे जाते हैं।
8. देवउठनी एकादशी को भगवान विष्णु की पूजा क्यों की जाती है?
मान्यता है कि इस दिन भगवान विष्णु योगनिद्रा से जागते हैं। इसलिए भक्त उनकी पूजा करके सुख, शांति और मंगल की प्रार्थना करते हैं।
हर हर महादेव🙏

