मानव शरीर में आत्मा या प्राणशक्ति कैसे प्रवेश करती है? गरुड़ पुराण क्या कहता है? (भाग–2)

VISHVA GYAAN

पिछले भाग में हमने जाना कि-

 गरुड़ पुराण के अनुसार गर्भधारण के समय आत्मा किस प्रकार माता-पिता के सूक्ष्म स्पंदनों की ओर आकर्षित होती है और भ्रूण के विकास से उसका क्या संबंध माना गया है।


अब आगे हम जानेंगे कि-

योगशास्त्र में वर्णित चक्र क्या हैं, ब्रह्मरंध्र का क्या महत्व है और आत्मा शरीर में किस मार्ग से प्रवेश करती है।


गरुड़ पुराण और योगिक परंपराओं के अनुसार ब्रह्मरंध्र, सात चक्र और गर्भस्थ शिशु में आत्मा के प्रवेश का सांकेतिक चित्रण।
योगिक परंपराओं के अनुसार ब्रह्मरंध्र, सात चक्र और गर्भस्थ शिशु में आत्मा के प्रवेश का सांकेतिक आध्यात्मिक चित्रण।

योगिक विज्ञान के अनुसार चक्रों का निर्माण कैसे होता है?

योगशास्त्र के अनुसार -

मनुष्य केवल एक भौतिक शरीर नहीं है, बल्कि उसके भीतर एक सूक्ष्म ऊर्जा तंत्र भी कार्य करता है। जैसे-जैसे भ्रूण का विकास होता है, वैसे-वैसे इस सूक्ष्म ऊर्जा तंत्र का भी निर्माण प्रारंभ हो जाता है।


ऐसा माना जाता है कि-

प्राणशक्ति के प्रवाह के लिए शरीर में अनेक सूक्ष्म ऊर्जा मार्ग (नाड़ियाँ) बनते हैं। जहाँ कई नाड़ियाँ एक स्थान पर मिलती हैं, वहाँ एक विशेष ऊर्जा केंद्र का निर्माण होता है, जिसे चक्र कहा जाता है।


हालाँकि शरीर में अनेक चक्रों का वर्णन मिलता है, लेकिन योगशास्त्र में सात प्रमुख चक्रों को सबसे अधिक महत्व दिया गया है।


जो कि इस प्रकार हैं-

  • मूलाधार चक्र
  • स्वाधिष्ठान चक्र
  • मणिपूर चक्र
  • अनाहत चक्र
  • विशुद्धि चक्र
  • आज्ञा चक्र
  • सहस्रार चक्र

योगिक परंपरा के अनुसार -

यही चक्र शरीर, मन और चेतना के बीच संतुलन स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।


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ब्रह्मरंध्र क्या है और आत्मा इसी मार्ग से क्यों प्रवेश करती है?

योगिक मान्यताओं के अनुसार जब भ्रूण का सिर पूर्ण रूप से विकसित होने लगता है, तब उसके शीर्ष भाग में एक अत्यंत सूक्ष्म ऊर्जा द्वार का निर्माण होता है, जिसे ब्रह्मरंध्र कहा जाता है।


'रंध्र' संस्कृत का शब्द है, जिसका अर्थ है - मार्ग, छिद्र या प्रवेश द्वार


आध्यात्मिक परंपराओं में माना जाता है कि -

जब यह ब्रह्मरंध्र पूर्ण रूप से विकसित हो जाता है, तभी आत्मा इसी मार्ग से भ्रूण में प्रवेश करती है।


कुछ योगिक मतों के अनुसार -

यह अवस्था गर्भधारण के लगभग तीसरे महीने के आसपास मानी गई है। हालाँकि यह आध्यात्मिक मान्यता है, आधुनिक चिकित्सा विज्ञान आत्मा के प्रवेश की किसी प्रक्रिया को स्वीकार नहीं करता।


आत्मा गर्भ में तीन महीने से पहले प्रवेश क्यों नहीं करती?

यह प्रश्न स्वाभाविक रूप से हर व्यक्ति के मन में आता है कि यदि आत्मा को शरीर में आना ही है, तो वह गर्भधारण के तुरंत बाद ही क्यों नहीं आती?


योगिक दृष्टिकोण के अनुसार-

प्रारंभिक महीनों में भ्रूण का शरीर अभी पूर्ण रूप से विकसित नहीं होता। विशेष रूप से सिर और ब्रह्मरंध्र का निर्माण शेष रहता है।


ऐसी मान्यता है कि -

जब तक शरीर आत्मा को धारण करने योग्य नहीं बन जाता, तब तक आत्मा गर्भ के आसपास सूक्ष्म रूप में रहती है। जैसे ही ब्रह्मरंध्र का निर्माण पूर्ण होता है, आत्मा उसी मार्ग से शरीर में प्रवेश करती है।


यह विचार योगिक और आध्यात्मिक परंपराओं पर आधारित है तथा इसे आधुनिक विज्ञान का निष्कर्ष नहीं माना जाता।

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आत्मा का निवास हृदय में क्यों माना गया है?

भारतीय आध्यात्मिक ग्रंथों में हृदय को केवल रक्त पंप करने वाला अंग नहीं माना गया है, बल्कि उसे चेतना का प्रमुख केंद्र भी कहा गया है।


कई उपनिषदों और योगिक परंपराओं के अनुसार -

आत्मा का निवास हृदय में माना जाता है। यहीं से प्राणशक्ति पूरे शरीर में प्रवाहित होती है और सभी चक्रों तथा सूक्ष्म ऊर्जा मार्गों तक पहुँचती है।


इसी कारण-

ध्यान, भक्ति और साधना में हृदय को अत्यंत पवित्र स्थान माना गया है। ऐसा विश्वास है कि जब साधक का मन शुद्ध होता है, तब वह अपने भीतर स्थित उसी दिव्य चेतना का अनुभव कर सकता है।


नवजात शिशु के सिर का मुलायम भाग (ब्रह्मरंध्र) क्या दर्शाता है?

यदि आपने किसी नवजात शिशु को ध्यान से देखा हो, तो उसके सिर के ऊपरी भाग में एक स्थान कुछ समय तक मुलायम रहता है। आधुनिक चिकित्सा विज्ञान इसे Fontanelle (फॉन्टानेल) कहता है, जो समय के साथ धीरे-धीरे हड्डी से भर जाता है।


योगिक परंपरा-

इसी स्थान को ब्रह्मरंध्र से जोड़कर देखती है। ऐसी मान्यता है कि यही वह मार्ग है जिससे आत्मा ने शरीर में प्रवेश किया था।

इसी कारण प्राचीन भारत में नवजात शिशु के सिर के इस भाग की विशेष सुरक्षा की जाती थी। यद्यपि आधुनिक चिकित्सा इसके पीछे शारीरिक और जैविक कारण बताती है, वहीं आध्यात्मिक परंपराएँ इसे चेतना के प्रवेश द्वार के रूप में देखती हैं।

जानिए- क्या सचमुच कोई अदृश्य शक्ति है?


अगले भाग में हम जानेंगे-

  • क्या आत्मा शरीर छोड़ भी सकती है?
  • स्वस्थ भ्रूण के बावजूद मृत शिशु का जन्म क्यों होता है? (आध्यात्मिक दृष्टिकोण)
  • गर्भवती महिला के वातावरण को शास्त्रों में इतना महत्व क्यों दिया गया?
  • शरीर के 114 चक्रों का रहस्य
  • आत्मा के तीन रूप कौन-कौन से हैं?
  • निष्कर्ष और महत्वपूर्ण FAQs

अंत में -

यदि यह जानकारी आपको उपयोगी लगी हो, तो इस लेख का तीसरा और अंतिम भाग अवश्य पढ़ें, जहाँ हम जानेंगे कि गर्भवती महिला के लिए सकारात्मक वातावरण को इतना महत्व क्यों दिया गया है, शरीर के 114 चक्रों का रहस्य क्या है, आत्मा के तीन रूप कौन-कौन से हैं और इस विषय से हमें क्या सीख मिलती है।

धन्यवाद, हर हर महादेव 🙏

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