कैसे हैं आप? आशा है आप सुरक्षित और शांतिपूर्ण होंगे।
पर क्या कभी हमने सोचा है कि भगवान जब हमें देखता है, तो उसके मन में क्या आता होगा?
चलिए, कल्पना करते हैं उस दृष्टि की -
जब भगवान आसमान से इस धरती की ओर देखते होंगे, तो वह क्या सोचते होंगे?
![]() |
| जब भगवान इस धरती को देखते होंगे, तो शायद वे हमारे कर्मों, इंसानियत और प्रेम को ही सबसे पहले परखते होंगे। |
आइए पहले इस कविता के जरिए जाने-
जब भगवान आसमान से ज़मीन को देखते होंगे,
धूप-छांव, रोशनी और अंधेरे में झांकते होंगे।
तो वो सोचते होंगे -
"मैंने तो इस धरती को स्वर्ग बनाया था,
हर दिल में प्यार का दीप जलाया था।
फिर क्यों अब ये नफ़रत की आग में जल रही है,
क्यों इंसानियत हर रोज़ मर रही है?
मैंने तो बहारें भेजीं थीं फूलों के संग,
पंछियों की चहचहाहट में रखी थी उमंग।
फिर अब हर ओर सन्नाटा क्यों है,
ये इंसान इतना उदास क्यों है?
मैंने तो दिल दिए थे, दर्द समझने को,
आँखें दी थीं, अश्क पढ़ने को।
पर अब दिल पत्थर बनते जा रहे हैं,
आँखें सिर्फ़ भेदभाव में बहकती जा रही हैं।
हर मज़हब में सिखाया था इंसान को गले लगाना,
मंदिर, मस्जिद, चर्च, गुरुद्वारे - सबका था पैगाम एक-सा सुनाना।
पर अब दीवारें ऊँची होती जा रही हैं,
आत्मायें धर्म के नाम पर लड़ती जा रही हैं।
फिर ये नफ़रत का कारोबार कहां से आ गया?"
"मैंने तो धरती पर फूल खिलाए थे,
फिर ये खून की बूंदें क्यों गिर रही हैं?"
"मैंने तो सबको एक ही मिट्टी से गढ़ा था,
फिर ये ऊंच-नीच, जात-पात किसने बना दी?"
"मैंने तो दिल दिए थे एक-दूजे का दर्द समझने के लिए,
फिर ये दीवारें, ये सीमाएं, ये युद्ध क्यों हैं?"
फिर भी कभी-कभी वो सोचते होंगे-
- "शायद अभी कुछ चिराग बाकी हैं,
- जो अंधेरे में भी रौशनी दे सकते हैं।
- कुछ दिल अभी भी मोहब्बत में धड़कते हैं,
- कुछ लोग अभी भी इंसानियत से लिपटे हैं।"
शायद
भगवान कभी मुस्कुराता होगा- जब कोई बच्चा मासूमियत से मुस्कुराता होगा।
शायद
उनकी आंखें भर आती होंगी- जब कोई भूखा इंसान दर-दर भटकता होगा।
क्या भगवान हमसे कर्म करवाते हैं?
हो सकता है वह सोचता हो-
- "काश, इंसान समझ पाता कि सच्ची पूजा दिल होता है,
- काश, वो जान पाता कि सबसे बड़ा धर्म 'इंसानियत' है।"
फिर भी, वह शायद उम्मीद नहीं छोड़ते,
- क्योंकि हर बार जब कोई किसी भूखे को खाना खिलाता है,
- किसी बूढ़े को सहारा देता है,
- या किसी रोते को गले लगाता है—
तब भगवान राहत की सांस लेते होंगे और सोचते होंगे
- "अब भी कुछ लोग बाकी हैं,
- जिन्हें देखकर मैं फिर से मुस्कुरा सकता हूं।"
इस कविता के पीछे की भावना
यह कविता केवल कल्पना नहीं है, यह उस प्रश्न की ओर एक नजर है, जो हम सबको कभी न कभी खुद से पूछना चाहिए।
- क्या हम वही हैं, जिनके लिए खुदा ने ये सुंदर दुनिया बनाई थी?
- क्या हम वाकई उस करुणा को निभा रहे हैं जिसकी उम्मीद भगवान को हमसे थी?
- क्या हम जरूरतमंद की मदद करते हैं?
- क्या हम दिल से मुस्कुरा कर किसी रोते को गले लगाते हैं?
आज के समय में जब हर तरफ़ स्वार्थ, तनाव, और संघर्ष फैले हुए हैं, तब एक छोटा सा प्रेमपूर्ण कार्य, एक ईमानदार मदद, एक सच्ची मुस्कान- ये सब भगवान के लिए भी राहत बनते हैं।
भगवान को कब खुशी मिलती होगी?
जब कोई इंसान बिना भेदभाव के किसी का दर्द समझता है।
जब कोई माफ कर देता है, बदला नहीं लेता।
जब कोई बिना दिखावे के प्रार्थना करता है।
क्या भगवान हमारी नीयत भी देखते हैं?
अक्सर लोग सोचते हैं कि भगवान केवल हमारे बड़े कर्मों को देखते हैं, लेकिन सच्चाई यह है कि वे हमारी नीयत को भी समझते हैं। किसी को दान देना और किसी की मदद करना—दोनों दिखने में एक जैसे हो सकते हैं, पर यदि एक काम दिखावे के लिए है और दूसरा सच्चे मन से, तो ईश्वर के सामने दोनों का महत्व अलग हो जाता है। भगवान के लिए कर्म से पहले भावना का मूल्य होता है।
क्या भगवान सच में हमारे कर्मों को देख रहे हैं? यदि आप इस विषय को और गहराई से समझना चाहते हैं, तो हमने इस पर एक अलग विस्तृत लेख लिखा है- क्या भगवान हमारे कर्मों को देख रहे हैं?
संसार बदलने से पहले मन बदलना जरूरी है
हम अक्सर चाहते हैं कि दुनिया बेहतर हो जाए, लोग अच्छे बन जाएँ, अन्याय खत्म हो जाए। लेकिन ईश्वर शायद सबसे पहले यही देखते होंगे कि -
- क्या हमने स्वयं को बदला?
- क्या हमने अपने भीतर के क्रोध, अहंकार और ईर्ष्या को कम किया?
जब एक व्यक्ति अपने मन को शुद्ध करता है, तभी समाज में वास्तविक परिवर्तन शुरू होता है। बाहरी सुधार की शुरुआत हमेशा भीतर से होती है।
छोटी-छोटी अच्छाइयाँ भी ईश्वर तक पहुँचती हैं
कई लोग सोचते हैं कि भगवान को प्रसन्न करने के लिए बड़े व्रत, बड़े दान या बड़ी पूजा चाहिए। परंतु एक सच्ची मुस्कान, किसी उदास व्यक्ति को सहारा देना, किसी भूखे को भोजन देना - ये छोटी लगने वाली बातें भी ईश्वर तक सीधे पहुँचती हैं। प्रेम से किया गया छोटा कर्म भी कई बार बड़े अनुष्ठानों से अधिक मूल्यवान होता है।
भगवान शायद हमारी जल्दबाज़ी पर भी मुस्कुराते होंगे
मनुष्य अक्सर तुरंत फल चाहता है - आज प्रार्थना की और कल परिणाम चाहिए। लेकिन ईश्वर समय के गहरे रहस्य को जानते हैं। कभी-कभी देर भी कृपा होती है। शायद भगवान हमें देखकर यही सोचते हों कि “तुम्हें अभी धैर्य सीखना है।” इसलिए हर प्रतीक्षा को केवल परीक्षा नहीं, बल्कि एक सीख की तरह भी देखना चाहिए।
अंत में एक छोटी सी प्रार्थना
जो तू देखता है - मोहब्बत से, करुणा से।
हमसे कोई गलती हो तो माफ कर देना,
पर हमें इंसानियत निभाने की ताकत ज़रूर देना।"
FAQs - कुछ संबंधित प्रश्न
Q1. क्या भगवान सच में हमारे कर्मों को देखते हैं?
Q2. भगवान को सबसे अधिक क्या प्रिय होता है?
Q3. क्या भगवान इंसानों के दुख देखकर दुखी होते हैं?
Q4. क्या केवल मंदिर जाना ही भगवान को प्रसन्न करता है?
Q5. क्या भगवान हमारी गलतियों को माफ कर देते हैं?
प्रिय पाठकों,
आपका एक विचार, एक शब्द, किसी और के लिए रोशनी बन सकता है।

