क्या आप जानते हैं कि भगवान शिव की एक ऐसी स्तुति भी है, जिसमें उन्हें जगत का कारण, पालनकर्ता और संहारकर्ता बताया गया है? जानिए वेदसारशिवस्तव स्तोत्र का रहस्य और सरल हिंदी अर्थ।
वेदसारशिवस्तव क्या है?
संक्षिप्त उत्तर:
वेदसारशिवस्तव भगवान शिव की संस्कृत स्तुति है, जिसे परंपरागत रूप से आदि शंकराचार्य से संबद्ध माना जाता है। इसमें भगवान शिव के साकार तथा निराकार स्वरूप, उनकी महिमा और परम तत्व के रूप का वर्णन किया गया है। इसमें 11 मुख्य श्लोकों के माध्यम से महादेव को पशुपति, विश्वनाथ, नीलकंठ, त्रिनेत्र और परमात्मा आदि रूपों में स्मरण किया गया है।
आशा करते हैं कि आप स्वस्थ और प्रसन्नचित होंगे।
भगवान शिव की उपासना में स्तोत्र-पाठ का विशेष महत्व माना गया है। इन्हीं में वेदसारशिवस्तव स्तोत्रम् एक सुंदर शिव-स्तुति है, जिसमें भगवान महादेव के अनेक स्वरूपों, गुणों और उनकी परम सत्ता का वर्णन मिलता है।
इस स्तोत्र में भगवान शिव को पशुपति, विश्वनाथ, नीलकंठ, त्रिनेत्र, महेश्वर और परमात्मा के रूप में स्मरण किया गया है। आइए जानते हैं वेदसारशिवस्तव स्तोत्रम् क्या है, इसके रचनाकार कौन हैं और इसका सरल हिंदी अर्थ क्या है।
इस पोस्ट में आप पाएंगे
वेदसारशिवस्तव के रचनाकार कौन हैं?
वेदसारशिवस्तव स्तोत्र का महत्व
वेदसारशिवस्तव स्तोत्रम्
श्लोक 1 से 11 और सरल हिंदी अर्थ
वेदसारशिवस्तव केवल हिंदी में
वेदसारशिवस्तव का पाठ कब करें?
वेदसारशिवस्तव से जुड़े सामान्य प्रश्न
निष्कर्ष
मित्रों,
आइए अब विस्तार से जाने-
वेदसारशिवस्तव स्तोत्रम् क्या है?
वेदसारशिवस्तव भगवान शिव की एक प्रसिद्ध संस्कृत स्तुति है। इसमें भगवान शिव के साकार और निराकार दोनों स्वरूपों का सुंदर वर्णन मिलता है।
स्तोत्र में कहीं भगवान को जटाओं में गंगा धारण करने वाले महादेव के रूप में स्मरण किया गया है, तो कहीं उन्हें निराकार, अजन्मा, अनादि और परमात्मा के रूप में प्रणाम किया गया है।
इसी कारण यह स्तोत्र भगवान शिव के भक्ति, ज्ञान और आध्यात्मिक स्वरूप—तीनों को सामने रखता है।
वेदसारशिवस्तव के रचनाकार
परंपरागत रूप से वेदसारशिवस्तव स्तोत्र को आदि शंकराचार्य से संबद्ध माना जाता है।
इसमें भगवान शिव की महिमा का वर्णन करते हुए उनके सगुण और निर्गुण दोनों रूपों की स्तुति की गई है।
इस स्तोत्र में भगवान शिव को—
पशुपति
पापनाशक
विश्वनाथ
नीलकंठ
त्रिनेत्र
पंचवक्त्र
महेश्वर
शम्भु
गौरीपति
काशीपति
परमात्मा
आदि नामों से स्मरण किया गया है।
इसका सबसे सुंदर पक्ष यह है कि स्तोत्र भगवान शिव को केवल एक देवस्वरूप के रूप में नहीं, बल्कि समस्त सृष्टि के मूल परम तत्व के रूप में भी प्रस्तुत करता है।
वेदसारशिवस्तव स्तोत्रम्
पशूनां पतिं पापनाशं परेशं
गजेन्द्रस्य कृत्तिं वसानं वरेण्यम्।
जटाजूटमध्ये स्फुरद्गाङ्गवारिं
महादेवमेकं स्मरामि स्मरारिम्॥१॥
जो सम्पूर्ण प्राणियोंके रक्षक हैं, पापका ध्वंस करनेवाले हैं, परमेश्वर हैं, गजराजका चर्म पहने हुए हैं तथा श्रेष्ठ हैं और जिनके जटाजूटमें श्रीगंगाजी खेल रही हैं, उन एकमात्र कामारि श्रीमहादेवजीका मैं स्मरण करता हूँ।
महेशं सुरेशं सुरारार्तिनाशं
विभुं विश्वनाथं विभूत्यङ्गभूषम्।
विरूपाक्षमिन्द्वर्कवह्नित्रिनेत्रं
सदानन्दमीडे प्रभुं पञ्चवक्त्रम्॥२॥
चन्द्र, सूर्य और अग्नि – तीनों जिनके नेत्र हैं, उन विरूपनयन महेश्वर, देवेश्वर, देवदुःखदलन, विभु, विश्वनाथ, विभूतिभूषण, नित्यानन्दस्वरूप, पंचमुख भगवान् महादेवकी मैं स्तुति करता हूँ।
गिरीशं गणेशं गले नीलवर्णं
गवेन्द्राधिरूढं गणातीतरूपम्।
भवं भास्वरं भस्मना भूषिताङ्गं
भवानीकलत्रं भजे पञ्चवक्त्रम्॥३॥
जो कैलासनाथ हैं, गणनाथ हैं, नीलकण्ठ हैं, बैलपर चढ़े हुए हैं, अगणित रूपवाले हैं, संसारके आदिकारण हैं, प्रकाशस्वरूप हैं, शरीरमें भस्म लगाये हुए हैं और श्रीपार्वतीजी जिनकी अर्द्धांगिनी हैं, उन पंचमुख महादेवजीको मैं भजता हूँ८
शिवाकान्त शम्भो शशांकार्धमौले
महेशान शूलिन् जटाजूटधारिन्।
त्वमेको जगद-व्यापको विश्वरूप
प्रसीद प्रसीद प्रभो पूर्णरूप॥४॥
हे पार्वतीवल्लभ महादेव! हे चन्द्रशेखर! हे महेश्वर! हे त्रिशूलिन्! हे जटाजूटधारिन्! हे विश्वरूप! एकमात्र आप ही जगत्में व्यापक हैं। हे पूर्णरूप प्रभो! प्रसन्न होइये, प्रसन्न होइये।
परात्मानमेकं जगद्बीजमाद्यं
निरीहं निराकारम-ओमकारवेद्यम्।
यतो जायते पाल्यते येन विश्वं
तमीशं भजे लीयते यत्र विश्वम्॥५॥
जो परमात्मा हैं, एक हैं, जगत्के आदिकारण हैं, इच्छारहित हैं, निराकार हैं और प्रणवद्वारा जाननेयोग्य हैं तथा जिनसे सम्पूर्ण विश्वकी उत्पत्ति और पालन होता है और फिर जिनमें उसका लय हो जाता है उन प्रभुको मैं भजता हूँ।
न भूमिर्न चापो न वह्निर्न वायु-
र्न चाकाशमास्ते न तन्द्रा न निद्रा।
न ग्रीष्मो न शीतं न देशो न वेषो
न यस्यास्ति मूर्तिस्त्रिमूर्तिं तमीडे॥६॥
जो न पृथ्वी हैं, न जल हैं, न अग्नि हैं, न वायु हैं और न आकाश हैं; न तन्द्रा हैं, न निद्रा हैं, न ग्रीष्म हैं और न शीत हैं तथा जिनका न कोई देश है, न वेष है, उन मूर्तिहीन त्रिमूर्तिकी मैं स्तुति करता हूँ।
अजं शाश्वतं कारणं कारणानां
शिवं केवलं भासकं भासकानाम्।
तुरीयं तमःपारमाद्यन्तहीनं
प्रपद्ये परं पावनं द्वैतहीनम्॥७॥
जो अजन्मा हैं, नित्य हैं, कारणके भी कारण हैं, कल्याणस्वरूप हैं, एक हैं, प्रकाशकोंके भी प्रकाशक हैं,अवस्थात्रयसे विलक्षण हैं, अज्ञानसे परे हैं, अनादि और अनन्त हैं, उन परमपावन अद्वैतस्वरूपको मैं प्रणाम करता हूँ
नमस्ते नमस्ते विभो विश्वमूर्ते
नमस्ते नमस्ते चिदानन्दमूर्ते।
नमस्ते नमस्ते तपोयोगगम्य
नमस्ते नमस्ते श्रुतिज्ञानगम्य॥८॥
हे विश्वमूर्ते! हे विभो! आपको नमस्कार है, नमस्कार है। हे चिदानन्दमूर्ते! आपको नमस्कार है, नमस्कार है। हे तप तथा योगसे प्राप्तव्य प्रभो! आपको नमस्कार है, नमस्कार है। हे वेदवेद्य भगवन्! आपको नमस्कार है, नमस्कार है।
प्रभो शूलपाणे विभो विश्वनाथ
महादेव शम्भो महेश त्रिनेत्र।
शिवाकान्त शान्त स्मरारे पुरारे
त्वदन्यो वरेण्यो न मान्यो न गण्यः॥९॥
हे प्रभो! हे त्रिशूलपाणे! हे विभो! हे विश्वनाथ! हे महादेव! हे शम्भो! हे महेश्वर! हे त्रिनेत्र! हे पार्वतीप्राणवल्लभ! हे शान्त! हे कामारे! हे त्रिपुरारे! तुम्हारे अतिरिक्त न कोई श्रेष्ठ है, न माननीय है और न गणनीय है।
शम्भो महेश करुणामय शूलपाणे
गौरीपते पशुपते पशुपाशनाशिन्।
काशीपते करुणया जगदेतदेकस्त्वं
हंसि पासि विदधासि महेश्वरोऽसि॥१०॥
हे शम्भो! हे महेश्वर! हे करुणामय! हे त्रिशूलिन्! हे गौरीपते! पशुपते! हे पशुबन्धमोचन! हे काशीश्वर! एक तुम्हीं करुणावश इस जगत्की उत्पत्ति, पालन और संहार करते हो; प्रभो! तुम ही इसके एकमात्र स्वामी हो।
त्वत्तो जगद्भवति देव भव स्मरारे
त्वय्येव तिष्ठति जगन्मृड विश्वनाथ।
त्वय्येव गच्छति लयं जगदेतदीश
लिङ्गात्मकं हर चराचरविश्वरूपिन्॥११॥
हे देव! हे शंकर! हे कन्दर्पदलन! हे शिव! हे विश्वनाथ! हे ईश्वर! हे हर! हे चराचरजगद्रूप प्रभो! यह लिंगस्वरूप समस्त जगत् तुम्हींसे उत्पन्न होता है, तुम्हींमें स्थित रहता है और तुम्हींमें लय हो जाता है।
इति श्रीमच्छङ्कराचार्यकृतो वेदसारशिवस्तवः सम्पूर्णम्।
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वेदसारशिवस्तव केवल हिन्दी मे
जो सम्पूर्ण प्राणियोंके रक्षक हैं, पापका ध्वंस करनेवाले हैं, परमेश्वर हैं, गजराजका चर्म पहने हुए हैं तथा श्रेष्ठ हैं और जिनके जटाजूटमें श्रीगंगाजी खेल रही हैं, उन एकमात्र कामारि श्रीमहादेवजीका मैं स्मरण करता हूँ।
चन्द्र, सूर्य और अग्नि – तीनों जिनके नेत्र हैं, उन विरूपनयन महेश्वर, देवेश्वर, देवदुःखदलन, विभु, विश्वनाथ, विभूतिभूषण, नित्यानन्दस्वरूप, पंचमुख भगवान् महादेवकी मैं स्तुति करता हूँ।
जो कैलासनाथ हैं, गणनाथ हैं, नीलकण्ठ हैं, बैलपर चढ़े हुए हैं, अगणित रूपवाले हैं, संसारके आदिकारण हैं, प्रकाशस्वरूप हैं, शरीरमें भस्म लगाये हुए हैं और श्रीपार्वतीजी जिनकी अर्द्धांगिनी हैं, उन पंचमुख महादेवजीको मैं भजता हूँ८
हे पार्वतीवल्लभ महादेव! हे चन्द्रशेखर! हे महेश्वर! हे त्रिशूलिन्! हे जटाजूटधारिन्! हे विश्वरूप! एकमात्र आप ही जगत्में व्यापक हैं। हे पूर्णरूप प्रभो! प्रसन्न होइये, प्रसन्न होइये।
जो परमात्मा हैं, एक हैं, जगत्के आदिकारण हैं, इच्छारहित हैं, निराकार हैं और प्रणवद्वारा जाननेयोग्य हैं तथा जिनसे सम्पूर्ण विश्वकी उत्पत्ति और पालन होता है और फिर जिनमें उसका लय हो जाता है उन प्रभुको मैं भजता हूँ।
जो न पृथ्वी हैं, न जल हैं, न अग्नि हैं, न वायु हैं और न आकाश हैं; न तन्द्रा हैं, न निद्रा हैं, न ग्रीष्म हैं और न शीत हैं तथा जिनका न कोई देश है, न वेष है, उन मूर्तिहीन त्रिमूर्तिकी मैं स्तुति करता हूँ।
जो अजन्मा हैं, नित्य हैं, कारणके भी कारण हैं, कल्याणस्वरूप हैं, एक हैं, प्रकाशकोंके भी प्रकाशक हैं,अवस्थात्रयसे विलक्षण हैं, अज्ञानसे परे हैं, अनादि और अनन्त हैं, उन परमपावन अद्वैतस्वरूपको मैं प्रणाम करता हूँ
हे विश्वमूर्ते! हे विभो! आपको नमस्कार है, नमस्कार है। हे चिदानन्दमूर्ते! आपको नमस्कार है, नमस्कार है। हे तप तथा योगसे प्राप्तव्य प्रभो! आपको नमस्कार है, नमस्कार है। हे वेदवेद्य भगवन्! आपको नमस्कार है, नमस्कार है।
हे प्रभो! हे त्रिशूलपाणे! हे विभो! हे विश्वनाथ! हे महादेव! हे शम्भो! हे महेश्वर! हे त्रिनेत्र! हे पार्वतीप्राणवल्लभ! हे शान्त! हे कामारे! हे त्रिपुरारे! तुम्हारे अतिरिक्त न कोई श्रेष्ठ है, न माननीय है और न गणनीय है।
हे शम्भो! हे महेश्वर! हे करुणामय! हे त्रिशूलिन्! हे गौरीपते! पशुपते! हे पशुबन्धमोचन! हे काशीश्वर! एक तुम्हीं करुणावश इस जगत्की उत्पत्ति, पालन और संहार करते हो; प्रभो! तुम ही इसके एकमात्र स्वामी हो।
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हे देव! हे शंकर! हे कन्दर्पदलन! हे शिव! हे विश्वनाथ! हे ईश्वर! हे हर! हे चराचरजगद्रूप प्रभो! यह लिंगस्वरूप समस्त जगत् तुम्हींसे उत्पन्न होता है, तुम्हींमें स्थित रहता है और तुम्हींमें लय हो जाता है।
इस प्रकार श्रीमच्छङ्कराचार्यकृत वेदसारशिवस्तव स्तोत्र सम्पूर्ण हुआ।
वेदसारशिवस्तव का पाठ कब करें?
भगवान शिव की आराधना के लिए श्रद्धापूर्वक किसी भी दिन स्तोत्र का पाठ किया जा सकता है। विशेष रूप से सोमवार को शिव पूजा का दिन माना जाता है।
आप चाहें तो सुबह स्नान आदि से निवृत्त होकर भगवान शिव का ध्यान करके स्तोत्र का पाठ कर सकते हैं।
यदि किसी कारण पूरा स्तोत्र पढ़ना संभव न हो, तो श्रद्धा से भगवान शिव का स्मरण और “ॐ नमः शिवाय” का जाप भी किया जा सकता है।
वेदसारशिवस्तव से जुड़े प्रश्न
1. वेदसारशिवस्तव स्तोत्र किस देवता को समर्पित है?
वेदसारशिवस्तव स्तोत्र भगवान शिव/महादेव को समर्पित है।
2. वेदसारशिवस्तव के रचनाकार कौन हैं?
परंपरागत रूप से इसे आदि शंकराचार्य द्वारा रचित माना जाता है।
3. वेदसारशिवस्तव में कितने श्लोक हैं?
आपके प्रस्तुत पाठ में 11 मुख्य श्लोक हैं।
4. वेदसारशिवस्तव का पाठ कब करना चाहिए?
श्रद्धा के अनुसार इसका पाठ किसी भी दिन किया जा सकता है। सोमवार को शिव-उपासना के कारण विशेष रूप से इसका पाठ किया जा सकता है।
5. वेदसारशिवस्तव में भगवान शिव के किन रूपों का वर्णन मिलता है?
इसमें भगवान शिव को पशुपति, विश्वनाथ, नीलकंठ, त्रिनेत्र, पंचवक्त्र, महेश्वर, शम्भु, गौरीपति और परमात्मा आदि रूपों में स्मरण किया गया है।
6. क्या वेदसारशिवस्तव केवल संस्कृत में है?
मूल स्तोत्र संस्कृत में है, लेकिन इसका सरल हिंदी अर्थ समझकर भी भक्त इसके भाव को जान सकते हैं।
7. क्या महिलाएं वेदसारशिवस्तव का पाठ कर सकती हैं?
भगवान शिव की भक्ति में स्त्री और पुरुष दोनों श्रद्धापूर्वक स्तुति और स्मरण कर सकते हैं। किसी विशेष संप्रदाय या गुरु की अलग परंपरा हो तो उसका पालन करना उचित है।
8. वेदसारशिवस्तव में भगवान शिव को निराकार क्यों कहा गया है?
क्योंकि स्तोत्र में भगवान शिव के उस परम स्वरूप की भी स्तुति की गई है जो पंचभूतों और किसी विशेष आकार-रूप से परे माना जाता है।
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निष्कर्ष
वेदसारशिवस्तव स्तोत्र भगवान शिव की ऐसी सुंदर स्तुति है, जिसमें महादेव के अनेक दिव्य स्वरूपों के साथ-साथ उनके परम और निराकार स्वरूप का भी वर्णन मिलता है। इसमें भगवान शिव को पशुपति, विश्वनाथ, नीलकंठ, त्रिनेत्र, महेश्वर और जगत के परम कारण के रूप में स्मरण किया गया है।
इस स्तोत्र का पाठ केवल शब्दों का उच्चारण नहीं, बल्कि भगवान शिव के विभिन्न स्वरूपों का स्मरण और उनके प्रति श्रद्धा प्रकट करने का एक सुंदर माध्यम है।
प्रिय पाठकों!
यदि आपको वेदसारशिवस्तव स्तोत्रम् और इसका सरल हिंदी अर्थ पसंद आया हो, तो इस पोस्ट को अपने परिवार और शिवभक्त मित्रों तक अवश्य पहुंचाये।
आप भगवान शिव का कौन-सा नाम सबसे अधिक पसंद करते हैं- महादेव, भोलेनाथ, विश्वनाथ या नीलकंठ? कमेंट में जरूर बताइए।
भगवान भोलेनाथ आप सभी के जीवन में सुख, शांति और सकारात्मकता बनाए रखें।
इसी के साथ आपसे विदा लेते हैं। विश्वज्ञान में अगली धार्मिक और ज्ञानवर्धक पोस्ट के साथ फिर मुलाकात होगी।
हर-हर महादेव🙏
