प्रेम क्या है - और क्या नहीं है
(एक सरल समझ, आज की पीढ़ी के लिए)
कैसे है आप लोग आशा करते हैं कि आप स्वस्थ होंगे व प्रसन्नचित्त होंगे।
मित्रों,
आज के समय में “प्रेम” शब्द बहुत सुना जाता है, पर अनुभव अक्सर कुछ और होता है।
कभी हम प्रतीक्षा को प्रेम समझ लेते हैं, कभी अधिकार को, कभी डर को। कभी आकर्षण को प्रेम समझ लिया जाता है, कभी ध्यान को अपनापन, तो कभी निर्भरता को गहराई, और कभी नियंत्रण को परवाह।
जो मैं महसूस कर रहा हूँ, वह सच में प्रेम है या केवल मोह?
प्रेम और मोह के बीच का अंतर बहुत सूक्ष्म है, पर जीवन पर उसका प्रभाव अत्यंत गहरा होता है।
बस एक बात याद रखिए--
जहाँ डर ज़्यादा और स्वतंत्रता कम हो - वहाँ प्रेम कम, मोह ज़्यादा होता है।
यह लेख उसी अंतर को सरल, सहज और जीवन से जुड़े उदाहरणों के माध्यम से समझाने का एक विनम्र प्रयास है। तो चलिए सबसे पहले समझते हैं -
मोह क्या है?
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| जहाँ पकड़ नहीं, स्वीकार है — वहीं प्रेम का वास्तविक स्वरूप प्रकट होता है। |
️मोह: पकड़ की भावना
मोह में जुड़ाव तो होता है, पर उसके साथ असुरक्षा भी चलती है।
मोह हमें व्यक्ति से नहीं, उस व्यक्ति से मिलने वाली भावना से बाँधता है।
बार-बार आश्वासन की ज़रूरत
मन बार-बार पुष्टि चाहता है — “तुम सच में मेरे हो न?”, “सब ठीक है न?”
कुछ देर सुकून मिलता है, फिर वही बेचैनी लौट आती है।
यह बताता है कि भरोसा भीतर स्थिर नहीं है, इसलिए बाहर से सहारा ढूँढा जा रहा है।
खोने का डर
खुशी भी पूरी तरह जी नहीं पाते, क्योंकि भीतर कहीं डर चलता रहता है - “अगर यह चला गया तो?”
यह डर वर्तमान को भारी बना देता है।
वैसा न हो तो चिड़चिड़ापन
जब सामने वाला हमारी उम्मीद के अनुसार व्यवहार नहीं करता, तो खीझ पैदा होती है।
यह संकेत है कि स्वीकार कम और नियंत्रण की इच्छा ज़्यादा है।
“मेरे हिसाब से” की अपेक्षा
हम चाहते हैं कि सामने वाला हमारे अनुसार सोचे, चुने और जीए।
पर जहाँ दबाव है, वहाँ सहजता नहीं रहती।
कभी-कभी अधिकार और निर्भरता को प्रेम का नाम दे दिया जाता है। इस भावनात्मक भ्रम को समझने के लिए पढ़ें - तुम मेरी आत्मा हो" कहकर भ्रम में रखने का सच।
ध्यान कम मिले तो बेचैनी
इसका अर्थ है कि भावनात्मक संतुलन भीतर से नहीं, संबंध से संचालित हो रहा है।
संक्षेप में:
मोह का सूत्र है — भीतर असुरक्षा, बाहर पकड़।
प्रेम: स्वीकार की अवस्था
- प्रेम पकड़ता नहीं, स्वीकारता है।
- प्रेम में निकटता है, पर जकड़न नहीं;
- अपनापन है, पर स्वामित्व नहीं।
प्रेम की पहचान ऐसे समझें:
जैसा है, वैसा स्वीकार
- प्रेम व्यक्ति को बदलने की परियोजना नहीं बनाता।
- वह उसकी प्रकृति, सीमाएँ और यात्रा सहित उसे देखता है।
- यहाँ समझ अधिक होती है, तुलना कम।
दूसरे के सुख की सच्ची कामना
- प्रेम केवल “मुझे कैसा लग रहा है” तक सीमित नहीं रहता।
- वह पूछता है — “वह सच में कैसा है?”
- दूसरे की भलाई में ईमानदार प्रसन्नता — यही प्रेम का हृदय है।
पास रहकर भी बाँधना नहीं
- निकटता और स्वतंत्रता साथ चल सकती हैं।
- प्रेम साथ देता है, दिशा नहीं थोपता।
- यहाँ उपस्थिति है, पर दबाव नहीं।
देना, बिना हिसाब के
- प्रेम लेन-देन नहीं है।
- समय देना, ध्यान देना, धैर्य देना — यह सब स्वाभाविक होता है, सौदा नहीं।
यदि आप प्रेम और भावनात्मक आसक्ति के अंतर को और गहराई से समझना चाहते हैं, तो यह लेख पढ़ सकते हैं - प्यार और Attachment में फर्क | सच्चा प्यार क्या होता है?”
भरोसा, बिना लगातार जाँच के
- भरोसा हर पल प्रमाण नहीं माँगता।
- यह निगरानी से मुक्त स्थिर विश्वास है।
- जहाँ भरोसा है, वहाँ मन शांत रहता है।
प्रेम का मूल मनोभाव:
- “तुम हो — यही पर्याप्त है।”
रोज़मर्रा के उदाहरण
संदेश का इंतज़ार
मोह: देर से जवाब आए तो लगता है अहमियत कम हो गई।
प्रेम: परिस्थिति को समझते हुए भरोसा बनाए रखना।
जीवन के निर्णय
मोह: “मेरे अनुसार चलो।”
प्रेम: “तुम्हारा विकास मेरे लिए महत्वपूर्ण है।”
दूरी और निकटता
मोह: दूरी से असुरक्षा।
प्रेम: दूरी में भी विश्वास।
फर्क बहुत सूक्ष्म है, पर प्रभाव जीवन बदल देता है।
️आध्यात्मिक दृष्टि (सरल भाषा में)
आध्यात्मिक समझ कहती है — दुख पकड़ से जन्मता है, शांति स्वीकार से।
गौतम बुद्ध ने बताया कि आसक्ति मन को बाँधती है, और बँधा मन अशांत रहता है।
आदि शंकराचार्य की दृष्टि में जब “मैं” और “मेरा” ढीले पड़ते हैं, प्रेम स्वाभाविक रूप से प्रकट होता है।
सीधी बात:
जहाँ पकड़ कम होती है, वहाँ प्रेम स्वयं प्रकट होता है।
आज की पीढ़ी के लिए एक स्पष्ट संदेश
- प्रेम कमजोरी नहीं, परिपक्वता है।
- प्रेम में आत्मसम्मान होता है, निर्भरता नहीं।
- प्रेम में स्वतंत्रता होती है, नियंत्रण नहीं।
- प्रेम में शांति होती है, भावनात्मक उतार-चढ़ाव नहीं।
अगर कोई संबंध आपको हल्का, सुरक्षित और विस्तृत बनाता है - वहाँ प्रेम है।
अगर कोई संबंध आपको भारी, असुरक्षित और जकड़ा हुआ महसूस कराता है - वहाँ मोह अधिक है।
अंत में, बात बहुत सरल है -
जब संबंध में स्वीकार बढ़े, भरोसा स्थिर हो और स्वतंत्रता बनी रहे तो —
और जब पकड़, भय और अपेक्षा बढ़ें —
क्योंकि
- प्रेम खोजने की चीज़ नहीं,
- प्रेम बनने की अवस्था है।
- जहाँ हम स्वीकार सीखते हैं, वहीं से प्रेम प्रकट होता है।
प्रेम पाया नहीं जाता — प्रेम बना जाता है।
(FAQs)
सच्चा प्रेम क्या होता है?
सच्चा प्रेम वह भावना है जिसमें स्वीकार, विश्वास और स्वतंत्रता साथ चलते हैं।
यह किसी को नियंत्रित नहीं करता, बल्कि उसके अस्तित्व और विकास का सम्मान करता है।
प्रेम और मोह में सबसे बड़ा अंतर क्या है?
प्रेम में शांति और भरोसा होता है, मोह में असुरक्षा और पकड़।
प्रेम स्वतंत्रता देता है, मोह नियंत्रण चाहता है।
कैसे पहचानें कि यह प्रेम है या केवल आसक्ति?
यदि संबंध में लगातार डर, अपेक्षा और बेचैनी है तो वह मोह हो सकता है।
यदि संबंध आपको हल्का, सुरक्षित और सम्मानित महसूस कराता है तो वह प्रेम के निकट है।
क्या प्रेम में अपेक्षा होना गलत है?
क्या प्रेम में स्वतंत्रता जरूरी है?
जहाँ व्यक्ति अपने स्वभाव और विकास के साथ जी सके, वहाँ प्रेम फलता है।
क्या मोह भी प्रेम का एक रूप है?
नहीं , मोह प्रेम नहीं, प्रेम की अपूर्ण अवस्था है। मोह बस एक भावना है, पर परिपक्व प्रेम नहीं। मोह में पकड़ और भय अधिक होते हैं, जबकि प्रेम में समझ और विस्तार।
स्वस्थ संबंध की पहचान क्या है?
स्वस्थ संबंध में सम्मान, संवाद, विश्वास और भावनात्मक संतुलन होता है। दोनों व्यक्ति साथ रहते हुए भी अपनी पहचान बनाए रखते हैं।
प्रेम क्यों शांति देता है?
जहाँ स्वीकार है, वहाँ संघर्ष कम और मन का संतुलन अधिक होता है।
प्रिय पाठकों ! आशा करते है आपको पोस्ट पसंद आई होगी। इस पोस्ट को पढ़ने के बाद यदि आपके मन में भी कोई प्रश्न उठता है तो आप निःशंकोच हमसे पूछ सकते है।
हम उत्तर देने की पूरी कोशिश करेंगे। इसी के साथ हम विदा लेते है। विश्वज्ञान में अगली पोस्ट के साथ फिर मुलाक़ात होगी।तब तक आप खुश रहिये और प्रभु का स्मरण करते रहिये।
धन्यवाद
जय श्री कृष्ण 🙏🙏

