दीर्घायुष्य एवं मोक्ष के लिए भगवान शिव की आराधना | राजा इन्द्रद्युम्न और महर्षि लोमश की कथा

VISHVA GYAAN
क्या केवल एक बार श्रद्धापूर्वक की गई भगवान शिव की पूजा अगले जन्म तक फल दे सकती है? क्या शिव आराधना से दीर्घायु और मोक्ष की प्राप्ति संभव है? महर्षि लोमश और राजा इन्द्रद्युम्न की यह अद्भुत कथा इन प्रश्नों का उत्तर देती है।

क्या भगवान शिव की आराधना से दीर्घायु और मोक्ष की प्राप्ति हो सकती है?

संक्षिप्त उत्तर: 

हाँ, शास्त्रों के अनुसार श्रद्धा, भक्ति और निष्काम भाव से की गई भगवान शिव की आराधना मनुष्य को दीर्घायु, आध्यात्मिक उन्नति और अंततः मोक्ष की प्राप्ति का मार्ग प्रदान करती है।


जय श्री राधे कृष्ण प्रिय पाठकों! 🙏
कैसे हैं आप लोग? आशा करते हैं कि आप सभी स्वस्थ और प्रसन्न होंगे।


प्रिय पाठकों! सनातन धर्म के ग्रंथों में भगवान शिव को केवल संहार के देवता ही नहीं, बल्कि कल्याण, दीर्घायु, ज्ञान और मोक्ष के दाता भी कहा गया है। शास्त्रों में अनेक ऐसी कथाएँ मिलती हैं जो बताती हैं कि सच्ची श्रद्धा से की गई शिव आराधना मनुष्य के जीवन को ही बदल सकती है।


आज की इस कथा में आप जानेंगे कि राजा इन्द्रद्युम्न ने मोक्ष का मार्ग कैसे पाया, महर्षि लोमश को इतनी दीर्घ आयु किस पुण्य से प्राप्त हुई, और एक साधारण शूद्र द्वारा की गई निष्काम शिव पूजा का फल अगले जन्म में किस प्रकार मिला। यह कथा हमें बताती है कि भगवान शिव की सच्ची भक्ति कभी निष्फल नहीं जाती।


दीर्घायुष्य एवं मोक्ष के लिए भगवान् शंकर की आराधना


राजा इन्द्रद्युम्न और महर्षि लोमश की कथा

प्राचीन काल में एक राजा था, जिनका नाम था इन्द्रद्युम्न। वे बड़े दानी,धर्मज्ञ और सामर्थ्यशाली थे। धनार्थियों को वे हज़ारों स्वर्ण मुद्राओं से कम दान नहीं देते थे। उनके राज्य में सभी एकादशी के दिन उपवास करते थे। 


गगन की रेत, वर्षा की धारा और आकाश के तारे कदाचित् गिने जा सकते हैं, पर इन्द्रद्युम्न के पुण्यों की गणना नहीं हो सकती। इन पुण्यों के प्रताप से वे सशरीर (जीवित अवस्था) ब्रह्मलोक चले गये। 


सौ कल्प बीत जाने पर ब्रह्माजी ने उनसे कहा- 'राजन् । स्वर्ग साधन में केवल पुण्य ही कारण नहीं है, ब्लकि तीनों लोकों की कीर्ति को बेदाग,उज्जवल और बढ़ाना भी होता है। इधर चिरकाल से तुम्हारा यश क्षीण (कम) हो रहा है उसे उज्जवल करने के लिए तुम धरती पर जाओ।' 


ब्रह्माजी के ये शब्द समाप्त भी न हो पाये थे कि राजा इन्द्रद्युम्न ने अपने को पृथ्वी पर पाया। वे अपने निवास स्थल काम्पिल्य नगर में गये और वहाँ के निवासियों से अपने सम्बन्ध में पूछताछ करने लगे। 


तब निवासियों ने कहा- 'हम लोग तो उनके सम्बन्ध में कुछ भी नहीं जानते, आप किसी लंबी आयु वाले बुढ़े व्यक्ति से पूछ सकते हैं। हमने सुना हैं कि नैमिषारण्य में कल्प के अंत तक जीवित रहने वाले मार्कण्डेय मुनि रहते हैं, कृपया आप उन्हीं से इस प्राचीन बात का पता लगाइये।'अब राजा मार्कण्डेय जी के पहुँचें। 


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राजा ने मार्कण्डेयजी से प्रणाम करके पूछा कि 'मुने ! क्या आप इन्द्रद्युम्न राजा को जानते हैं?'


तब मार्कण्डेयजी ने कहा, 'नहीं, मैं तो नहीं जानता, पर मेरा मित्र नाड़ीजंघवक (बक पक्षी) शायद इसे जानता हो, इसलिए चलो, उससे पूछा जाए।' जब वह नाड़ीजंघवक के पास पहुंचे तो उसने अपनी बड़ी विस्तृत कथा सुनायी और साथ ही अपनी असमर्थता प्रकट करते हुए अपने से भी अति दीर्घायु उल्लू के पास चलने की सलाह दी। 


जब वह उल्लू के पास पहुंचे तो उल्लू ने भी मना कर दिया। इसी प्रकार सभी ने अपने को असमर्थ बतलाते हुए चिरायु गृध्रराज और मानसरोवर में रहने वाले कच्छप मन्थर के पास  जाने के लिए कहा। 


जब वह चिरायु गृध्रराज और कच्छप मन्थर के पास पहुँचे। तो कच्छप मन्थर ने इन्द्रद्युम्न को देखते ही पहचान लिया और कहा कि 'आप लोगों में जो यह पाँचवाँ राजा इन्द्रद्युम्न है, इसे देखकर मुझे बड़ा भय लगता है, क्योंकि इसी के यज्ञ में मेरी पीठ पृथ्वी की गर्मी से जल गयी थी।' 


अब राजा की कीर्ति तो प्रतिष्ठित हो गयी, पर उसने नश्वर होकर स्वर्ग में जाना ठीक न समझा और मोक्ष साधन की जिज्ञासा की। इसलिए कच्छप मन्थर ने राजा को लोमशजी के पास चलने की सलाह दी।। 


लोमशजी के पास पहुँचकर यथाविधि प्रणाम करने के बाद मन्थर ने निवेदन किया इन्द्रद्युम्न कुछ प्रश्न करना चाहते हैं।


महर्षि लोमश की आज्ञा लेने के बाद इन्द्रद्युम्न ने कहा-'महाराज! मेरा प्रथम प्रश्न तो यह है कि आप कभी कुटिया न बनाकर सर्दी, गर्मी तथा बारीश से बचने के लिये केवल एक मुट्ठी घास ही क्यों लिये रहते हैं ?' 


मुनि ने कहा, 'राजन्। एक दिन मरना अवश्य है, फिर शरीर का निश्चित नाश जानते हुए भी हम घर किसके लिये बनायें ? यौवन, धन तथा जीवन-ये सभी चले जाने वाले हैं। ऐसी दशा में 'दान' हो सर्वोत्तम भवन है।' 


इन्द्रद्युम्न ने पूछा, 'मुने। यह आयु आपको दान के परिणाम में मिली है अथवा तपस्या के प्रभाव से, मैं यह जानना चाहता हूँ।' 


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लोमशबी ने कहा- राजन! में पूर्वकाल में एक दरिद्र शूद्र था। एक दिन दोपहर के समय जल के भीतर मैंने एक बहुत बड़ा शिवलिंग देखा। भूख से प्राण सूखे जा रहे थे। उस जलाशय में स्नान करके मैंने कमल के सुन्दर फूलों से उस शिवलिंग का पूजन किया और पुनः मैं आगे चल दिया। 


भूखा होने के कारण मार्ग में ही मेरी मृत्यु हो गयी। दूसरे जन्म में मैं ब्राह्मण के घर में उत्पन्न हुआ। शिव पूजा के फलस्वरूप मुझे पूर्व जन्म की बातों का स्मरण रहने लगा। मैंने जान- बूझकर मौन धारण कर लिया। 


पितादि की मृत्यु हो जाने पर सम्बन्धियों ने मुझे पूरा गूँगा जानकर हमेशा के लिए मेरा त्याग कर दिया। अब मैं रात-दिन भगवान् शंकर की आराधना करने लगा। इस प्रकार सौ वर्ष बीत गये। प्रभु चन्द्रशेखर ने मुझे प्रत्यक्ष दर्शन दिया और मुझे इतनी दीर्घ आयु दी।'


यह जानकर इन्द्रद्युम्न, बक, कच्छप, गीध और उलूक ने भी लोमशजी से शिव दीक्षा ली और तप करके मोक्ष प्राप्त किया।


तो मित्रों! देखा आपने किस प्रकार इन्द्रद्युम्न, बक, कच्छप, गीध और उलूक ने शिव आराधना कर मोक्ष प्राप्त किया। ठीक इसी प्रकार हम मनुष्यों को भी चाहिए कि वह अपनी लंबी आयु और मोक्ष के लिए भगवान शिव की आराधना करें। जिससे कभी दोबारा इस नश्वर, निर्दयी संसार मे न आना पड़े। 


FAQs

1. दीर्घायु के लिए किस देवता की पूजा करनी चाहिए?

शास्त्रों में भगवान शिव की आराधना को दीर्घायु, आरोग्य और कल्याणदायक माना गया है।


2. क्या शिव पूजा से मोक्ष की प्राप्ति होती है?

हाँ। शिव पुराण सहित अनेक ग्रंथों में भगवान शिव की निष्काम भक्ति को मोक्ष का श्रेष्ठ साधन बताया गया है।


3. महर्षि लोमश को दीर्घायु कैसे प्राप्त हुई?

कथा के अनुसार पूर्व जन्म में श्रद्धापूर्वक शिवलिंग की पूजा तथा अगले जन्म में निरंतर भगवान शिव की आराधना के फलस्वरूप उन्हें अत्यंत दीर्घ आयु प्राप्त हुई।


4. राजा इन्द्रद्युम्न ने मोक्ष का मार्ग कैसे जाना?

महर्षि लोमश के उपदेश से उन्होंने भगवान शिव की दीक्षा लेकर तप और आराधना की, जिसके फलस्वरूप उन्हें मोक्ष प्राप्त हुआ।


5. क्या एक बार की सच्ची शिव पूजा भी फल देती है?

शास्त्रों के अनुसार यदि पूजा निष्काम भाव और सच्ची श्रद्धा से की जाए तो उसका पुण्य अनेक जन्मों तक फलदायी हो सकता है।


6. इस कथा से हमें क्या शिक्षा मिलती है?

धन, यश और वैभव नश्वर हैं, जबकि ईश्वर की भक्ति, दान, तप और सदाचार ही मनुष्य के वास्तविक कल्याण और मोक्ष का मार्ग हैं।


तो प्रिय पाठकों, 

कैसी लगी आपको कहानी। आशा करते हैं अच्छी लगी होगी।अपनी राय अवश्य प्रकट करें। इसी के साथ विदा लेते हैं। ऐसी ही रोचक और सत्य कथाओं के साथ विश्वज्ञान मे फिर से मुलाकात होगी। तब तक के लिय आप अपना ख्याल रखें, हंसते रहिए, मुस्कराते रहिए और औरों को भी खुशियाँ बांटते रहिए। 


धन्यवाद,
जय श्री राधे कृष्ण🙏

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